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मंगलवार, 25 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

जरा-सी चिनगारी काफी है!—दसवां प्रवचन
२० जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
ऐसी भक्ति भरो प्राणों में, सब कीर्तन हो जाए
ऐसा उत्सव दो जीवन को, सब नर्तन हो जाए
मेरे जीवन के पादप को फूल नहीं मिल पाया
मैं हूं ऐसी लहर कि जिसको कूल नहीं कूल पाया
 कहते हैं देवत्व छिपा है पत्थर के प्राणों में
पर मेरे अंतर्मन का सौंदर्य नहीं खिल पाया
ऐसी चोट करो हे शिल्पी! मूर्ति प्रगट हो जाए
मुक्त बनें प्रच्छन्न कलाएं, सब नंदन हो जाए
 मैं वह वीणा हूं जो अब तक पड़ी रही अनगाई
नहीं सजी प्राणों की महफिल नहीं चली पुरवाई
नहीं खिला जीवन का मधुवन कोयल कुहुक न पाई
जला न दीपक, बजी न अब तक प्राणों की शहनाई
ऐसी तान सुना दो भगवन, प्राणों में भिद जाए
हृत्तंत्री के तार छेड़ दो, बस गायन हो जाए,
ऐसी भक्ति भरो प्राणों में, सब कीर्तन हो जाए
ऐसा उत्सव दो जीवन को, सब नर्तन हो जाए

योग प्रीतम! मैं वही कर रहा हूं, इसीलिए तो इतना विरोध है। मनुष्य सदियों से रोने का आदी रहा है। आंसुओं का पाठ उसे सिखाया गया है। धर्म का अर्थ ही उदासीनता धर्म का अर्थ ही उदासी, ऐसा जहर उसके प्राणों में भरा गया है। यह कुछ तुम्हारा कसूर नहीं। इस पीड़ा में तुम अकेले नहीं हो, सारी मनुष्य जाति इसी संताप से घिरी है। और कठिनाई तो तब बहुत जटिल हो जाती है। जब हम कांटों को फूल समझ लें। तो चुभते भी हैं, फिर भी उन्हें छोड़ते नहीं। चुभता है, छाती भिदती है, प्राण रोते हैं, मगर शूल शूल दिखाई नहीं पड़ता। आंखें-संस्कारों से भरी हैं, वे उसमें फूल ही देखे चली जाती है। तुम्हारे जीवन को विकृत किया गया है।

सोमवार, 24 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

जो है, उसमें पूरे के पूरे लीन होना समाधि है—नौवां प्रवचन
१९ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
गुमनाम मंजिल दूर है सबेरा
कोई संगी न साथी मैं हूं अकेला
दुनिया की रीत क्या है? भला ऐसी चीज क्या है?
जिसके बिना यह नाव चलती नहीं।
उल्फत का गीत क्या है? जीवन संगीत क्या है?
जिसके बिना यह रात ढलती नहीं!
नदिया की धार कहे, एहसास जीने का मरता नहीं
अपनी अग्नि में जले, ऐसे तो प्यार कोई करता नहीं!
आप ही कहें, क्या कोई रास्ता नहीं?

भगवान स्वरूप! वह मंजिल तो जरूर गुमनाम है, लेकिन दूर नहीं। निकट से भी निकट है। निकट कहें, इतनी भी दूर नहीं। तुम ही हो मंजिल, तुम ही हो यात्री। मार्ग भी तुम्हीं, मंजिल भी तुम्हीं। मार्ग पर चलना भी तुम्हें है। तुम्हारे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। कहीं दूर नहीं जाना, अपने में ही डूब जाना है। देर जाने की धारणा में भटकाव है। और मन सदा दूर ही जाना चाहता है। मन की उत्सुकता दूरी में है। जितनी दूर हो चीज कोई, उतनी लुभावनी--दूर के ढोल सुहावने--उतना खींचती मन को, चाहे हाथ कुछ लगे न लगे।

रविवार, 23 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन--08



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
प्रेम ही धर्म है—आठवां प्रवचन
१८ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम पूना

