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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद--अनिल सरस्‍वती

आइंस्‍टीन का सापेक्षवाद--

     
ऊर्जा बह्मांड़—आइंस्‍टीन का प्रसिद्ध कथन है, ‘’ऐसा क्‍यों है कि मुझे कोई नहीं समझता लेकिन प्रेम सभी करते है?
      इसका उत्‍तर भी आइंस्‍टीन को भली भांति ज्ञात था। कारण है उसका सापेक्षवाद का नियम। ई=एम सी2। उसके समकालीन सर्वाधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी इस नियम को समझने में असमर्थ थे।
      सापेक्षवाद का यह नियम बताता है कि ऊर्जा क्‍या है। इसमे पहले ऊर्जा की व्‍याख्‍या करने के लिए बड़े विस्‍तृत और जटिल फ़ॉर्मूला उपयोग लिए जाते थे। पहली बार आइंस्‍टीन ने इसकी व्‍याख्‍या तीन वर्णों में कर डाली।
      समस्‍या यह थी कि जटिलता से गणित और भौतिकी की समस्‍याओं को हल करने वाले वैज्ञानिकों के लिए आइंस्‍टीन का यह सरल नियम समझ के पार था। शायद एक जटिल मस्‍तिष्‍क के लिए सरलता ही जटिलतम समस्‍या है।

आशु प्रज्ञ--प्रकृति दत्‍त या संकल्‍प जन्‍य—ओशो

आशु प्रज्ञ--प्रकृति दत्‍त या संकल्‍प जन्‍य—



आशु प्रज्ञ होना प्रकृति दत्‍त आकस्‍मिक घटना नहीं है। साधना जन्‍य परिणाम है। प्रकृति है अचेतन। आपको भूख लगती है, यह प्रकृति-दत्‍त है। आपको प्‍यास लगती है ये प्रकृति दत्‍त है। आप सोते है रात, आप जागते है सुबह ये प्रकृति दत्‍त घटना है। ये सब अचेतन है। इसमें आपको कुछ भी नहीं करना पडा है। यह आपने पाया है। यह आपके शरीर के साथ जुड़ा है। लेकिन एक आदमी ध्‍यान करता है, यह प्रकृति दत्‍त नहीं है। अगर आदमी न करे तो अपने आप यह कभी भी न होगा। भूख लगेगी अपने आप, प्‍यास लगेगी अपने आप। ध्‍यान अपनेआप नहीं लगेगा। कामवासना जगेंगे अपने आप, मोह के बंधन निर्मित हो जायेंगे अपने आप, लोभ पकड़ेगा अपने आप। धर्म नहीं पकड़ेगा अपने आप। इसे ठीक से समझ लें।

निम्‍न विचार तीव्रता से फैलते है—ओशो

निम्‍न विचार तीव्रता से फैलते है—

     आप हैरान होंगे जानकर कि आपको हमेशा अनार्य वचनों में आनंद मिलता है—क्‍यों? क्‍योंकि जब भी कोई अनार्य वचन आप सुनते है क्षुद्र तो पहली तो बात उसे एकदम समझ पाते है। क्‍योंकि वह आपकी भाषा है। दूसरी बात उसे सुनकर आप आश्वस्त होते है कि मैं ही बुरा नहीं हूं, सारा जगत ऐसा ही है। तीसरा उसे सुनते ही आपको जो श्रेष्‍ठता का चुनाव है वह जो चुनौती है आर्य त्व की, उसकी पीड़ा मिट जाती है। सब उत्‍तरदायित्‍व गिर जाता है।
      ऐसा समझें, फ्रायड ने कहा कि मनुष्‍य एक कामुक प्राणी है। यह अनार्य वचन है असत्‍य नहीं है; सत्‍य है लेकिन शुद्र सत्‍य है। निकृष्‍टतम सत्‍य है। आदमी की कीचड़ के बाबत सत्‍य है। कि आदमी के बाबत सत्‍य नहीं है कि आदमी सेक्‍सुअल है; कि आदमी के सारे कृत्य कामवासना से बंधे है, वह जो भी कर रहा है कामवासना ही है।

