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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-10



अंतर की खोज-(विविध)
ओशो
दसवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
तीन मुक्ति-सूत्रों के संबंध में सुबह मैंने आपसे बात की। सत्य को जानने की दिशा में, या आनंद की उपलब्धि में, या स्वतंत्रता की खोज में मनुष्य का चित्त सीखे हुए ज्ञान से, अनुकरण से और वृत्तियों के प्रति मरूच्छा से मुक्त होना चाहिए, यह मैंने कहा।
इस संबंध में बहुत से प्रश्न आए हैं। उन पर हम विचार करेंगे।

बहुत से मित्रों ने पूछा है कि यदि शास्त्रों पर श्रद्धा न हो, महापुरुषों पर विश्वास न हो, तब तो हम भटक जाएंगे, फिर तो कैसे ज्ञान उपलब्ध होगा?

ऐसा प्रश्न स्वाभाविक है। मन को यह खयाल आता है कि यदि महापुरुषों पर, शास्त्रों पर श्रद्धा न करेंगे तो भटक जाएंगे। मगर बड़े आश्चर्य की बात है, हम यह नहीं सोचते कि श्रद्धा करते हुए भी हम भटकने से कहां बच सके हैं। विश्वास करते हुए भी क्या हम भटक नहीं रहे हैं? भटक नहीं गए हैं? विश्वास हमें कहां ले जा सका है। विश्वास कहीं ले जा भी नहीं सकता। क्यों?

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-09



अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
नौवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक संध्या एक पहाड़ी सराय में एक नया अतिथि आकर ठहरा। सूरज ढलने को था, पहाड़ उदास और अंधेरे में छिपने को तैयार हो गए थे। पक्षी अपने निबिड़ में वापस लौट आए थे। तभी उस पहाड़ी सराय में वह नया अतिथि पहुंचा। सराय में पहुंचते ही उसे एक बड़ी मार्मिक और दुख भरी आवाज सुनाई पड़ी। पता नहीं कौन चिल्ला रहा था? पहाड़ की सारी घाटियां उस आवाज से...लग गई थीं। कोई बहुत जोर से चिल्ला रहा था--स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता।
वह अतिथि सोचता हुआ आया, किन प्राणों से यह आवाज उठ रही है? कौन प्यासा है स्वतंत्रता को? कौन गुलामी के बंधनों को तोड़ देना चाहता है? कौनसी आत्मा यह पुकार कर रही? प्रार्थना कर रही?
और जब वह सराय के पास पहुंचा, तो उसे पता चला, यह किसी मनुष्य की आवाज नहीं थी, सराय के द्वार पर लटका हुआ एक तोता स्वतंत्रता की आवाज लगा रहा था।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-08



अंतर की खोज-(विविध)
ओशो
आठवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
सत्य की यात्रा पर मनुष्य का सीखा हुआ ज्ञान ही बाधा बन जाता है, यह पहले दिन की चर्चा में मैंने कहा। सीखा हुआ ज्ञान दो कौड़ी का भी नहीं। और जो सीखे हुए, पढ़े हुए ज्ञान के आधार पर सोचता हो कि जीवन के प्रश्न को हल कर लेगा, वह नासमझ ही नहीं, पागल है। जीवन के ज्ञान को तो स्वयं ही पाना होता है किसी और से उसे नहीं सीखा जा सकता।
दूसरे दिन की चर्चा में मैंने आपसे कहा कि जिसका अहंकार जितना प्रबल है वह स्वयं के और परमात्मा के बीच उतनी ही बड़ी दीवाल खड़ी कर लेता है। मैं हूं, यही भाव, जो सबमें छिपा है उससे नहीं मिलने देता। अहंकार की बूंद जब परमात्मा के सागर में स्वयं को खोने को तैयार हो जाती है तभी उसे जाना जा सकता है जो सत्य है और सबमें है। यह मैंने दूसरे दिन आपसे कहा।
और आज सुबह तीसरी बात मैंने कही कि हम सोए हुए हैं, मर्ूच्छित हैं। और जब तक हम सोए हुए हैं तब तक हमें सत्य का कोई अनुभव नहीं हो सकेगा।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-07