पहला प्रश्न: भगवान, जैन धर्म में अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद(सह-अस्तित्व) आदि सिद्धांतों का विशेष स्थान  है। लेकिन आज एक समाचार-पत्र में आपके संबंध में एक जैनमुनि, श्री भद्रगुप्त विजय जी का वक्तव्य पढ़ तो आश्चर्य हुआ। ये मुनिश्री आपके कच्छ-प्रवेश के विरोध में लोगों को सब कुछ बलिदान कर देने के लिए आह्वान कर रहे हैं, संगठित कर रहे हैं। अपरिग्रह माननेवालों को कच्छ प्रदेश पर परिग्रह क्यों? और उनके अनेकांतवाद में आपकी जीवनदृष्टि का विरोध क्यों क्या मुनिश्री का लोगों को इस तरह भड़काना शोभा देता है?

चैतन्य कीर्ति! जिन-धर्म और जैन धर्म में बुनियादी भेद है। वैसे ही जैसे बुद्ध-धर्म में और बौद्ध धर्म में। इस आधारभूत भेद को सबसे पहले समझ लेना जरूरी है।
जिन-धर्म से अर्थ है: महावीर, आदिनाथ, नेमिनाथ, मल्लिनाथ, उनका धर्म जो जीते हुए थे, जिन्होंने स्वयं को जाना था। उस आत्मबोध से जो गंगाएं बहीं, आत्मबोध के उन हिमशिखरों से जो सरिताएं उतनी, वह स्वच्छ बोध: जिन-धर्म। बुद्ध ने जो जाना, जागकर जो पहचाना, जीया और कहा, वह बुद्ध-धर्म।

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

बोध क्रांति हैसातवां प्रवचन
१७ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम; पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
खामोश नजर टूटे दिल से हम अपनी कहानी कहते हैं:
बहते हैं आंसू बहते हैं!
कल तक इन सूनी आंखों में शबनम थी चांद-सितारे थे
ख्वाबों की गमकती कलियां थीं दिलकश रंगीन नजारे थे
पर अब हमको मालूम नहीं हम किस दुनिया में रहते हैं।
कृपा कर पता बताएं।

दीपक शर्मा! जीवन दो ढंग से जीया जा सकता है। एक ढंग तो है नींद का। वहां मीठे सपने हैं। पर सपने ही सपने हैं, जो टूटेंगे ही टूटेंगे। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, देर-अबेर की बात है। और जब टूटेंगे तो गहन उदासी छोड़ जाएंगे। जब टूटेंगे तो पतझड़ छा जाएगा। जीवन हाथ से गया सपनों में और मौत द्वार पर खड़ी हो जाएगी। एक और भी जीवन को जीने का ढंग है। वही वास्तविक ढंग है। वह है: जाग कर जीना। सपनों से मुक्त होकर जीना। फिर आनंद की वर्षा है। फिर अमृत की बूंदाबांदी है। फिर फूल खिलते हैं और खिलते ही चले जाते हैं। हाथ ही नहीं भरते, प्राणों का आकाश भी फूलों से भर जाता है।

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रार्थना अंतिम पुरस्कार है—छठवां प्रवचन
१६ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
चमक-चमक कर हजार आफताब डूब गये
हम अपनी शामे-अलम को सहर बना न सके
कृपया, अब बताइये क्या करें?

अब्दुल कदीर!
चांदत्तारे तो ऊगेंगे, डूबेंगे; सूरज ऊगेगा, डूबेगा; इससे तुम्हारे अंतरात्मा की अंधकार नहीं मिट सकता है। बाहर का कोई प्रकाश भीतर के अंधकार को मिटाने में असमर्थ है। वह भरोसा ही छोड़ दो। वह भरोसा रखोगे तो भटकोगे। और वही हम सबका भरोसा है। वहीं हम चूक रहे हैं। बाहर ही धन खोजते हैं कि भीतर की निर्धनता मिट जाए। बाहर ही पद खोजते हज कि भीतर की दीनता मिट जाए। और बाहर की रोशनी पर ही आंखें टिकाते हैं कि भीतर का अंधेरा कट जाए। यह नहीं हो सकता। जो बाहर है बाहर है, जो भीतर है भीतर है। दोनों का कोई तालमेल नहीं। दोनों एक-दूसरे का रास्ता नहीं काटते।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