दोस्‍तोव्‍सकी और फांसी—ओशो

दोस्‍तोव्‍सकी और फांसी—

     दोस्तोव्सकी को फांसी की सज़ा दी गई थी—रूस के एक चिंतक, विचारक और लेखक को। ठीक छह बजे उसका जीवन नष्‍ट हो ने वाला था, और छह बजने के पाँच मिनट पहले खबर आई , जार की कि वह क्षमा कर दिया गया है। एन वक्‍त पर उसकी फांसी की सज़ा माफ हो गई। दोस्‍तोव्‍सकी ने बाद में अपने संस्‍मरणों में लिखा है। कि उस क्षण जब छह बजने के करीब आ रहे थे तक मेरे मन में न कोई वासना थी और न कोई इच्‍छा थी। न कोई जीवन में रस था। न ही सपने बचे थे। क्‍योंकि सपनों के लिए समय चाहिए था। अभिलाषाओं के, इच्‍छा और के समय चाहिए था। वो मेरे पास नहीं था। उस समय मैं इतना शांत हो गया था। और मैं इतना शून्‍य हो गया था। कि मैंने उस क्षण में जाना कि साधु, संत जिस समाधि की बात करते है वह क्‍या है। लेकिन जैसे ही जार का आदेश पहुंचा और मुझे सुनाया गया कि मैं छोड़ दिया जा रहा  हूं।

जीवन ऊर्जा की गति—ओशो

जीवन ऊर्जा की गति—


      अगर गति अधिक हो जाए तो चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती है। अधिक गति के कारण ठहराव के कारण नहीं। जिस कुर्सी पर आप बैठे हे, उसकी गति बहुत है। उसका एक-एक परमाणु उतनी ही गति से दौड़ रहा है अपने केन्‍द्र पर जितनी गति से सूर्य की किरण चलती है—एक सैकंड में एक लाख छियासी हजार मील। इतनी गति से चलने की वजह से आप गिर नहीं जाते कुर्सी से, नहीं तो आप कभी के गिर गये होते। तीव्र गति आपको संभाले हुए है।
      फिर यह गति भी बहु-आयमी है। मल्‍टी डायमेंशन है। जिस कुर्सी पर आप बैठे हे उसकी पहली गति तो यह है कि उसके परमाणु अपने भीतर धूम रहे है। हर परमाणु अपने न्यूक्लियस पर, आपने केन्‍द्र पर चक्र काट रहा है। फिर कुर्सी जिस पृथ्‍वी पर रखी हे वह पृथ्‍वी अपनी कील पर धूम रही है। उसके घूमने की वजह से भी कुर्सी में दूसरी गति हे। एक गति कुर्सी की आन्‍तरिक है कि उसके परमाणु घूम रहे है दूसरी गति—पृथ्‍वी अपनी की पर घूम रही है इसलिए कुर्सी भी पूरे समय पृथ्‍वी के साथ घूम रही है। तीसरी गति—पृथ्‍वी अपनी कील पर घूम रही है। और साथ ही पूरे सूर्य के चारों और परिभ्रमण कर रही है, घूमते हुए अपनी कील पर सूर्य का चक्र लगा रही है।

आदत और स्‍वभाव—ओशो

आदत और स्‍वभाव—

     गलत तपस्‍वी सिर्फ आदत बनाता है तप की। ठीक तपस्‍वी स्‍वभाव को खोजता है, आदत नहीं बनाता। हैबिट और नेचर का फर्क समझ लें। हम सब आदतें बनवाते है। हम बच्‍चे को कहते है—क्रोध मत करो, क्रोध की आदत बुरी है। न क्रोध करने की  आदत बनाओ। वहन क्रोध करने की आदत तो बना लेता है, लेकिन उससे क्रोध नष्‍ट नहीं होता। क्रोध भीतर चलता रहता है। कामवासना पकड़ती है तो हम कहते है कि ब्रह्मचर्य की आदत बनाओ। वह आदत बन जाती है। लेकिन कामवासना भीतर सरकती रहती है, वह नीचे की तरफ बहती रहती है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तपस्‍वी खोजता है—स्‍वभाव के सूत्र को, ताओ को, धर्म को। वह क्‍या है जो मेरा स्‍वभाव हे, उसे खोजता है। सब आदतों को हटाकर वह अपने स्‍वभाव को दर्शन करता है। लेकिन आदतों को हटाने का एक ही उपाय है—ध्‍यान मत दो, आदत पर ध्‍यान मत दो।
      एक मित्र मेरे पास चार छह दिन पहले मेरे पास आए। उन्‍होंने कहा कि आप कहते है कि बम्‍बई में रहकर, और ध्‍यान हो सकता है। यह सड़क का क्‍या करें, भोंपू का क्‍या करें। ट्रेन जा रही है, सीटी बज रही है, बच्‍चे आस पास शोर मचा रहे है, इसका क्‍या करें?

