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बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--219

परतामात्‍मा को झेलने का पात्रता

(प्रवचनइक्‍कीसवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

 सजय उवाच:
ड़त्यहं वासुदेवस्य यार्थस्य च महात्मन:।
संवादभिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।। 74।।
व्याक्यसादाच्‍छूतवानेतदगह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्‍साक्षाक्कथयत स्वयम्।। 75।।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयो पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु:।। 76।।
तव्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूयमत्यद्भुतं हरे:।
विस्मयो मे महान् राजन्हष्यामि च युन: पुन:।। 77।।
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पाथों धनर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिमर्तिर्मम।। 78।।

इसके उपरांत संजय बोला, हे राजन, इस प्रकार मैने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अदभुत रहस्ययुक्त और रोमांचकारक संवाद को सुना।
श्री व्यासजी की कृपा से दिव्‍य—दृष्टि के द्वारा मैने हम परम रहस्ययुक्त गोयनीय योग को साक्षात कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान से सुना है।
इसीलिए हे राजन, श्रीकृष्ण भगवान और अर्जुन के हम रहस्ययुक्तु कल्याण्स्कारक और अदभुत संवाद को पुनः—युन: स्मरण करके मैं बारंबार हर्षित होता हूं।
तथा हे राजन, श्री हरि के उस अति अदभुत रूप को भी पुन—पुन: स्मरण करके मेरे चित्त में महान विस्मय होता है और मैं बारंबार हर्षित होता हूं।
हे राजन, विशेष क्या कहूं! जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान हैं और जहां गांडीव धनुषधारी अर्जुन है, वही पर श्री? विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--218

मनन और निदिध्‍यासन(प्रवचनबीसवां)

अध्‍याय—18
सूत्र--

            कच्चिदेतव्छ्रुतं पार्थ त्‍वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिमानसंमोह: मनष्टस्ते धनंजय।। 72।।

अर्जन उवाच:
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्‍धा त्‍वत्ससादान्मयाव्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्‍ये वचनं तव।। 73।।

इस प्रकार गीता का माहात्म्य कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, है पार्थ, क्या यह मेरा वचन तूने एकाग्र चित्त से श्रवण किया? और हे धनंजय, क्या तेरा स्नान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ?
इस प्रकार भगवान के पूछने पर अर्जुन बोला, हे अच्‍युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिए मैं संशयरहित हुआ स्थित हूं और आपकी आज्ञा पाल करूंगा।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--217

गीताज्ञानयज्ञ(प्रवचनउन्‍नीसवां)

अध्‍याय—18
प्रवचन—

            अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयो:।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट स्‍यामिति मे मति:।। 70।।
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादीय यो नर:।
सोऽपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राम्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।। 71।।

तथा हे अर्जुन, जो पुरूष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद— रूप गीता को पढ़ेगा अर्थात नित्य पाठ करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान— यज्ञ से पूजित होऊंगा, ऐसा मेरा मत है।
तथा जो पुरूष श्रद्धायुक्त और दोष— दृष्टि से रहित हुआ इस गीता का श्रवण— मात्र भी करेगा, वह भी पापों से मुक्‍त हुआ पुण्य करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होवेगा।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--216

आध्‍यात्‍मिक संप्रेषण संप्रेषण की गोपनीयता

(प्रवचनअठारहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

हदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्‍यसूयीत।। 67।।
य इमं परमं गुह्मं मद्भक्तेम्बीभधास्यति।
भक्‍ति मयि परां कृत्या मामैवैष्यत्यसंशय:।। 68।।
न च तस्मान्मनुष्येधु कीश्चन्मे प्रियकृत्तम:।
भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।। 69।।

है अर्जुन, हस कार तेरे खत के लिए कहे हुए इस गीतारूप परम रहस्य को किसी काल में भी न तो तपरहित मनुष्य के प्रति कहना चाहिए और न भक्तिरीहत के प्रति तथा न बिना सुनने की इच्छा वाले के प्रति ही कहना चलिए; एवं जो मेरी निंदा करता है उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिए।
क्योंकि जो पुरुष मेरे में परम प्रेम करके इस परम गुह्म रहस्य गीता को मेरे भक्तों में कहेगा, वह निस्संदेह मेरे को ही प्राप्त होगा।
और न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई है, और न उससे बढ़कर मेरा अत्यंत प्यारा पृथ्वी में दूसरा कोई होवेगा।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--215

समर्पण का राज--(प्रवचनसत्रहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

सर्वगुह्मतमं भूय: श्रृणु मे परमं वचः।
हष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।। 64।।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामैवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।। 65।।
सर्वधर्मान्परित्‍यज्य मामेकं शरणं ब्रज।
अहं त्वा सर्वपापेध्यो मीक्षयिष्यामि मा शुचः।। 66।।

इतना कहने पर भी अर्जुन का कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण श्रीस्कृष्ण भगवान फिर बोले कि है अर्जुन, संपूर्ण गोयनीयों से भी अति गोयनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन, क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है, हमसे यह परम हितकारक वचन मैं तेरे लिए कहूंगा।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--214

संसार ही मोक्ष बन जाए(प्रवचनसोलहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            यदहंकारमाश्रित्य न योत्‍स्‍य इति मन्यसे।
मिथ्‍यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्थ्यां नियोक्ष्यति।। 59।।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छीस यन्महात् कीरष्यवशेउपि तत्।। 60।।
र्इश्वर: सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। 61।।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्‍प्रसादात् परां शान्ति स्थानं प्राप्‍स्‍यसि शाश्वतम।। 62।।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्माशह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्‍छसि तथा कुरु।। 63।।

