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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा--(भाग-2) -शांडिल्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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रविवार, 10 जून 2018

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--40

मिलन होता हैबीसवां प्रवचन

बीचवां प्रवचन,
30 मार्च1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :
1-प्रार्थना क्या है? और क्या प्रार्थना अपने ही लिए है?
2-अहंकार के पास भी कोई संजीवनी है क्या? जाने कहां से, कैसे और क्यों जी—जी आता है!
3-टी. यू. अंग्रेजी—विभागाध्यक्ष तथा शिवपुरी बाबा के कुछ शिष्यों के संदर्भ सहित नेपाल के    एक मित्र का भगवान से प्रश्न—प्रेम के साथ इतना गहरा भय क्यों जुड़ा रहता है?
4-भगवान! अब तैयार हूं। तारीख तेरह अप्रैल को मेरा इकसठवां जन्मदिन है—आपके चरणों में     संन्यस्त होने के लिए आ गिरूंगा।... आप ही मेरे शेष जीवन के एक मात्र आधार सदगुरु और   इष्टदेव हो!
5-भगवान! क्या इस प्यास का कभी अंत होगा जिसने मुझे दीवाना बना दिया है?... आह! किसे मैं अपने हृदय की बात बताऊं? मैं एकदम अजनबी और नितांत अकेला हूं!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--39

प्रेम ही मंदिर हैउन्नीसवा प्रवचन

उन्‍नीसवां प्रवचन
29 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :


अनन्यभकया तदबुद्धिर्बुद्धिलयादत्यन्तम्।। 96।।
आयुश्चिरयितरेषां तु हानिनास्पदत्वात्।। 97।।
संसृतिरेषाम् भक्ति: स्यान्नाज्ञानात् कारणसिद्धे:।। 98।।
त्रीण्येषां नेत्राणि शब्दलिगाक्षभेदादुद्रवत्।। 99।।
आविस्तिरोभावाकिकारा: स्युः क्रियाफलसयोगात्।। 100।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--38

जगत की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता--प्रेम : (प्रवचनअठारहवां)

28 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :


1-वेदों में वर्णित होमापक्षी की कथा का आशय समझाने के लिए भगवान से निवेदन।

2-क्या कैवल्य में साक्षी भी प्रकाश के साथ समाहित हो जाता है?

3-हे भंते! मा शीला के मन में भाव उठा दीजिए न!...

4-अब हद से गुजर चुकी मुहब्बत तेरी! 

5-प्रार्थना है कि अब रंग चढ़ा दें!

6-संसार क्या है?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--37

ऊर्ध्वगति का आयाम है परमात्मासत्रहवां प्रवचन

सत्रहवां प्रवचन
27 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :

फलस्माद्वादरायणो दृष्टत्वात्।। 91।।
ब्यूत्कमदप्ययस्तथा दृष्टम्।। 92।।
तदैक्यं नानात्वकैत्वमुपाधियोगहानादादित्यवत्।। 93।।
पृथगिति चेन्नापरेणासम्बन्धात् प्रकाशानाम्।। 94।।
न विकारिणस्तु कारणविकारात्।। 95।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--36

मौजूदगी ही उसकी है—सोलहवां प्रवचन

सोलहवां प्रवचन
26 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

1-संसार में ही परमात्मा के छिपे होने का प्रमाण क्या हो?

2-पूर्वजन्म के पाप या प्रारब्ध क्षणमात्र में कट जाते हैं या भोगने पड़ते हैं?

3-मैं पचपन वर्ष का। तीन बार विवाह हुआ और हर बार पत्नी की मृत्यु। अभी भी स्त्री के प्रति      मन ललचाता हूं। मैं क्या करू?

4-मैं शात हो रही हूं या उदास? कृपया मार्ग बताएं।

5-मैंने सब ध्यान बंद कर दिया है। कृपा कर इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करें।

6-यह संभावना भी तो है कि आप के जाने बाद आपका संन्यास धर्म एक वृहत संगठन का    रूप लेगा जिसमें पद—शृंखला और राजनीति भी प्रविष्ट हो जाएगी।

7-दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति के समय, भोजन के समय ध्यान भूल— भूल जाता है।

8-पूरे समय ध्यान की स्थिति क्यों नहीं बनी रहती?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--35

सदगुरु शास्त्रों का पुनर्जन्म है—पंद्रहवां प्रवचन


पंद्रहवां प्रवचन
25 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :


तल्छक्तिर्माया उड्सामान्यात्।। 86 ।।
व्यापकत्वाद्वयाप्यानाम्।। 87 ।।
न प्राणिबुद्धिभ्योऽसम्भवात्।। 88 ।।
निर्मायोच्चावच श्रुतीश्च निर्मिमीते पितृवत्।। 89 ।।
मिश्रोपदेशान्नेति चेन्‍न स्वल्पत्वात्।। 90 ।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--33

क्रांति और उत्कांति—तेरहवां प्रवचन
 तेरहवां प्रवचन
23 मार्च 1978,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।


सूत्र :

उत्कांतिस्मृतिवाक्यशेषाच्च।। 81।।
महापातकिनां त्वातौं।। 82।।
सैकान्तभावो गीतार्थप्रत्यभिज्ञानात्।। 83।।
परां कृत्वैव सर्वेषा तथाह्याह।। 84।।
भजनीयेनाद्वितीयमिदं कृष्णस्य तक्लरूपत्वात्।। 85।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--32

अभीप्सा व प्रतीक्षा की एक साथ पूर्णता—प्रार्थना की पूर्णताबारहवां प्रवचन


 दिनांक 22 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--धर्म क्या है? और आप कैसा धर्म पृथ्वी पर लाना चाहते हैं?