शराब और कामवासना-ओशो

शराब और कामवासना—

      तो हम तो आपने को एक मादक बिन्‍दु बनाना चाहते है। जिसमें चारों तरफ, जिसके व्‍यक्‍तित्‍व में शराब हो और खींच ले। और महावीर कहते है कि जो दूसरे को खींचने जायेगा, वह पहले ही दूसरों से खिंच चुका है। जो दूसरों के आकर्षण पर जीयेगा वह दूसरों से आकर्षित है। और जो अपने भीतर मादकता भरेगा, बेहोशी भरेगा, लोग उसकी तरफ खीचेंगें जरूर,लेकिन वह अपने को खो रहा है और डूबा रहा है। और एक दिन रिक्‍त हो जायेगा, आरे जीवन के अवसर से चूक जायेगा।
      निश्‍चित ही, एक स्‍त्री जो होश पूर्ण हो, कम लोगों को आकर्षित करेगी। एक स्‍त्री जो मदमस्‍त हो, ज्‍यादा लोगों को आकर्षित करेंगी। क्‍योंकि जो मदमस्‍त स्‍त्री.....पशु जैसी हो जायेगी। सारी सभ्‍यता, सारे संस्‍कार, सारा जो ऊपर थ वह सब टूट जायेगा। वह पशुवत हो जायेगी। एक पुरूष भी,जो मदमस्‍त हो, ज्‍यादा लोगों को आकर्षित, ज्‍यादा स्‍त्रियों को आकर्षित कर लेगा, क्‍योंकि वह पशुवत हो जायेगा।

बुद्ध का मौन—ओशो



बुद्ध का मौन—

      यह बड़ा विरोधाभास है, जिसने न बोलना सीख लिया वही बोलने का हकदार है। जिसने चुप होना जाना, वही पात्र है कि अगर बोले तो सौभाग्‍य। जिसने चुप होना सीखा लिया, उसको चुप हमने नहीं रहने दिया।
      कहते है बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो वह सात दिन चुप रह गए। चुप्‍पी इतनी मधुर थी। ऐसी रसपूर्ण थी, ऐसी रोआं-रोआं उसमें नहाया, सराबोर था, बोलने की इच्‍छा ही न जागी। बोलने का भाव ही पैदा न हुआ। कहते है, देवलोक थरथराने लगा। कहानी बड़ी मधुर है। अगर कहीं देवलोक होगा तो जरूर थर थराया होगा। कहते है ब्रह्मा स्‍वयं घबड़ा गया।
      क्‍योंकि कल्‍प बीत जाते है, हजारों-हजारों वर्ष बीतते है, तब कोई व्‍यक्‍ति बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध होता है। ऐसे शिखर से अगर बुलावा न दे तो जो नीचे अंधेरी घाटियों में भटकते लोग हैं,उन्‍हें तो शिखर की खबर भी न मिलेगी। वे तो आँख उठाकर देख भी न सकेंगे; उनकी गरदनें तो बड़ी बोझिल है। वस्‍तुत: वे चलते नहीं, सरकते हैं, रेंगते है।

बुधवार, 3 जनवरी 2018

चमत्‍कार–(वैज्ञानिक चित का अभाव)-ओशो



चमत्‍कार–(वैज्ञानिक चित का अभाव)


