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शुक्रवार, 15 जून 2018

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--91

अनुभव ही भरोसाप्रवचनसौहलवां

दिनांक 10 फरवरी, 1977;
ओशो  आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

      जनमउवाच:

क्‍व प्रमाता प्रमाणं वा क्‍व प्रमेय क्‍व च प्रमा।
क्‍व न किंचित क्‍वा न किंचिद्वा सर्वदा विमलस्य मे।। 292।।
क्‍व विक्षेप: क्‍व चैकाग्रयं क्‍व निर्बोध क्‍व मूढुता।  
क्‍व हर्ष: क्‍व विषादो वा सर्वदा निस्कियस्थ मे।। 293।।
क्‍व चैष व्यवहारो वा क्‍व च सा परमार्थता।
क्‍व सूखं क्‍व च वा दुःखं निर्विमर्शस्थ मे सदा।। 294।।
क्‍व माया क्‍व न संसार: क्‍व प्रीतिर्विरति क्‍व च वा।
क्‍व जीव: क्‍व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे।। 295।।
क्‍व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्‍व मुक्ति: क्‍व व बंधनम्।
कूटस्थनिर्विभागस्थ स्वस्थस्थ मम सर्वदा।। 296।।
क्योयदेश: क्‍व वा शास्त्र क्‍व शिष्य: क्‍व व वा गठ।
क्‍व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधे शिवस्थ मे।। 297।।
क्‍व चास्ति क्‍व च वा नास्ति क्यास्ति चैकं क्‍व व द्वयम्।
बहुनात्र किमक्तेन किंचिन्नोतिष्ठते मम।। 298।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--90

सरलतम घटना: परमात्‍माप्रवचनपंद्रहवां

दिनांक 9 फरवरी, 1977,

ओशो आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

महागीता की इस अंतिम प्रश्नोत्तरी में कृपा करके श्रवणमात्र से होने वाली तत्काल—संबोधि, सड़न एनलाइटेनमेंट का राज फिर से कह दें। इस महाघटना के लिए पूर्वभूमिका के रूप में क्या तैयारी जरूरी है? क्या बिना किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तैयारी के तत्काल—संबोधि घटना संभव है?


फिर से पूछते हो। एक ही बात रोज कही जा रही है। एक ही बात को अनंत बार दोहराया जा रहा है। फिर पूछने से न सुन पाओगे। इतने बार दोहराकर समझ में नहीं आता। एक ही बार कहे जाने से समझ में आ सकती है। बात इतनी सरल है। इसलिए प्रश्न बात के दोहराने का नहीं है, प्रश्न तुम्हारी मूर्च्छा का है। तुम इतने सोए हो, कितनी ही बार दोहराओ, कोई अंतर न पड़ेगा। शायद बहुत बार दोहराने से तुम समझो कि कोई लोरी गा रहा है और तुम और गहरी नींद में सो जाओ। अनेक बार दोहराने का परिणाम जागरण नहीं होता।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--89

सिद्धि के भी पार सिद्धि है(प्रवचनचौहदवां)

दिनांक 8 फरवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

जनमउवाच:

क्‍व भूतानि क्‍व देहो वा क्वेंद्रियाणि क्‍व वा मन:।
क्‍व शून्यं क्‍व व नैराश्यं मतस्वरूपे निरंजने।। 285।।
क्‍व शास्त्र क्यात्मविज्ञानं क्‍व वा निर्विषयं मन:।
क्‍व तृप्ति: क्‍व वितृष्णत्व गतद्वंद्वस्थ मे सदा।। 286।।
क्‍व विछा क्‍व न वाउविद्या क्याहं क्येदं मम क्‍व वा।
क्‍व बध: क्‍व च वा मोक्ष: स्वरूपस्थ क्‍व रूपिता।। 287।।
क्‍व प्रारब्‍धानि कर्माणि जीवनमक्तिरयि क्‍व जा।
क्‍व तद्विदेहकैवल्य निर्विशेषस्थ सर्वदा।। 288।।
क्‍व कर्ता क्‍व व वा भोक्ता निकियं स्करणं क्‍व वा।
क्यापरन्धें फलं वा क्‍व निस्वभावस्थ मे सदा।। 289।।
क्‍व लोक: क्‍व मुमुमुर्वा क्‍व योगी ज्ञानवान् क्‍व वा।
क्‍व बद्ध: क्‍व व वा मुक्त: स्वस्वरूयेध्हमद्वये।। 290।।
क्‍व सृष्टि: क्‍व व संहार: क्‍व साव्यं क्‍व च साधनम्।
क्‍व साधक: क्‍व सिद्धिर्वा स्वस्वरूयेऽहमद्वये।। 291।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--88

