गीता दर्शन-(भाग-02)-प्रवचन-047
अध्याय ४
अठारहवां प्रवचन
संशयात्मा विनश्यति
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। ४०।।
और हे अर्जुन भगवत विषय को न जानने वाला तथा
श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है। उनमें भी संशययुक्त
पुरुष के लिए तो न सुख है और न यह लोक है, न परलोक है। अर्थात
यह लोक और परलोक दोनों ही उसके लिए भ्रष्ट हो जाते हैं।
संशय से भरा हुआ, संशय से ग्रस्त व्यक्तित्व विनाश
को उपलब्ध हो जाता है। भगवत्प्रेम से रहित और संशय से भरा न इस लोक में सुख पाता,
न उस लोक में। विनाश ही उसकी नियति है।
दो बातें ठीक से समझ लेनी इस श्लोक में जरूरी हैं।