      चमत्‍कार शब्‍द का हम प्रयोग करते है, तो साधु-संतों का खयाल आता है। अच्‍छा होता कि पूछा होता कि मदारियों के संबंध में आपका क्‍या ख्‍याल आता है। अच्‍छा तरह के मदारी है—एक जो ठीक ढंग से मदारी हैं, आनेस्‍ट वे सड़क के चौराहों पर चमत्‍कार दिखाते है। दूसरे: ऐसे मदारी है, डिस्‍आनेस्‍ट, बेईमान, वे साधु-संतों के वेश करके, वे ही चमत्‍कार दिखलाते है। जो चौरस्‍तों पर दिखाई जाते है। बेईमान मदारी सिनर है, अपराधी है, क्‍योंकि मदारी पन के अधार पर वह कुछ और मांग कर रहा है।
      अभी मैं पिछले वर्ष एक गांव में था। एक बूढ़ा आदमी आया। मित्र लेकर आये थे और कहा कि आपको कुछ काम दिखलाना चाहते है। मैंने कहा, दिखायें। उस बढ़े ने अद्भुत काम दिखलाये। रूपये को मेरे सामने फेंका वह दो फिट ऊपर जाकर हवा में विलीन हो गया। मैंने उस बूढे आदमी से कहा,बड़ा चमत्‍कार करते है आप। उसने कहा, नहीं यह कोई चमत्‍कार नहीं है। सिर्फ हाथ की तरकीब है। मैंने कहा, तुम पागल हो। सत्‍य साई बाबा हो सकते थे। क्‍या कर रहे हो। क्‍यों इतनी सच्‍ची बात बोलते हो? इतनी ईमानदारी उचित नहीं है। लाखों लोग तुम्‍हारे दर्शन करते। तुम्‍हें मुझे दिखाने ने आना होता, मैं ही तुम्‍हारे दर्शन करता।

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म-भाग-05



ज्‍योतिष  अर्थात  अध्‍यात्‍म—भाग-05


      बहुत पुराना संघर्ष है आदमी के चिन्‍तन का। अगर आदमी पूरी तरह स्‍वतंत्र है जैसा ज्‍योतिषी साधारणत: कहते हुए मालूम पड़ते है, कि सब सुनिश्‍चित है, जो विधि ने लिखा है वह होकर रहेगा तो फिर सारा धर्म व्‍यर्थ हो जाता है। और या फिर जैसा कि तथाकथित तर्कवादी और बुद्धिवादी गुरु कहते है कि सब स्‍वच्‍छन्‍द है, कुछ बंधा हुआ नहीं है। कुछ होने का निश्‍चित नहीं है, कुछ अनिश्‍चित है—तो जिन्‍दगी एक के ऑफ और एक अराजकता और एक स्‍वच्‍छन्‍दता हो जाती है। फिर तो यह भी हो सकता है कि मैं चोरी करुँ और मोक्ष पा जाऊँ, हत्‍या करुँ और परमात्‍मा मिल जाए। क्‍योंकि जब कुछ भी बन्‍धा हुआ नहीं है। और किसी भी कदम से कोई दूसरा कदम बँधता नहीं है और अब कहीं भी कोई नियम और सीमा नहीं है......।
      फिर मुझे ख्याल आता है मुल्‍ला नसरूदीन का। मुल्‍ला एक मस्‍जिद के नीचे से गुजर रहा है और एक आदमी मस्‍जिद के ऊपर से गिर पडा। अजान पढने चढ़ा था। मीनार पर, ऊपर से गिर पडा। मुल्‍ला के कंधे पर गिरा। मुल्‍ला की कमर टूट गई। अस्‍पताल में मुल्‍ला भर्ती है, उसके शिष्‍य उसको मिलने गए और शिष्‍यों ने कहा, मुल्‍ला इस दुर्घटना से क्‍या मतलब निकलता हे। आऊ डू इन्‍टरप्रीट इट इस घटना की व्‍याख्‍या क्‍या है? क्‍योंकि मुल्‍ला हर घटना की व्‍याख्‍या निकालता था।

ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म-भाग-04


(ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म)

