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मंगलवार, 7 नवंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग-4) प्रवचन--113



गीता दर्शन--(भाग-4) प्रवचन--113

क्षणभंगुरता का बोध—(प्रवचन—तेरहवां)
अध्‍याय9
सूत्र:

मां हि पार्थ व्यपाश्त्यि येऽपि स्युः पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रस्तिऽपि यान्ति परां गतिम्।। 32।।
किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। 33।।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरू।
मामेवैष्यीसि युज्ज्वैवमात्मानं मत्यरायण:।। 34।।

क्योंकि हे अर्जुनस्त्रीवैश्यशुद्रादिक तथा पाप योनि वाले भी जो कोई होंवे भी मेरे शरण होकर परम गीत को ही प्राप्त होते हैं।
फिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्रह्यणजन तथा राजऋषि भक्तजन परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस लोक की प्राप्‍त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर।

केवल मुझ परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से अचल मन वाला होऔर मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजने वाला होतथा मेरी श्रद्धा,भक्‍ति और प्रेम से विह्लतापूर्वक पूजन करने वाला हो और मुझ परमात्मा को ही प्रणाम कर।
इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्मा को मेरे में एकीभाव करके मेरे को ही प्राप्त होवेगा।

 स सूत्र को सुनकर आधुनिक मन को बहुत धक्का लगेगा। चाह होगी कि यह सूत्र न होता तो अच्छा था। आज का विचार इस सूत्र को बड़ी कठिनाई पाएगा समझने में।
कृष्ण ने कहा हैक्योंकि हे अर्जुनस्त्रीवैश्यशूद्र आदि तथा पाप योनि वाले भी जो कोई भी होंवे भी मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--112



नीति और धर्म—(प्रवचन—बारहवां)

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--112
अध्‍याय9
सूत्र:

      समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्‍या मयि ते तेषु चाप्यहम्।। 29।।
अपि चेत्सुदराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवलितो हि सः।। 30।।
क्षिपं भवति धर्मात्मा शश्वव्छान्तिं निगव्छीत।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति।। 31।।

मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूंन कोई मेरा अप्रय है और न प्रिय है। परंतु जो भक्त मेरे को प्रेम से भजते हैवे मेरे में और मैं भी उनमें प्रकट हूं।
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त हुआ मेरे को निरंतर भजता हैवह साधु ही मानने योग्य है;क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।

हसलिए वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली शांति को प्राप्त होता है। है अर्जुनु तू निश्चयपूर्वक सत्य जान क्रई मेरा भक्त नष्ट गी होता।

 जीवन के संबंध में एक बहुत बुनियादी प्रश्न इस सूत्र में उठाया गया है। और जो जवाब हैवह आमूल रूप से क्रांतिकारी है। उस जवाब की क्रांति दिखाई नहीं पड़तीक्योंकि गीता का हम पाठ करते हैंसमझते नहीं। हम उसे पढ़ते हैं,दोहराते हैंलेकिन उसकी गहनता में प्रवेश नहीं हो पाता। बल्कि अक्सर ऐसा होता हैजितना ज्यादा हम उसे दोहराते हैंऔर जितना हम उसके शब्दों से परिचित हो जाते हैंउतनी ही समझने की जरूरत कम मालूम पड़ती है। शब्द समझ में आ जाते हैं,तो आदमी सोचता है कि अर्थ भी समझ में आ गया!