धर्म क्रांति है, अभ्यास नहीं—पांचवां प्रवचन
१५ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंचा कहां-कहां
न स्वर्ग ही कुछ बोलता न नर्क द्वार खोलता
हर आंख में मैं आंख डाल तसवीर तेरी टटोलता
पहुंच गया कहां-कहां
सांसों के फासले हैं या कि दूरियां ही दूरियां
न तुम ही कुछ हो बोलते मुख से जुबां न खोलते
चलता है कब तलक मुझे यूं सबके दिल टटोलते
तुम कहां और मैं कहां
ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंच गया कहां-कहां
जमीं से मिल सका न पता आसमां लगा सका
ढूंढा नहीं किधर-किधर तुम्हें मगर न पा सका
अब ढूंढता हुआ कि पता तुम्हारा मिल गया
तस्वीर तुम्हारी मेरे दृग में
जैसे कस्तूरी रहती है मृग में

पार्थ प्रीतम कुंडू! यह कबीर का प्रसिद्ध वचन है: कस्तूरी कुंडल बसै, लेकिन इसमें भी बात पूरी समाती नहीं; इसमें भी कुछ छूट जाता है। कबीर भी कहे तो, पर कह नहीं पाए। क्योंकि कस्तूरी और मृग में फासला है। कस्तूरी को मृग से अलग किया जा सकता है--किया जाता है। ऐसे ही तो कस्तूरी मिलती है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रार्थना या ध्यान?—चौथा प्रवचन
१४ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
तमसो मा ज्योतिर्गमय
असतो मा सदगमय
मृत्योर्माऽमृतं गमय
उपनिषद की इस प्रार्थना में मनुष्य की विकसित चेतना के अनुरूप क्या कुछ जोड़ा जा सकता है?

नरेंद्र बोधिसत्व, यह प्रार्थना अपूर्व है! पृथ्वी के किसी शास्त्र में, किसी समय में, किसी काल में इतनी अपूर्व प्रार्थना को जन्म नहीं मिला। इसमें पूरब की पूरी मनीषा सन्निहित है। जैसे हजारों गुलाब से बूंद भर इत्र निकले, ऐसी यह प्रार्थना है। प्रार्थना ही नहीं है,समस्त उपनिषदों का सार है। इसमें कुछ भी जोड़ना कठिन है। लेकिन फिर भी मनुष्य निरंतर गतिमान है, यह अजस्र धारा है मनुष्य की चेतना की, जिसका कोई पारावार नहीं है। यह रोज नित नये आयाम छूती है, नित नये आकाश। बहुत बार ऐसा लगता है, आ गया पड़ाव और फिर आगे और भी उज्ज्वलत्तर शिखर दिखायी पड़ने लगते हैं। लगता है ऐसे कि आ गयी मंजिल, लेकिन हर मंजिल बस सराय ही सिद्ध होती है। और यह शुभ भी है। नहीं तो मनुष्य जीए ही कैसे? विकास है तो जीवन है। निरंतर विकास है तो निरंतर गति है। गत्यात्मकता जीवन है। इस लिए इस प्रार्थना में यूं तो कुछ जोड़ा नहीं जा सकता, ऐसे बिलकुल भरी-पूरी है, और फिर भी कुछ जोड़ा जा सकता है।

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रेम बड़ा दांव हैतीसरा प्रवचन
१३ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, मैं कौन हूं, क्या हूं, कुछ पता नहीं। आपसे अपना पता पूछने आया हूं।