      ज्‍योतिष से इसका कोई लेना देना नहीं है। और चुंकी ज्‍योतिष इस तरह की बात चीत में लगे रहते है। इसलिए ज्‍योतिष का भवन गिर गया। ज्‍योतिष के भवन के गिर जाने का कारण यही हुआ। कोई भी बुद्धिमान आदमी इस बात को मानने को राज़ी नहीं हो सकता है,  कि मैं जिस दिन पैदा हुआ उस दिन लिखा था कि मरीन ड्राइव पर फलां-फलां दिन एक छिलके पर मेरा पैर पड़ जाएगा। और फिसल जाऊँगा। न तो मेरे फिसलने का चाँद तारों से प्रयोजन है, न उस छिलके का कोई प्रयोजन है। इन बातों से संबंधित होने के कारण ज्‍योतिष बदनाम हुआ। और हम सबकी उत्‍सुकता यहीं है। कि ऐसा पता चल जाए। इससे कोई संबंध नहीं है।
      सेमी एसेंशियल है कुछ बातें जैसे—जन्‍म मृत्‍यु सेमी एसेंशियल है। अगर आप इसके बाबत पूरा जान लें तो उसमें फर्क हो सकता है। और न जानें तो फर्क नहीं होगा। चिकित्‍सा की हमारी जानकारी बढ़ जाएगी तो हम आदमी की उम्र लंबा कर लेंगे—कर रहे है। अगर हमारी एटम बम की खोज-बीन और बढ़ती चली गयी तो हम लाखों लोगों को एक साथ मार डालेंगे—मारा है। यह सेमी एसेंशियल, अर्द्ध अनिवार्य जगत है। जहां कुछ चीजें हो सकती है, नहीं भी हो सकती है। अगर जान लेंगे तो अच्‍छा है। क्‍योंकि विकल्‍प चुने जा सकते है। इसके बाद एसेंशियल अनिवार्य का जगत है। वहां कोई बदलाहट नहीं होती।

ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म-भाग-03



(ज्‍योतिष और अध्यात्म)


      जगत में न मालूम कितनी घ्‍वनियां है जो चारों तरफ हमारे गुजर रही है। भंयकर कोला हाल है—वह पूरा कोलाहल हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते हे। ध्‍यान रहे, वह हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते हे। वह हमारे रोएं-रोएं को स्‍पर्श करता है। हमारे ह्रदय की धड़कन-धड़कन को छूता है। हमारे स्‍नायु-स्‍नायु को कंपा जाता है। वह अपना काम तो कर ही रहा है। उसका काम तो जारी है। जिस सुगंध को आप नहीं सूंघ पाते उसके अणु आपके चारों तरफ अपना काम तो कर ही जाते हे। और अगर उसके अणु किसी बीमारी को लाए है तो आप को दे जाते है। आपकी जानकारी आवश्‍यक नहीं है। किसी वस्‍तु के होने के लिए।
      ज्‍योतिष का कहना है कि हमारे चारों तरफ ऊर्जाओं के क्षेत्र है, एनर्जी फील्‍डस है और वह पूरे समय हमें प्रभावित कर रहे है। जैसे ही बच्‍चा जन्‍म लेता है तो वह जगत के प्रति, जगत प्रभावों के प्रति फंस जाता है। जन्‍म को वैज्ञानिक भाषा में हम कहें एक्‍सपोजर, जैसे कि फिल्‍म को हम ऐक्सपोज करते है। कैमरे में, जरा सा शटर आप दबाते है एक क्षण के लिए कैमरे की खिड़की खुलती है और बंद हो जाती है। उस क्षण में जो भी कैमरे के समक्ष आ जाता है। वह फिल्‍म पर अंकित हो जाता है। फिल्‍म ऐक्सपोज हो गई। अब दुबारा उस पर कुछ अंकित न होगा—और अब यह फिल्‍म उस आकार को सदा अपने भीतर लिए रहेगी।

ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म-भाग-02

(ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म)


