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शुक्रवार, 15 जून 2018

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-06

प्रवचन—छठवां   ( प्रश्‍न एवं उत्तर)
 बंबईदिनांक 20 फरवरी 1972, रात्रि
पहला प्रश्‍न:

     भगवान, काम-वृत्ति के उदाहरण को ध्यान में रखते हुए कृपया बतलाएं कि अचेतन को प्रत्यक्ष देखने के लिए क्या-क्या प्रयोगिक उपाय हैं और कैसे कोई जाने कि वह उससे मुक्त हो गया है?

      अचेतन वास्तव में अचेतन नहीं है। बल्कि वह केवल कम चेतन है अतः चेतन व अचेतन में विपरीत ध्रुवों का भेद नहीं है, बल्कि मात्राओं का भेद है। अचेतन और चेतन दोनों जुड़े हुए हैं, संयुक्त हैं। वे दो नहीं हैं।

      परन्तु हमारा सोचने का जो ढंग है, वह विशेष तर्क की झूठी पद्धति पर आधारित है जो कि प्रत्येक बात को विपरीत ध्रुवों में बांट देती है। वास्तविकता उस तरह कभी भी बंटी हुई नहीं है केवल तर्क ही उस तरह विभाजित है।

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-05

(एक स्थिर मनः प्रभु का द्वार)-ओशो
प्रवचन—पांचवा
बंबईदिनांक 18 फरवरी 1972, रात्रि
निश्‍चल ज्ञानं आसनम।

      निश्‍चल ज्ञान ही आसान है।

      मनुष्य न तो केवल शरीर ही है और न मन ही। वह दोनों है। और यह कहना भी एक अर्थ में गलत है कि वह दोनों है क्योंकि शरीर और मन भी यदि अलग-अलग हैं, तो केवल दो शब्दों के रूप में। अस्तित्व तो एक ही है। शरीर कुछ और नहीं है वरन चेतना की सबसे बाहरी परत है, चेतना की सर्वाधिक स्थूल अभिव्यक्ति। और चेतना कुछ और नहीं बल्कि सर्वाधिक स्थूल अभिव्यक्ति। और चेतना कुछ और नहीं बल्कि सर्वाधिक सूक्ष्म शरीर है, शरीर का सबसे अधिक निखरा हुआ अंग। आप इन दोनों के मध्य में होते हैं।

      ये दो चीजें नहीं हैं, परन्तु एक ही वस्तु के दो छोर हैं। अतः जब कभी ज्ञान निश्‍चल हो जाता है, तो शरीर भी प्रभावित होता है और निश्‍चल ज्ञान से निश्‍चल शरीर भी नि£मत होता है। परन्तु इसका उल्टा सच नहीं है।

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-04

प्रवचन—चौथाा  (प्रश्‍न एवं उत्तर)

 बंबईदिनांक 18 फरवरी 1972, रात्रि
पहला प्रश्‍न:  

     भगवान, कल रात्रि आपने कहा था कि वासनाएं मृत-अतीत से कल्पित भविष्य के बीच लगती हैं। कृपया समझाएं, क्यों और कैसे यह मृत-अतीत इतना शक्तिशाली व प्राणवान साबित होता है कि यह एक व्यक्ति को अंतहीन वासनाओं की प्रक्रिया में बहने के लिए मजबूर कर देता है? कैसे कोई इस प्राणवान अतीत--अचेतन व समष्टि अचेतन से मुक्त हो?

     
      अतीत प्राणवान जरा भी नहीं है, वह पूरी तरह मृत है। परन्तु फिर भी उसमें वजन है--एक मृत-वजन। वह मृत-वजन ही काम करता है। वह शक्तिशाली बिलकुल भी नहीं। क्यों यह मृत-वजन काम करता है, इसे समझ लेना चाहिए।