 2--तेरे ही इशारे पर मैंने अपना पूरा प्यार उंडेल दिया। तुझमें उसीको और उसमें तेरे ही रूप    को देखती हूं। क्या मेरी आंखें धोखा खा रही हैं, प्रभु?

       3--आगरा से निकलनेवाले एक पत्र 'रजनीश—प्रेम ' के बाबत एक मित्र का अजीब—सा प्रश्न!

 4--संन्यास लेने के संबंध में अनिर्णय में पडे एक मित्र की समस्या!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--31

पदार्थ: अणुशक्ति: :चेतना: प्रेमशक्ति—ग्‍यारहवां प्रवचन


 दिनांक 21 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

 लध्वपि भक्ताधिकारे महत्वक्षेपकमपरसर्वहानात्।। 76।।
तक्मानत्वादनन्यधर्म: खले बालीवत्।। 77।।
अनिन्द्ययोन्यधिक्रियतेपारम्पर्यात् सामान्यवत्।। 78।।
अतोह्यविपक्कभावानामपि तल्लोके।।79 ।।
क्रमैकणत्युपपत्तेस्तु।। 80 ।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--30

धर्म है मनुष्य के गीत का प्रकट हो जानादसवां प्रवचन


दिनांक 20 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--कार्ल मार्क्स के एक प्रसिद्ध वचन पर प्रश्न।

 2--आपके पास बैठने से जितने शून्य व खाली होते हैं उतना ध्यान करने से नहीं होते हैं। फिर   भी क्या ध्यान की जरूरत है?

 3--आपको समझने में मुझसे बहुत भूल हुई। क्षमा मांगता हूं। आपकी देखना का सारसूत्र क्या   हैं?

 4--परमात्मा की सर्वव्यापकता पर एक मित्र का प्रश्न। स्वामी ब्रह्म वेदाaत के संबंध में प्रश्न। कुछ भी नया करने में भयभीत होता हूं। इस भय से मुक्त कैसे होऊं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--29

भक्ति अकर्मण्यता नहीं, अकर्ताभाव हैनौवां प्रवचन :


 दिनांक 19 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

 सुकृतजत्वात् परहेतुभावाश्च क्रियासु श्रेयस्य:।।७१।।
गौणं त्रैविध्यमितरेण स्तुत्यर्थत्वात् साहचर्यम्।। ७२।।
बहिरन्तरस्थमुभयमवेष्टि सर्ववत्।।७३।।
भूयसामननुष्ठितिरिति चेदाप्रयाणमुपसंहारान्महत्स्वपि।। ७४।। 
स्मृतिकीत्यों: कथादेश्चातौ प्रायश्चित्‍तभावात्।। ७५।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--28

सुख से चुकाओ मूल्य परमात्मा को पाने का—आठवां प्रवचन

दिनांक 18 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--आपको सुनता हूं तो अपने जीवन की व्यर्थता देखकर बहुत उदास हो जाता हूं।... 

 2--आपको पाकर पा रहा हूं कि सब पा गया हूं। हालांकि लोग कहते हैं मैं पागल हो गया हूं।...

 3--परमात्मा को पाने के लिए किस तरह मूल्य चुकाना होगा? क्या सक्रिय ध्यान शरीर को कष्ट     देना नहीं है?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--27

विराट से मैत्री है भक्तिसातवां प्रवचन

सातवां प्रवचन
17 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।


 सूत्र :

तद्यजि पूजायामिरेषा नैवम!।।66।।
पादोदक तु पाद्यमव्याप्ते।।67।।
स्वयमर्पित ग्राह्यमविशेषातध।।68।।
निमित्तगुणानपेक्षपादपराधेषु व्यवस्था।।69।।
पत्रोदेर्दानमन्यथा हि वैशिष्टचम्।।70।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग-2) प्रवचन--26

संसार जड़ है, अध्यात्म फूल हैछठवां प्रवचन

छठवां प्रवचन
16 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :

1--उस फूल का रंग उड़ के सिर्फ बू रह जाए
सर जाए तो जाए आबरू रह जाए
साबित हो मेरी नफी से तेरा इकबाल
मैं इतना मिटू कि सिर्फ तू रह जाए 


2--आवन कहि गये अजहूं न आए लीन्हीं न मोरी खबरिया',
इतना कहने की इजाजत मांगता हूं।


3--रुदन और ध्यान का क्या संबंध है?


4--भक्ति को आप प्रेम की उपमा क्यों देते हैं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग--2) प्रवचन--25

सब जागरण उसका हैपांचवां प्रवचन

पांचवां प्रवचन
15 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

  सूत्र :


नामेति जैमिनि: सम्भवात्।। 61।।
अत्राड़;गप्रयोगाणां यथाकालसम्भवो गुहादिवत्।। 62।।
ईश्वर तुष्टेरेकोऽपि बली।। 63।।
अबन्धोऽर्पणस्य मुखम्।। 64।।
ध्यानवनियमस्तु दृष्टसौकर्यात्।। 65।।


भक्ति एक छलांग है। इसलिए साधन और साध्य का भेद केवल बौद्धिक भेद है। विचार के लिए अनिवार्य है। अनुभव में ऐसी कोई सीमा—साधन अलग, साध्य अलग, इस भांति नहीं है। बीज कब वृक्ष बनता है, कौन रेखा खींचेगा?