अंतर की खोज-(विविध)
ओशो
सातवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक अत्यंत वीरानी पहाड़ी सराय में मुझे ठहरने का मौका मिला था। संध्या सूरज के ढलते समय जब मैं उस सराय के पास पहुंच रहा था, तो उस वीरान घाटी में एक मार्मिक आवाज सुनाई पड़ रही थी। आवाज ऐसी मालूम पड़ती थी जैसे किसी बहुत पीड़ा भरे हृदय से निकलती हो। कोई बहुत ही हार्दिक स्वर में, बहुत दुख भरे स्वर में चिल्ला रहा था: स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। और जब मैं सराय के निकट पहुंचा, तो मुझे ज्ञात हुआ, वह कोई मनुष्य न था, वह सराय के मालिक का तोता था, जो यह आवाज कर रहा था।
मुझे हैरानी हुई। क्योंकि मैंने तो ऐसा मनुष्य भी नहीं देखा जो स्वतंत्रता के लिए इतने प्यास से भरा हो। इस तोते को स्वतंत्र होने की ऐसी कैसी प्यास भर गई? निश्चित ही वह तोता कैद में था, पिंजड़े में बंद था। और उसके प्राणों में शायद मुक्त हो जाने की आकांक्षा अंकुरित हो गई थी।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-06



अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
छठा-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से मैं अपनी चर्चा शुरू करना चाहूंगा।
एक राजा शिकार को निकला था। जंगल में रास्ता भटक गया, रात हो गई, अपने साथियों से बिछुड़ गया। दूर थोड़ा सा प्रकाश दिखाई पड़ा, उस ओर गया, पाया कि जंगल के बीच ही एक छोटी सी सराय थी। वह उसमें ठहरा। सुबह उसने उस सराय के मालिक को कहा, क्या कुछ अंडे मिल सकेंगे? अंडे उपलब्ध थे। उसने सुबह अंडे लिए, दूध लिया और पीछे पूछा कि क्या दाम हुआ? उस सराय के बूढ़े मालिक ने कहा, सौ रुपये। वह राजा हैरान हो गया। उसने बड़ी महंगी चीजें जीवन में खरीदी थीं लेकिन दो अंडों के दाम सौ रुपये होंगे इसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। उसने उस सराय के मालिक को कहा, आर एग्स सो रेयर हियर? क्या अंडे इतनी मुश्किल से यहां मिलते हैं कि सौ रुपये उनके दाम हो जाएं? वह बूढ़ा मालिक हंसा और उसने कहा, एग्स आर नॉट रेयर सर, बट किंग्स आर। उसने कहा, अंडे तो मुश्किल से नहीं मिलते, लेकिन राजा बड़ी मुश्किल से मिलते हैं।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-05



अंतर की खोज-(विवि

ओशो
पांचवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
बहुत से प्रश्न मेरे पास आए हैं। अनेक प्रश्न एक जैसे हैं, इसलिए कुछ थोड़े से प्रश्नों में सभी प्रश्नों को बांट कर आपसे चर्चा करूंगा तो आसानी होगी।
मैंने कल कहा: विश्वास धर्म नहीं है, वरन विचार और विवेक धर्म है। श्रद्धा अंधी है। और जो अंधा है वह सत्य को नहीं जान सकेगा।

इस संबंध में बहुत से प्रश्न पूछे गए हैं और उनमें पूछा गया है कि यदि हम श्रद्धा न रखेंगे, यदि हम विश्वास न रखेंगे, तब तो हमारा मार्ग भटक जाएगा।

यह वैसा ही है जैसे एक अंधे आदमी को हम कहें कि तुम अपने हाथ में जो लकड़ी लिए घूमता है, अपनी आंखों का इलाज करवा ले और इस लकड़ी को फेंक दे, तो वह अंधा आदमी कहे, माना मैंने कि आंखों का इलाज तो मुझे करवा लेना है लेकिन लकड़ी को अगर मैं फेंक दूंगा तो भटक जाऊंगा। बिना लकड़ी के तो मैं चल ही नहीं पाता हूं।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-04



अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
चौथा-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं संध्या की इस बातचीत को शुरू करूंगा।
एक राजदरबार में एक बहुत अनूठे आदमी का आना हुआ। उस आदमी का अनूठापन इस बात में था कि उसने उस सम्राट को कहा, तुम इतनी बड़े पृथ्वी के अकेले मालिक हो, तुमसे बड़ा सम्राट कभी हुआ नहीं, तो यह शोभा नहीं देता है कि तुम मनुष्यों जैसे वस्त्र पहनो। मैं तुम्हारे लिए देवताओं के वस्त्र लाकर दे सकता हूं।
देवताओं के वस्त्र न तो कभी देखे गए थे और न सुने गए थे। राजा के अहंकार को प्रेरणा मिली और उसने कहा, कितना भी खर्च करना पड़े, कोई भी व्यवस्था करनी पड़े, मैं तैयार हूं, लेकिन देवताओं के वस्त्र मुझे चाहिए। वह व्यक्ति राजी हो गया कि छह महीने के भीतर मैं वस्त्र लाकर दे दूंगा, लेकिन जो भी खर्च उठाना पड़ेगा; कितना ही खर्च हो उसकी कोई गिनती न रखी जाए, छह महीने के बाद मैं वस्त्र ला दूंगा। राजा राजी हो गया। उसके दरबारियों ने समझा कि यह निरा धोखा है। देवताओं के वस्त्र कहां से लाए जा सकते हैं? यह सिर्फ राजा को लूटने का उपाय है।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-03



अंतर की खोज-(विविध)

ओशो
तीसरा-प्रवचन
एक छोटी सी कहानी से मैं आने वाली इन तीन दिनों की चर्चाओं को शुरू करूंगा।
एक राजधानी में एक संध्या बहुत स्वागत की तैयारियां हो रही थीं। सारा नगर दीयों से सजाया गया था। रास्तों पर बड़ी भीड़ थी और देश का सम्राट खुद गांव के बाहर एक संन्यासी की प्रतीक्षा में खड़ा था। एक संन्यासी का आगमन हो रहा था। और जो संन्यासी आने को था नगर में, सम्राट के बचपन के मित्रों में से था। उस संन्यासी की दूर-दूर तक सुगंध पहुंच गई थी। उसके यश की खबरें दूर-दूर के राष्ट्रों तक पहुंच गई थीं। और वह अपने ही गांव में वापस लौटता था, तो स्वाभाविक था कि गांव के लोग उसका स्वागत करें। और सम्राट भी बड़ी उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा में नगर के द्वार पर खड़ा था।
संन्यासी आया, उसका स्वागत हुआ, संन्यासी को राजमहल में लेकर सम्राट ने प्रवेश किया। उसकी कुशलक्षेम पूछी। वह सारी पृथ्वी का चक्कर लगा कर लौटा था। राजा ने अपने मित्र उस संन्यासी से कहा, सारी पृथ्वी घूम कर लौटे हो, मेरे लिए क्या ले आए हो? मेरे लिए कोई भेंट?

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-02



अंतर की खोजे-(विविध)
ओशो
दूसरा-प्रवचन
मनुष्य के मन पर शब्दों का भार है; और शब्दों का भार ही उसकी मानसिक गुलामी भी है। और जब तक शब्दों की दीवालों को तोड़ने में कोई समर्थ न हो, तब तक वह सत्य को भी न जान सकेगा, न आनंद को, न आत्मा को। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं।
सत्य की खोज में--और सत्य की खोज ही जीवन की खोज है--स्वतंत्रता सबसे पहली शर्त है। जिसका मन गुलाम है, वह और कहीं भला पहुंच जाए, परमात्मा तक पहुंचने की उसकी कोई संभावना नहीं है। जिन्होंने अपने चित्त को सारे बंधनों से स्वतंत्र किया है, केवल वे ही आत्माएं स्वयं को, सत्य को और सर्वात्मा को जानने में समर्थ हो पाती हैं।

अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-01



अंतर की खोज-(विविध)
ओशो
पहला-प्रवचन
एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करूंगा।
एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए आमंत्रित किया। वह फकीर बड़ी खुशी से राजी हो गया। लेकिन मस्जिद में जाने के बाद, जहां कि गांव के बहुत से लोग इकट्ठा हुए थे, उस फकीर ने मंच पर बैठ कर कहा: मेरे मित्रो, मैं जो बोलने को हूं, जिस संबंध में मैं बोलने वाला हूं, क्या तुम्हें पता है वह क्या है? बहुत से लोगों ने एक साथ कहा: नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं है। वह फकीर मंच से नीचे उतर आया और उसने कहा: ऐसे अज्ञानियों के बीच बोलना मैं पसंद न करूंगा, जो कुछ भी नहीं जानते। जो कुछ भी नहीं जानते हैं उस विषय के संबंध में जिस पर मुझे बोलना है, उनके साथ कहां से बात शुरू की जाए? इसलिए मैं बात शुरू ही नहीं करूंगा। वह उतरा और वापस चला गया।