अंतर की खोज-(विविध)
दसवां-प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
तीन मुक्ति-सूत्रों के संबंध में सुबह मैंने आपसे बात की। सत्य को
जानने की दिशा में, या आनंद की उपलब्धि में, या
स्वतंत्रता की खोज में मनुष्य का चित्त सीखे हुए ज्ञान से, अनुकरण
से और वृत्तियों के प्रति मरूच्छा से मुक्त होना चाहिए, यह
मैंने कहा।
इस संबंध में बहुत से प्रश्न आए हैं। उन पर हम विचार करेंगे।
बहुत से मित्रों ने पूछा है कि यदि शास्त्रों पर
श्रद्धा न हो, महापुरुषों पर विश्वास न हो, तब
तो हम भटक जाएंगे, फिर तो कैसे ज्ञान उपलब्ध होगा?
ऐसा प्रश्न स्वाभाविक है। मन को यह खयाल आता है कि यदि महापुरुषों पर, शास्त्रों पर श्रद्धा न करेंगे तो भटक जाएंगे। मगर बड़े आश्चर्य की बात है,
हम यह नहीं सोचते कि श्रद्धा करते हुए भी हम भटकने से कहां बच सके
हैं। विश्वास करते हुए भी क्या हम भटक नहीं रहे हैं? भटक
नहीं गए हैं? विश्वास हमें कहां ले जा सका है। विश्वास कहीं
ले जा भी नहीं सकता। क्यों?