      इजिप्‍ट के एक सम्राट ने आज से चार हजार साल पहले अपने वैज्ञानिको को कहा था कि नील नदी में जब भी जल घटता है, बढ़ता है, उसका पूरा ब्‍योरा रखा जाए। अकेली नील एक ऐसी नदी है जिसकी चार हजार वर्ष की बायो ग्राफी है। उसकी जीवन कथा है पूरी। और किसी नदी की कोई बायो ग्राफी नहीं है। उसकी जीवन कथा है पूरी, कब इसमें इंच भर पानी बढ़ा है, उसका पूरा रिकार्ड है—चार हजार वर्ष फैरोहों के जमाने से लेकर आज तक।
      फैरोहों का अर्थ होता है—सूर्य, इजिप्ट भाषा में। फैरोहों, जो इजिप्‍ट के सम्राटों का नाम था, वह सूर्य के आधार पर है। और इजिप्‍ट में ऐसा ख्‍याल था कि सूर्य और नदी के बीच निरंतर संवाद है। और फैरोहों, जो कि सूर्य का भक्‍त थे। उन्‍होंने कहा कि नील का पूरा रिकार्ड रखा जाए। सूर्य के संबंध में तो हमें अभी कुछ पता नहीं है लेकिन कभी तो सूर्य के संबंध में पता हो जाएगा, तब यह रिकार्ड काम दे सकता हे। तो चार हजार साल की पूरी कथा है नील नदी की। उसमें इंच भर पानी कब बढ़ा, इंच भर कब कम हुआ, कब उसमें पर आया, कब पूर नहीं आया। कब नदी बहुत तेजी से बही और कब नदी बहुत धीमी बही, इसका चार हजार वर्ष का लंबा इतिहास इंच-इंच उपलब्ध है।

ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म-भाग-01



(ज्‍योतिष और अध्‍यात्‍म)


कुछ बातें जान लेनी जरूरी है। सबसे पहले तो यह बात जान लेनी जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्‍टि से सूर्य से समस्‍त सौर्य परिवार का—मंगल का, बृहस्‍पति का, चंद्र का, पृथ्‍वी का जन्‍म हुआ है। ये सब सुर्य के ही अंग है। फिर पृथ्‍वी पर जीवन का जन्‍म हुआ—पौधों से लेकर मनुष्‍य तक। मनुष्‍य पृथ्‍वी का अंग है, पृथ्‍वी सूरज का अंग है। अगर हम इसे ऐसा समझें—एक मां है, उसकी एक बेटी है। और उसकी एक बेटी है—उन तीनों के शरीर का निर्माण एक ही तरह के सेल्‍स से एक ही तरह के कोष्‍ठों से होता है।
      और वैज्ञानिक एक शब्‍द का प्रयोग करते है एम्‍पैथी का, समानुभूति का। जो चीजें एक से ही पैदा होती हे। सूर्य से पृथ्‍वी पैदा होती है, पृथ्‍वी से हम सबके शरीर निर्मित होते है। थोड़े ही दूर फासले पर सूरज हमारा महापिता है। सूर्य पर जो घटित होता है वह हमारे रोम-रोम में स्‍पंदित होता हे। क्‍योंकि हमारा रोम-रोम भी सूर्य से ही निर्मित है। सूर्य इतना दूर दिखाई पड़ता है, इतना दूर नहीं है। हमारे रक्‍त के एक-एक कण में और हड्डी की एक-एक टुकड़े में सूर्य के ही अणुओं का वास है। हम सूर्य के ही टुकड़े है। और यदि सूर्य से हम प्रभावित होते है। इसमें कुछ आश्‍चर्य नहीं है—एम्‍पैथी है, समानुभूति है।

रविवार, 31 दिसंबर 2017

कुछ काम ओर ज्ञान की बातें-19



ज्‍योतिष:  अद्वैत का विज्ञान—8(अन्‍तिम)