परमात्‍मा अनुमान नहीं, अनुभव हैप्रवचनतैहरवां

दिनांक 7 फरवरी,1977;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

मैं कभी जीवन के शिखर पर अनुभव करता हूं। ऐसा लगता है कि सब कुछ, जीवन का सब रहस्य पाया हुआ ही है। लेकिन फिर किन्हीं क्षणों में बहुत घनी उदासी और असहायता भी अनुभव करता हूं —मेरी वास्तविक समस्या क्या है, यह मेरी पकड़ में नहीं आता है।

 शिखर जब तक है, तब तक घाटियां भी होंगी। शिखर की आकांक्षा जब तक है, तब तक घाटियों का विषाद भी झेलना होगा। सुख को जिसने मांगा, उसने दुख को भी साथ में ही मांग लिया। और सुख जब आया तो उसकी छाया की तरह दुख भी भीतर आ गया।
हम सुख के नाम तो बदल लेते हैं, लेकिन सुख से हमारी मुक्ति नहीं हो पाती। और जो सुख से मुक्त नहीं, वह दुख से मुक्त नहीं होगा। अष्टावक्र की पूरी उपदेशना एक ही बात की है. द्वंद्व से मुक्त हो जाओ।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--87

पहुंचना हो तो रूकोप्रवचनबाहरवां

दिनांक 6 फरवरी, 1977,
ओशो आश्रम, पूना।

जनम उवाच:

तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धार: कृतो मया।। 277।।
क्‍व धर्म: क्‍व च वा काम: क्‍व चार्थ क्‍व विवेकिता।
क्‍व द्वैत क्‍व च वाउद्वैतं स्वमहिस्त्रि स्थितस्थ मे।। 278।।
क्‍व भूतं क्‍व भविष्यद्वा वर्तमानमयि क्‍व वा।
क्‍व श्तोः क्‍व च वा नित्य स्वमहिमि स्थितस्थ मे।। 279।।
क्‍व चात्मा क्‍व च वानात्मा क्‍व शभं क्याशभं तथा।
क्‍व चिंता क्‍व च वाचिंता स्वमहिमि स्थितस्थ मे।। 280।।
क्‍व स्वन: क्‍व सषप्तिर्वा क्‍व च जागरण तथा।
क्‍व तुरीय भयं वापि स्वमहिथ्यि स्थितस्थ मे।। 281।।
क्‍व दूर क्‍व समीपं वा बाह्य क्याभ्यंतरं क्‍व वा।
क्‍व स्थ्यूं क्‍व च वा ब्लू स्वमहिमि स्थितस्थ मे।। 282।।
क्‍व मृत्युजार्वितं वर क्‍व लोका: क्यास्थ क्‍व लौकिकम्।
क्‍व लय: क्‍व समाधिर्वा स्वमहिमि स्थितस्थ मे।। 283।।
अल त्रिवर्गकथया योगस्थ कथयाध्यलम्।
अर्ल विज्ञानकथया विश्रांतस्थ ममात्मनि।। 284।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--86

स्‍वानुभव और आचरण एक ही घटना—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

दिनांक 5 फरवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

पहला प्रश्न :

'अब मैं नाव्यो बहुत गोपाल', भक्त ऐसा गाता है। क्या भक्त की भांति ज्ञानी भी गाता है?

 गीत अनिवार्य है। नृत्य अनिवार्य है। क्योंकि अंतिम परिणति में उत्सव होगा ही। अगर अंतिम परिणति में उत्सव न हो तो फिर उत्सव कब होगा? गीत और नृत्य तो केवल उत्सव के सूचक हैं। जब वसंत आएगा और वृक्ष अपने पूरे उभार पर होगा, तो फूल खिलेंगे। गंध भी बिखरेगी। और जब दीप जलेगा तो ज्योति भी झरेगी।
गीत तो अनिवार्य है। यह दूसरी बात है कि कौन कैसा गाए, कैसे गाए? भक्त अपने ढंग से गाता, ज्ञानी अपने ढंग से गाता। भक्त का गीत प्रगट है, इतनी का गीत अप्रगट है। भक्त परिधि पर नाचता, ज्ञानी केंद्र पर।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--85

