अध्याय—18
सूत्र—
सजय उवाच:
ड़त्यहं वासुदेवस्य यार्थस्य च महात्मन:।
संवादभिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।। 74।।
व्याक्यसादाच्छूतवानेतदगह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षाक्कथयत स्वयम्।। 75।।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयो पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु:।। 76।।
तव्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूयमत्यद्भुतं हरे:।
विस्मयो मे महान् राजन्हष्यामि च युन: पुन:।। 77।।
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पाथों धनर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिमर्तिर्मम।। 78।।
इसके उपरांत संजय बोला, हे राजन, इस प्रकार मैने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अदभुत रहस्ययुक्त और रोमांचकारक संवाद को सुना।
श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य—दृष्टि के द्वारा मैने हम परम रहस्ययुक्त गोयनीय योग को साक्षात कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान से सुना है।
इसीलिए हे राजन, श्रीकृष्ण भगवान और अर्जुन के हम रहस्ययुक्तु कल्याण्स्कारक और अदभुत संवाद को पुनः—युन: स्मरण करके मैं बारंबार हर्षित होता हूं।
तथा हे राजन, श्री हरि के उस अति अदभुत रूप को भी पुन—पुन: स्मरण करके मेरे चित्त में महान विस्मय होता है और मैं बारंबार हर्षित होता हूं।
हे राजन, विशेष क्या कहूं! जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान हैं और जहां गांडीव धनुषधारी अर्जुन है, वही पर श्री? विजय, विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है।