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--111



कर्ताभाव का अर्पण—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--111
अध्‍याय9
सूत्र:

पत्रं पष्पं फलं तोर्य यो मे भक्या प्रकछीत।
तदहं भक्मुष्ठतमश्नामि प्रयतात्मन:।। 26।।
यत्करोषि यदश्नासि यज्‍जुएषि ददासि यत्।
यत्तयस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्य मदर्यणम्।। 27।।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कमंबन्धनै:।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विख्सुाए मामुयैष्यसि।। 28।।

तथा है अर्जुनमेरे पूजन में पत्रपुष्यफलजल हत्यादि जो कुछ कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से अर्पण करता हैउस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्रपुष्य,  फल आदि मैं ही ग्रहण करता है।

हसलिए हे अर्जुन तू जो कुछ कर्म करता हैजो कुछ खला हैजो कुछ हवन करता हैजो कुछ दान देता है जो कुछ स्वधर्माचरण रूप तय करता ह्रे वह सब मेरे अर्पण कर। हम प्रकार कर्मो को मेरे अर्पण करने रूप संन्यासयोग से युक्त हुमन वाला तू शुभाशुभ फलरूय कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त हुआ मेरे को ही प्राप्त होवेगा।

 रमात्मा की पूजा भी करनी होतो भी हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है उसे देने कोजिसे हम अपना कह सकें। और जो हमारा ही नहीं हैउसे देने का भी क्या अर्थ हैजो कुछ भी हैउसका ही है। तो पूजा में उसके द्वार पर भी हम जो रखेंगे,उसका ही उसे लौटा रहे हैं।
मनुष्य के पास ऐसा क्या है जो परमात्मा का दिया हुआ नहीं हैअगर उसकी ही चीजें उसे लौटा रहे हैंतो बहुत अर्थ नहीं है। कुछ ऐसा उसे देंजो उसका दिया हुआ न होतो ही पूजा में चढ़ायातो ही पूजा में हमने कुछ अर्पित किया।

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन—110



खोज की सम्‍यक दिशा—प्रवचन—दसवां

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन—110
अध्‍याय9
सूत्र
येऽम्मन्यदेक्ता भक्तयजन्ते श्रद्धायान्त्रिता।
तेऽयि मामेव कौन्तेय यजन्‍त्यविधिपूर्वकम् ।। 23।।
अहं हि सर्वज्ञानां भोक्‍ता च प्रभुरेव च।
न तु मामीभजानन्ति तत्‍वेनातश्व्यवन्ति ते।। 24।।
यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृक्ता।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।। 25।।

और हे अर्जुन यद्यपि श्रद्धा युक्त हुए जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैवे भी मेरे को ही पूजते हैं। किंतु उनका यह पूजन। अविधिपूर्वक हैअर्थात अज्ञानपूर्वक है। क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूं।

परंतु वे मुझे अधियज्ञस्वरूप परमेश्वर को तत्‍व से नहीं जानते है। इसी से गिरते हैअर्थात पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।
कारण यह है कि देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैपितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते है। भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैऔर मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं।  हसलिए मेरे भक्तों का पूनर्जन्म नही होता।

सोमवार, 6 नवंबर 2017

गीता दर्शन-(भाग—4)-प्रवचन-109



वासना और उपासना—प्रवचन—नौवां
गीता दर्शन-(भाग4)-प्रवचन-109
अध्‍याय9

सूत्र:

      ते तं भुक्त्‍वा स्वर्ग्लोकं विशलं क्षीणे पुण्ये मर्त्‍यलोकं विशान्‍ति।
एवं त्रयींधर्ममच्छुयन्‍ना गतरगतं काक्कामा लभन्ते।। 21।।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभिस्त्युक्‍तानां योग्स्सेमं वहाम्यहम्।। 22।।

और वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरूष बारंबार जाने-आने को प्राप्त होते हैं।


और जो अनन्य भाव से मेरे में स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से उपासते हैउन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थिति वाले पुरुषों का योग-क्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूं।

गीता दर्शन-(भाग—4)-प्रवचन-108



जीवन के ऐक्‍स का बोध—अ—मन में—(प्रवचन—आठवां)

गीता दर्शन-(भाग—4)-प्रवचन-108
अध्‍याय9
सूत्र:

तपाम्यहमहं वर्ष निग्ष्टृणान्स्पृउजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चछमर्जुन ।। 19।।
त्रैविद्या मां सोमया: पूतपापा
यज्ञैरिष्टवा स्वग्रतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमामाद्य सुरेन्द्रलस्केम्
अश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।। 20।।