नारायण शंकर! यह पता तुम्हें कोई और नहीं दे सकता। न मैं, न कोई और। यह तो तुम्हें खुद ही अपने भीतर खोदना होगा। बाहर पूछते फिरोगे, भटकाव ही हाथ लगेगा। बहुत मिल जाएंगे पता देनेवाले। जगह-जगह बैठे हैं पता देनेवाले। बिना खोजे मिल जाते हैं। तलाश में ही बैठे हैं कि कोई मिल जाए पूछनेवाला। सलाह देने को लोग इतने उत्सुक हैं, ज्ञान थोपने को एक-दूसरे के ऊपर इतने आतुर हैं कि जिसका हिसाब नहीं। क्योंकि अहंकार को इससे ज्यादा मजा और किसी बात में नहीं आता।
जब भी तुम दूसरे को ज्ञान की बातें देने लगते हो, तो दो बातें सिद्ध हो जाती हैं--दूसरा अज्ञानी है और तुम ज्ञानी हो; दूसरा नहीं जानता और तुम जानते हो। और यह मजा कौन नहीं लेना चाहता। इसलिए मुश्किल है तुम्हें वह आदमी मिलना जो तुम्हें सलाह न दे, ज्ञान न दे। हालांकि कोई किसी से ज्ञान लेता नहीं। और ज्ञान कुछ ऐसी बात है भी नहीं कि काई और दे दे। अच्छा ही है कि लोग लेते नहीं। जो दूसरे से ले लिया, कचरा है।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02




साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
ये फूल लपटें ला सकते हैं—दूसरा प्रवचन
१२ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, आपकी मधुशाला में ढाली जानेवाली शराब पी-पीकर मखमूर हो गया हूं। भगवान, प्यार करने वालों पर दुनिया तो जलती है मगर अपनी मधुशाला के दूसरे पियक्कड़ भी प्रेम के इतने विरोध में हैं--खासकर पचास प्रतिशत भारतीय, जो कि आज दस-बारह वर्षों से आपके साथ हैं। प्रभु, हमारे विदेशी मित्र तो प्यार करनेवालों को देखकर खुश होते हैं, मगर भारतीय सिर्फ जलते ही नहीं बल्कि अपराधजनक दृष्टि से देखते हैं और घंटों व्यंग्यपूर्ण बातचीत करते रहते हैं। यह जमात प्रेम का बस एक ही मतलब जानती है--"काम'। ऐसा क्यों, प्रभु? क्या प्रेम कर कोई और आयाम नहीं है, खासकर नर-नारी के संबंध में?

स्वभाव! भारतीय चित्त सदियों से कलुषित हैं। प्रेम के प्रति निंदा की एक गहन अवधारणा हजारों वर्षों से कूट-कूटकर भारतीय मन में भरी गयी है। वह भारतीय खून का हिस्सा हो गयी है। उसे ही हम संस्कृति कहते हैं, धर्म कहते हैं और बड़े-बड़े सुंदर शब्दों में छिपाते हैं। लेकिन सारे आवरणों के भीतर प्रेम का निषेध है। और प्रेम का निषेध मूलतः जीवन के ही निषेध का एक अंग है।

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01



साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
भगवान श्री रजनीश का पूर्ण मनुष्य—

""...हसन ने कहा," राबिया, तूने तो बात ही बदल दी, तूने तो मुझे बहुत झेंपाया। क्षमा कर, आता हूं, भीतर आता हूं, तू ही ठीक कहती है।'
और राबिया ने कहा,"बाहर तो सब माया है, भ्रम है, सत्य तो भीतर है।'

वहां मैं राजी नहीं हूं। बहार भी सत्य है, भीतर भी सत्य है। तुम्हारी नजर जहां पड़ जाए। तुम बाहर को देखोगे तो भीतर के सत्य से वंचित रह जाओगे। और तुम भीतर देखोगे तो तुम बाहर के सत्य से वंचित रह जाओगे। और अब तक यही हुआ। पूरब ने भीतर देखा, बाहर के सत्य से वंचित रह गया। इसलिए दीन है, दरिद्र है, भूखा है,प्यासा है, उदास है, क्षीण है। जैसे मरणशय्या पर पड़ा है। क्योंकि बाहर तो सब माया है। तो फिर कौन विज्ञान को जन्म दे? कौन उलझे माया में? और कौन खोजे माया के सत्यों को? और माया में सत्य हो कैसे सकते हैं?
इस देश की दरिद्रता में तुम्हारे अध्यात्मवादियों का हाथ है। जाने न सही तो अनजाने सही, मगर हाथ तो है; उसे इनकारा नहीं जा सकता।