साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
जरा-सी चिनगारी काफी है!—दसवां प्रवचन
२० जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
ऐसी भक्ति भरो प्राणों में, सब कीर्तन हो जाए
ऐसा उत्सव दो जीवन को, सब नर्तन हो जाए
मेरे जीवन के पादप को फूल नहीं मिल पाया
मैं हूं ऐसी लहर कि जिसको कूल नहीं कूल पाया
कहते हैं
देवत्व छिपा है पत्थर के प्राणों में
पर मेरे अंतर्मन का सौंदर्य नहीं खिल पाया
ऐसी चोट करो हे शिल्पी! मूर्ति प्रगट हो जाए
मुक्त बनें प्रच्छन्न कलाएं, सब नंदन हो जाए
मैं वह
वीणा हूं जो अब तक पड़ी रही अनगाई
नहीं सजी प्राणों की महफिल नहीं चली पुरवाई
नहीं खिला जीवन का मधुवन कोयल कुहुक न पाई
जला न दीपक, बजी न अब तक प्राणों
की शहनाई
ऐसी तान सुना दो भगवन, प्राणों में भिद जाए
हृत्तंत्री के तार छेड़ दो, बस गायन हो जाए,
ऐसी भक्ति भरो प्राणों में, सब कीर्तन हो जाए
ऐसा उत्सव दो जीवन को, सब नर्तन हो जाए
योग प्रीतम! मैं वही कर रहा
हूं, इसीलिए तो इतना विरोध है। मनुष्य सदियों से रोने का
आदी रहा है। आंसुओं का पाठ उसे सिखाया गया है। धर्म का अर्थ ही उदासीनता धर्म का
अर्थ ही उदासी, ऐसा जहर उसके प्राणों में भरा गया है। यह कुछ
तुम्हारा कसूर नहीं। इस पीड़ा में तुम अकेले नहीं हो, सारी
मनुष्य जाति इसी संताप से घिरी है। और कठिनाई तो तब बहुत जटिल हो जाती है। जब हम
कांटों को फूल समझ लें। तो चुभते भी हैं, फिर भी उन्हें
छोड़ते नहीं। चुभता है, छाती भिदती है, प्राण
रोते हैं, मगर शूल शूल दिखाई नहीं पड़ता। आंखें-संस्कारों से
भरी हैं, वे उसमें फूल ही देखे चली जाती है। तुम्हारे जीवन
को विकृत किया गया है।