और जो तू अहंकार को अवलंबन करके ऐसे मानता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा, तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है, क्योंकि क्षत्रियपन का स्वभाव तेरे को जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा। और हे अर्जुन, जिस कर्म को तू मोह से नहीं करना चाहता है उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--213

गीता—पाठ और कृष्‍ण–पूजा—(प्रवचन—प्रंदहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

ब्रह्मभूत: प्रसन्‍नत्‍मा न शोचिई न काङ्क्षति।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते यराम्।। 54।।
भक्त्‍या मामीभजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वत:।
ततो मां तत्‍वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।। 55।।
सर्क्कर्माण्यीप सदा कुर्वाणो मद्व्ययाश्रय:।
मत्प्रसादादवानोति शाश्वतं पदमध्ययम्।। 56।।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्‍पर:।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्‍चित्त: सततं भव।। 57।।
मच्चित: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तश्ष्यिसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्‍न श्रोष्यीस विनङ्क्ष्‍यसि।। 58।।

फिर वह सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित हुआ प्रसन्नचित्त वाला पुरुष न तो किसी वस्तु के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है एवं सब भूतों में समभाव हुआ मेरी परा— भक्‍ति को प्राप्त होता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--212

पात्रता और प्रसाद—(प्रवचन—चौदहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

अमक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यतिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगव्छीत।। 49।।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाम्नोति निबोध मे।
समामेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या पर।।। 50।।
बुद्धया विशुद्धया युक्‍तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्त्रिषयांस्‍त्‍यक्‍त्‍वा राग्द्धेशै व्युदस्य च।। 51।।
विविक्तसेवी लथ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगयरो नित्यं वैराग्य समुपाश्रित:।। 52।।
अहंकार बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुव्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 53।।

तथा है अर्जुन, सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्‍पृहारहित और जीते हुए अंतकरण वाला पुरुष संन्यास के द्वारा भी परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है अर्थात क्रियारहित हुआ शुद्ध सच्चिदानंदघन परमात्मा की प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
इसलिए हे कुंतीपुत्र, अंतःकरण की शुद्धिरूप सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जैसे सच्चिदानंदधन ब्रह्म को प्राप्त होता है तथा जो तत्वज्ञान की परा— निष्ठा है, उसको भी तू मेरे से संक्षेय में जान।
हे अर्जुन, विशुद्ध बुद्धि से युक्त, एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला तथा मिताहारी जीते हुए मन, वाणी व शरीर वाला और दृढ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष निरंतर ध्यान— योग के परायण हुआ सात्‍विक धारणा से अंतःकरण को वश में करके तथा शब्दादिक विषयों को त्यागकर और राग—द्वेष की नष्ट करके तथा अहंकार, बल घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह, को त्यागकर मम्‍तारहित और शांत हुआ सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--211

स्‍वधर्म, स्‍वकर्म और वर्ण—(प्रवचन—तेरहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            स्‍वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तव्छृणु।। 45।।
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमथ्यर्ब्य सिद्धिं विन्दति मानव:।। 46।।
श्रेयाक्यधर्मा विगुणः परधर्माफ्लनुष्ठितात्।
स्वभावनिक्तं कर्म कुर्वब्रानोति किल्‍बिषम्।। 47।।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोश्मीय न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।। 48।।

एवं इस अपने—अपने स्वाभाविकि कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्‍तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परंतु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म मैं लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन। हे अर्जुन, जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाक्कि कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता हे।
इसलिए अच्छी कार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
अतएव है कुंतीपुत्र, दोषयुक्त भी स्वाभाविक कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि धुएं से अग्नि के सदृश सब ही कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं।

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--210

गुणातीत है आनंद—(प्रवचन—बारहवां)

अध्‍याय—8
सुत्र—

ब्रह्यणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतय।
कर्माणि प्रीवभक्तानि स्वभाअभवैर्गुणै।। 41।।
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। 42।।
शौर्य तेजी धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्‍यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। 43।।
कृषिगौरमवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्क्कं कर्म शूद्रस्‍यापि स्वभावजम्।। 44।।

इसलिए हे परंतप, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के तथा शूद्रों के भी कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर विभक्त किए गए हैं।
शम अर्थात अंतःकरण का निग्रह, दम अर्थात इंद्रियों का दमन, शौच अर्थात बाहर— भीतर की शुद्धि, तय अधर्म धर्म के लिए कष्ट सहन करना, क्षांति अर्थात क्षमा— भाव एवं आर्जव अर्थात मन, इंद्रिय और शरीर की सरलता, आस्तिक बुद्धि, ज्ञान और विज्ञान, ये तो ब्रह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। और शौर्य, तेज, धृति अर्थात धैर्य, चतुरता और युद्ध में भी न भागने का स्वभाव एवं दान और स्वामी— भाव, ये सब क्षत्रिय के स्वाभाक्कि कर्म हैं।
तथा खेती, गौपालन और क्रय— विक्रय रूप सत्य व्‍यवहार, वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। और सब वर्णो की सेवा करना, यह शूद्र का स्वाभाक्कि कर्म है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--209

तामस, राजस और सात्‍विक सुख—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            सुखं त्विदानीं त्रिविधं मृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासद्रमते यत्र दुखान्तं च निगच्‍छति।। 36।।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतीयमम्।
तत्सुखं सात्‍विक प्रोक्तमात्मबुध्यिसादजम्।। 37।। 
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोयमम्।
परिणामे विषीमव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।। 38।।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन।
निद्रलस्थ्यमादोत्‍थं तत्‍तामसमुदाह्रतम्।। 39।।
न तदस्ति पृथ्‍विव्यां वा दिवि दैवेषु वा पुन:।
सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्‍तं यदैभि:स्यत्मिभिर्गुणै।। 40।।