गीता दर्शन--(भाग-4) प्रवचन--113
क्षणभंगुरता का बोध—(प्रवचन—तेरहवां)
अध्याय—9
सूत्र:
मां हि पार्थ व्यपाश्त्यि येऽपि स्युः पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रस्तिऽपि यान्ति परां गतिम्।। 32।।
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। 33।।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू।
मामेवैष्यीसि युज्ज्वैवमात्मानं मत्यरायण:।। 34।।
क्योंकि हे अर्जुन, स्त्री, वैश्य, शुद्रादिक तथा पाप योनि वाले भी जो कोई हों? वे भी मेरे शरण होकर परम गीत को ही प्राप्त
होते हैं।
फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्रह्यणजन तथा राजऋषि भक्तजन परम गति को प्राप्त
होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस लोक की प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही
भजन कर।
केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से अचल मन वाला हो? और मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजने वाला हो? तथा मेरी श्रद्धा,भक्ति और प्रेम से विह्लतापूर्वक पूजन करने
वाला हो और मुझ परमात्मा को ही प्रणाम कर।
इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव करके मेरे को ही प्राप्त
होवेगा।
इस सूत्र को सुनकर आधुनिक मन को बहुत धक्का लगेगा। चाह होगी कि यह सूत्र न होता
तो अच्छा था। आज का विचार इस सूत्र को बड़ी कठिनाई पाएगा समझने में।
कृष्ण ने कहा है, क्योंकि हे अर्जुन, स्त्री, वैश्य, शूद्र आदि तथा पाप योनि वाले भी जो कोई भी हों, वे भी मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते
हैं।