चौथे की तलाशप्रवचनदसवां


दिनांक 4 फरवरी, 1977,
ओशो आश्रम,कोरेगांवपार्क, पूना।
सूत्र:
सप्तोउपि न सषप्तौ च स्वम्मेउयि शयितो न च।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्‍तृप्‍त: पदे पदे।। 270।।
ज्ञ: सचिन्तोउपि निश्चिन्त: सेन्द्रियोऽयि निरिन्द्रिय:।
सुबुद्विरपि निर्बुद्धि साहंकारोघ्नहंकृति:।। 271।।
न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न संगवान्।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किंचिन्न न किंचन।। 272।।
विक्षेयेऽपि न विक्षिप्त: समाधौ न समाधिमान्।
जाडधेउपि न जडो अन्य: पंडित्येउपि न पंडित:।। 273।।
मक्तो यथास्थितिस्वस्थ: कृतकर्तव्यनिर्वृत:।
सम: सर्वत्र वैतृष्णयान्‍न स्मरत्यकृतं कृतम्।। 274।।
न प्रीयते वद्यमानो निद्यमानो न कप्यति।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनंदति।। 275।।
न धावति जनाकीर्ण नारण्यमयशांतधी:।
यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते।! 276।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--84

मन मूर्च्‍छा है—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 3 फरवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :

मैं साक्षीभाव को जगाने के लिए आत्मविश्लेषण, 'इंट्रॉस्पेक्यानं करता हूं। क्या यह पहले कदम के रूप में सही है? कृपापूर्वक समझाएं।

 त्मविश्लेषण तो विचार की प्रक्रिया है, और साक्षी है निर्विचार की दशा। विचार से निर्विचार के लिए कोई मार्ग नहीं जाता। विचार को छोड़ने से निर्विचार का अवतरण होता है।
तो आत्मविश्लेषण तो कतई सही मार्ग नहीं है, अगर साक्षी बनना है।
विश्लेषण का तो अर्थ हुआ, सोचना। साक्षी का अर्थ होता है, बिना सोचे देखना। मात्र जागकर देखना। एक विचार उठा मन में, विश्लेषण तो तत्‍क्षण निर्णय लेता है—अच्छा है विचार, बुरा है विचार, करने योग्य है, न करने योग्य है! इस विचार में पडूं? न पडूं?

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--83

मनुष्‍य, संसार व परमात्‍मा का संधिस्‍थल: ह्रदयग्रंथि-(प्रवचन-आठवां)

दिनांक 2 फरवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम पूना।

सारसूत्र :

निर्मम: शोभते धीर: समलोष्टाश्मकांचन:।
सुभिन्नहृदयग्रंथिर्विनिर्धूतरजस्तम:।। 264।।
सर्वत्रानवधानस्थ न किचिद्वासना हृदि।
मुक्तात्मनो विस्तृप्तस्थ तुलना केन जायते।। 265।।
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नयि न पश्यति।
ब्रूवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनाद्वते!। 266।।
भिमुर्वा भूयतिर्वायि यो निष्काम: स शोभते।
भावेषु गलित) यस्य शोभनाशोभना मति:।। 267।।
क्य स्वाच्छंद्य क्य संकोच: क्य वा तत्त्वविनिश्चय:!
निर्व्याजार्जवभूतस्थ चरितार्थस्य योगिन:।। 268।।
आत्मविश्रांतितृप्तेन निराशेन गतार्तिना।
अंतर्यदनुभूयेत तत्कथं क्रस्ट कथ्यते।। 269।।

अष्‍टावक्र महागीता--प्रवचन--82

परम ज्ञान का अर्थ है परम अज्ञान(प्रवचनसातवां)

दिनांक 1 फरवरी, 1977,
ओशो आश्रम पूना।


पहला प्रश्न :

मेरे नैना सावन— भादौ,
फिर भी मेरा मन प्यासा.......

 न जब तक है तब तक प्यासा ही रहेगा। मन का होना ही प्यास है। अतृप्ति मन का स्वभाव है। मन कभी तृप्त हुआ, ऐसा सुना नहीं। मन कभी तृप्त होगा, ऐसा संभव नहीं। मन तृप्त नहीं हो सकता है। इसीलिए तो संसार में कोई तृप्ति नहीं है, क्योंकि संसार मन का फैलाव है। मन का विस्तार है।
संसार यानी मन। संसार यानी मन के माध्यम से तृप्ति की खोज। जो नहीं हो सकता, उसे करने की चेष्टा। असंभव के लिए प्रयास। जो अस्तित्व के गणित में ही नहीं है, उसकी खोज। इसलिए जन्मों —जन्मों तक भी खोजो, लाख रोओ—धोओ, अंतर न पड़ेगा। मन का स्वभाव प्यास है। जैसे आग गरम, ऐसा मन प्यासा है।