     ज्‍योतिष सिर्फ नक्षत्रों का अध्‍ययन नहीं हे। वह तो है ही वह तो हम बात करेंगे—साथ  ही ज्‍योतिष और अलग-अलग आयामों से मनुष्‍य के भविष्‍य को टटोलने की चेष्‍टा है कि वह भविष्‍य कैसे पकड़ा जा सके। उसे पकड़ने के लिए अतीत को पकड़ना जरूरी है। उसे पकड़ने के लिए अतीत के जो चिन्‍ह है, आपके शरीर पर और आपके मन पर भी छुट गये है। उन्‍हें पहचानना जरूरी हे।  और जब से ज्‍योतिषी शरीर के चिन्‍हों पर बहुत अटक गए है तब से ज्‍योतिष की गिराई खो गई है, क्‍योंकि शरीर के चिन्‍ह बहुत उपरी है।
      आपके हाथ की रेखा तो आपके मन के बदलने से इसी वक्‍त भी बदल सकती हे। आपके आयु की जो रेखा है, अगर आपको भरोसा दिलवा दिया जाए हिप्रोटाइज करके की आप पन्‍द्रह दिन बाद मर जाएंगे और आपको रोज बेहोश करके पन्‍द्रह दिन तक यह भरोसा पक्‍का बिठा दिया जाए की आप पन्‍द्रह दिन बाद मर जाओगे, आप चाहे मरो या न मरो, आपके उम्र की रेखा पन्‍द्रह दिन के समय पहुंचकर टूट जाएगी। आपकी अम्र की रेखा में गैप आ जाएगा। शरीर स्‍वीकार कर लेता है कि ठीक है, मौत आती है।

कुछ काम ओर ज्ञान की बातें-18



ज्‍योतिष अद्वैत  का विज्ञान—7


टाईम ट्रैक और—हुब्‍बार्ड
      भविष्‍य एकदम अनिश्‍चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्‍चित है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्‍य में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे है। भविष्‍य का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते है कि निश्‍चित नहीं है। लेकिन भविष्‍य में दिखाई  पड़ने लगे....ओर ज्‍योतिष भविष्‍य में देखने की प्रक्रिया है।
      तो ज्‍योतिष सिर्फ इतनी ही बात नहीं है कि ग्रह-नक्षत्र क्‍या कहते है। उनकी गणना क्‍या कहती है। यह तो सिर्फ ज्‍योतिष का एक डायमेंशन है, एक आयाम है। फिर भविष्‍य को जानने के और आयाम भी है।
      मनुष्‍य के हाथ पर खींची हुई रेखाएं है, मनुष्‍य के माथे पर खींची हुई रेखाएं है, मनुष्‍य के पैर पर खींची हुई रेखाएं है। पर ये भी बहुत उपरी है। मनुष्‍य के शरीर में छिपे हुए चक्र हे। उन सब चक्रों को अलग-अलग संवेदन है। उन सब चक्रों की प्रति पल अलग-अलग गति है। फ्रीक्‍वेंसी है। उनकी जांच है। मनुष्‍य के पास छिपा हुआ, अतीत का पूरा संस्‍कार बीज है।

कुछ काम ओर ज्ञान की बातें-17



ज्‍योतिष अद्वैत  का विज्ञान—6

     
      जैसा मैं आपसे कह रहा था पैरासेल्‍सस के संबंध में। आधुनिक चिकित्‍सक भी इस नतीजे पर पहुंचे रहे है। कि जब भी सूर्य पर अनेक बार धब्‍बे प्रकट होते है....ऐसे भी सूर्य पर कुछ धब्‍बे है, डाट्स, स्‍पाट्स होते है—कभी वे बढ़ जाते है, कभी वे कम हो जाते है। जब सूर्य पर स्पाट्स बढ़ जाते है तो जमीन पर बीमारियां बढ़ जाती है। और जब सुर्य पर काले धब्‍बे कम हो जाते है, तो जमीन पर बीमारियां कम हो जाती है। और जमीन से हम बीमारियां कभी न मिटा सकेंगे जब तक सूर्य के  स्पाट्स कायम है।
      हर ग्‍यारह वर्ष में सूरज पर भारी उत्‍पात होता है, बड़े विस्‍फोट होते है। और जब ग्‍यारह वर्ष में सूरज पर विस्‍फोट होता है, और उत्‍पात होते है तो पृथ्‍वी पर युद्ध ओर उत्‍पात होते है। पृथ्‍वी पर युद्धों का जो क्रम है वह हर दस वर्ष का है। महामारी का जो क्रम है वह दस वर्ष के बीच का है। क्रान्ति यों का जो क्रम है दस वर्ष और ग्‍यारह वर्ष के बीच का है।