मैं ही सूर्यरूप हुआ तपता हूं तथा वर्क को आकर्षित करता हूं और वर्षाता हूं। और हे अर्जुनमैं ही अमृत और मृत्‍यु एवं सत और असत भीसब कुछ मैं ही हूं।

परंतु जो तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम क्रमों को करने वाले और सोमरस को पीने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरूष मेरे को यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति को चाहते हैवे पुरुष अपने पुण्‍यों के फलरूप इंद्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगता हैं।


 जीवन है एकअस्तित्व है एकलेकिन मन सभी कुछ तोड़कर देखता है। मन जब तक तोड़ न लेतब तक देख ही नहीं पाता है। मन के देखने की प्रक्रिया में ही जीवन खंड-खंड हो जाता है।

रविवार, 5 नवंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--107



मैं ओंकार हूं—(प्रवचन—सातवां)

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--107
अध्‍याय9
सूत्र:
     
पिताहमस्य जगतो माता धाता पिताम्ह:।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च।। 17।।
गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुह्रत्।
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधान बीजमध्ययम्।। 18।।

और हे अर्जुन! मैं ही इस संपूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वालापितामाता और पितामह हूंऔर जानने योग्य पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेदु सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूं।
और है अर्जुन प्राप्त होने योग्य गंतव्य तथा भरण- योषण करने वाला सबका स्वामी,  सबका साक्षीसबका वास स्थान और शरण लेने योग्य तथा हित करने वाला और उत्पत्ति और प्रलयरूय तथा सबका आधारनिधान अर्थात प्रलयकाल में सबका जिसमें लय होता ह्रै और अविनाशीबीज कारण भी मैं ही हूं।


 जैसे मार्ग हैं अनेक और मंजिल एक हैवैसे ही प्रभु के रूप भी हैं अनेकवह जो रूपायित हुआ हैवह एक है। ऐसा नहीं है कि उसे एक ही रूप में देखा जा सके! कोई रूप की सीमा नहीं है। जो जिस रूप में खोजना चाहेउसे खोज ले सकता है। सभी रूप उसके हैं। जो भी हैवही है।

गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--106



गीता दर्शन--(भाग--4) प्रवचन--106
ज्ञान, भक्‍ति, कर्म—प्रवचन—छठवां

अध्‍याय9(106)
            सूत्र:

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्‍वेन पृथक्‍त्‍वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। 12।।
अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमीग्नरहं हुतम्।। 13।।

कोई तो मुझ विराट स्वरूय परमत्‍मा को ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्व भाव से अर्थात जो कुछ है सब वासुदेव ही है,हम भाव से उपासते हैं और दूसरे पृथकत्व भाव से अर्थात स्वामीसेवक भाव से और कोईकोई अच्छे प्रकार से भी उपासते हैं।

क्योंकि श्रोतकर्म अर्थात वेदविहित कर्म मैं हूंयज्ञ मैं हूंस्वधा अर्थात पितरों के निमित्त दिया जाने वाला अन्न मैं हूं औषधि अर्थात सब वनस्‍पतियां मै हूं एवं मंत्र मैं है घृत मैं हूं अग्नि मैं हूं और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूं।

 मार्ग हैं अनेकगंतव्य एक है। यात्रापथ बहुत हैंयात्री भी बहुत हैंयात्रा की विधियां भी बहुत हैंलेकिन जब तक यात्री नहीं मिट जातायात्रापथ नहीं मिट जातायात्रा की विधियां नहीं मिट जातींतब तक वह उपलब्ध नहीं होताजो गंतव्य है।
परमात्मा तक पहुंचने के लिए दो व्यक्तियों के लिए एक ही मार्ग नहीं हो सकताअसंभव हैक्योंकि दो व्यक्ति भिन्न हैं। वे जो भी करेंगेभिन्न होगावे जैसे भी करेंगेभिन्न होगा। और हमें यात्रा वहां से शुरू करनी होती हैजहां हम हैं।