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-03

(निर्वासना अज्ञात के लिए द्वार)-ओशो

बंबईदिनांक 17 फरवरी, 1972, रात्रि 
प्रवचन—तीसरा  

सर्व कर्म निराकरण आवाहन।

      सब कर्मों के कारण की समाप्ति ही आवाहन है।

      धर्म कोई कर्म-कांड नहीं है, कोई शास्त्र-विधि नहीं है। वास्तव में, जब कोई धर्म मृत हो जाता है, वह कर्म-कांड हो जाता है। धर्म का मृत शरीर ही कर्म-कांड हो जाता है, परन्तु सब जगह कर्म-कांड ही पाया जाता है। यदि आप धर्म को खोजने जाएं, तो आप कर्म-कांड ही पाएंगे। ये सारे नाम--हिंदू, मुसलमान, ईसाई--ये धर्मों के नाम नहीं हैं। ये विशेष कर्म-कांडो के नाम हैं। कर्म-कांड से मेरा तात्पर्य है कि कुछ बाहर की ओर किया जाए ताकि आंतरिक क्रांति पैदा हो सके। यह ओर किया जाए ताकि आंतरिक क्रांति पैदा हो सके। यह विश्‍वास, कि कोई बाह्य क्रिया आंतरिक क्रांति उत्पन्‍न कर सकती है, कर्म-कांडो को जन्म देता है। यह विश्‍वास क्यों पैदा होता है? यह इसलिए पैदा होता है, क्योंकि यह एक बिलकुल प्राकृतिक घटना है। 

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-02

प्रवचन—दूसरा (प्रश्‍न एवं उत्तर)

बंबईदिनांक 16 फरवरी, 1972, रात्रि

पहला प्रश्‍न--
     
      भगवान श्री रजनीश, कल रात्रि आपने कहा कि जो कोई शून्य हो जाते हैं वे घाटी की तरह जो जाते हैं। वे प्रतिक्रिया नहीं करते, वरन संवेदनशील करते हैं, और ऐसे जो ज्योतिर्मय लोग हैं उनके प्रतिसंवेदन अलग-अलग होते हैं। घाटी अपनी-अपनी महान निजता व व्यक्तिगत रूप में प्रतिध्वनि करेगी। अब यह प्रश्‍न उठता है कि जो लोग पूर्ण शून्य को प्राप्त हो गए हैं--मिट गए हैं--उनकी अभी भी निजता और व्यक्तित्व बना रहता है। यदि ऐसा है तो कृपया समझाए कि ऐसा कैसे संभव हो पाता है?
     
      यह अध्यात्म जीवन के विरोधाभासों में से एक है। जितना ही कोई परमात्मा में लीन हो जाता है, उतना ही विशिष्ट वह हो जाता है। यह उसके व्यक्तित्व का विलय नहीं है, वरन उसके अहं का विलय है। यह विलय उसकी निजता का नहीं, वरन उसके अहंकार का विलय है। जितने आप अहंकार-जन्य होते हैं, उतने ही आप दूसरे के जैसे होते हैं, क्योंकि प्रत्येक अहंकारी है।

आत्म पूजा उपनिषद--प्रवचन-01

 उपनिषदों की परंपरा व ध्यान के रहस्य
प्रवचन--पहला 

 दिनांक 15 फरवरी, 1972, रात्रि 

ओशो आश्रम पूूूूना 

ओम्। तस्य निश्‍चितनं ध्यानम्।

ओम्। उसका निरंतर स्मरण ही ध्यान है।

     

  इसके पूर्व कि हम अज्ञात में उतरें, थोड़ी सी बातें समझ लेनी आवशयक हैं। अज्ञात ही उपनिषदों का संदेश। जो मूल है, जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह सदैव ही अज्ञात है। जिसको हम जानते हैं, वह बहुत ही ऊपरी है। इसलिए हमें थोड़ी सी बातें ठीक से समझ लेना चाहिए, इसके पहले कि हम अज्ञात में उतरें। ये तीन शब्द ज्ञात, अज्ञात, अज्ञेय समझ लेने जरूरी है सर्वप्रथम, क्योंकि उपनिषद अज्ञात से संबंधित हैं केवल प्रारंभ की भांति। वे समाप्त होते हैं अज्ञेय में। ज्ञात की भूमि विज्ञान बन जाती है अज्ञात दर्शनशास्त्र या तत्वमीमांसा और अज्ञेय है धर्म से संबंधित।