कुछ काम ओर ज्ञान की बातें-16



ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—5

 
      शायद पहला जन्‍म काई, वह जो पानी पर जम जाती है—वह जीवन का पहला रूप है, फिर आदमी तक विकास। जो लोग पानी के ऊपर गहन शोध करते है, वे कहते है पानी सर्वाधिक रहस्‍यमय तत्‍व है। जगत से, अन्‍तरिक्ष से तारों का जो भी प्रभाव आदमी तक पहुंचता है उसमें मीडियम, माध्‍यम पानी है। आदमी के शरीर के जल को ही प्रभावित करके कोई भी रेडिएशन कोई भी विकीर्णन मनुष्‍य में प्रवेश करता है। जल पर बहुत काम हो रहा है और जल के बहुत से मिस्‍टीरियस, रहस्‍यमय गुण खयाल में आ रहे है।
      सर्वाधिक रहस्‍य गुण जो जल का जो ख्‍याल में अभी दस वर्षों में वैज्ञानिकों को आया है वह यह है कि सर्वाधिक संवेदनशीलता जल के पास है—सबसे ज्‍यादा सेंसिटिव। और हमारे जीवन में चारों और से जो भी प्रभाव गतिमान होते है वह जल को ही कम्‍पित करके गति करते है।

कुछ काम ओर ज्ञान की बातें-15



सत्र-4 ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—4

           इनके रुझान, इनके ढंग, इनके भाव समानांतर है। अगर करीब-करीब ऐसा मालूम पड़ता है कि ये दोनों एक ही ढंग से जीते है। एक दूसरे की कापी की भांति होते है। इनका इतना एक जैसा होना और बहुत सी बातों से सिद्ध होता है।
      हम सबकी चमड़ियां अलग-अलग हैं, इण्‍डीवीजुअल है। अगर मेरा हाथ टुट जाए और मेरी चमड़ी बदलनी पड़े तो आपकी चमड़ी मेरे हाथ के काम नहीं आयेगी। मेरे ही शरीर की चमड़ी उखाड़ कर लगानी पड़ेगी। इस पूरी जमीन पर कोई आदमी नहीं खोजा जा सकता, जिसकी चमड़ी मेरे काम आ जाए। क्‍या बात है? शरीर शास्‍त्री से पूँछें कि क्‍या दोनों की चमड़ी की बनावट में कोई भेद है—तो कोई भेद नहीं है।
      चमड़ी में जो तत्‍व निर्मित करते है चमड़ी को उसमें कोई भेद है तो कोई भेद नहीं है। चमड़ी के रसायन में कोई भेद नहीं? चमड़ी में जो तत्‍व निर्मित करते है चमड़ी को उसमें कोई भेद है—तो कोई भेद नहीं।

कुछ काम ओर ज्ञान की बातें-14



ज्‍योतिष: अद्वैत का विज्ञान—3

     तो साधारणत: देखने पर पता चलता है कि इन ग्रह-नक्षत्रों की स्‍थिति का किसी के बच्‍चे के पैदा होने से, होरोस्‍कोप से क्‍या संबंध हो सकता है। यह तर्क सीधा और साफ मालूम होत है। फिर चाँद तारे एक बच्‍चे के जन्‍म की चिन्‍ता तो नहीं करते? और फिर एक बच्‍चा  ही पैदा नहीं होता, एक स्‍थिति में लाखों बच्‍चें पैदा होते है। पर लाखों बच्‍चे एक से नहीं होते, इन तर्कों से ऐसा लगने लगा....। तीन सौ वर्षों  से यह तर्क दिये जा रहे हे कि कोई संबंध नक्षत्रों से व्‍यक्‍ति के जन्‍म का नहीं है।
      लेकिन ब्राउन, पिकाडी और इन सारे लोगों की, तोमा तो....। इन सबकी खोज का एक अद्भुत परिणाम हुआ है और वह यह कि ये वैज्ञानिक कहते है कि अभी हम यह तो नहीं कह सकते कि व्‍यक्‍तिगत रूप से कोई बच्‍चा प्रभावित होता है। लेकिन अब हम यह पक्‍के रूप से कह सकते है, लेकिन जीवन निश्‍चित रूप से प्रभावित होता है। और अगर जीवन प्रभावित होता है तो हमारी खोज जैसे-जैसे सूक्ष्‍म होगी वैसे-वैसे हम पाएंगे कि व्‍यक्‍ति भी प्रभावित होता हे।