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रविवार, 7 मई 2017

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दसवां प्रवचन-(समर्पण ही सत्संग है)
दिनांक 30 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
दुर्लभं त्रैयमेवैवत् देवानुग्रह हेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुयं महापुरुषसंश्रयः।।
मनुष्य देह, मुमुक्षा और महापुरुष का आश्रय, ये तीनों अति दुर्लभ हैं--अलग-अलग होकर भी। जब तीनों एक साथ मिलें तब तो परमात्मा का अनुग्रह ही है। तब मोक्ष करीब है। फिर भी आप चूक सकते हैं।
भगवान, हमारे लिए इस सुभाषित की विशद व्याख्या करने की अनुकंपा करें।

सहजानंद, मनुष्य एक चौराहा है, जहां से सब दिशाओं में मार्ग जाते हैं। यही उसकी विशिष्टता है। अनंत संभावनाएं मनुष्य के लिए अपना द्वार खोले खड़ी हैं। मनुष्य जो भी होना चाहे हो सकता है। पशुओं का भाग्य होता है, मनुष्य का कोई भाग्य नहीं। कुत्ता कुत्ते की तरह ही पैदा होगा, कुत्ते की तरह ही जीएगा, कुत्ते की तरह ही मरेगा।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

नौवां प्रवचन-(योग ही आनंद है)
दिनांक 28 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, आप सदा आनंदमग्न हैं, इसका राज क्या है? मैं कब इस मस्ती को पा सकूंगा?

योगानंद, मैं तुम्हें नाम दिया हूं योगानंद का, उसमें ही सारा राज है।
मनुष्य दो ढंग से जी सकता है। या तो अस्तित्व से अलग-थलग, या अस्तित्व के साथ एकरस। अलग-थलग जो जीएगा, दुख में जीएगा--चिंता में, संताप में। यह स्वाभाविक है। क्योंकि अस्तित्व से भिन्न होकर जीने का अर्थ है: जैसे कोई वृक्ष पृथ्वी से अपनी जड़ों को अलग कर ले और जीने की चेष्टा करे। मुरझा जाएगा, पत्ते कुम्हला जाएंगे, फूल खिलने बंद हो जाएंगे। वसंत तो आएगा, आता रहेगा, मगर वह वृक्ष कभी दुल्हन न बनेगा, दूल्हा न बनेगा। उसके लिए वसंत नहीं आएगा।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
आठवां प्रवचन-(सवाल अहिंसा का नहीं,कोमलता का)

दिनांक 28 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः। सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलाभै सर्वग्रंथीनां विप्रमोक्षः।।
आहार की शुद्धि होने पर सत्व की शुद्धि होती है, सत्व की शुद्धि होने पर ध्रुव स्मृति की प्राप्ति होती है। और स्मृति की प्राप्ति से समस्त ग्रंथियां खुल जाती हैं।
भगवान, छांदोग्य उपनिषद के इस सूत्र की व्याख्या करने की अनुकंपा करें।

सत्यानंद, आहार की शुद्धि होने पर सत्व की शुद्धि होती है। आहार का अर्थ है: जो भी बाहर से भीतर लिया जाए। जो भीतर है, वह सत्व। जो स्वरूप है, वह सत्व। और जो उस पर आच्छादित होता है, वह आहार। इसलिए आहार से भोजन मात्र न समझना। भोजन तो आहार का एक छोटा-सा अंग है--और वह बहुत महत्वपूर्ण भी नहीं, बहुत गौण अंग है।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
सातवां प्रवचन-गुरु स्वयं को भी उपाय बना लेता है

दिनांक 27 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, शाटयायनीय उपनिषद गुरु की महिमा इस प्रकार गाता है:
गुरुदेव परौ धर्मो गुरुदेव परा गतिः।
एकाक्षर    प्रदातमम्    नाभिनन्दति।
तस्य श्रुत तपो ज्ञानं स्रवत्यामघटाम्बुयत्।।
गुरु ही परम धर्म है, गुरु ही परम गति है। जो एक अक्षर के दाता गुरु का आदर नहीं करता, उसके श्रुत, तप और ज्ञान धीरे-धीरे ऐसे ही क्षीण होकर नष्ट हो जाते हैं जैसे कच्चे घड़े का जल।
भगवान, क्या ऐसा ही है?

स्वरूपानंद, सत्य को अभिव्यक्ति देने वाले शब्द दुधारी तलवार की भांति हैं। उनसे रक्षण भी हो सकता है, भक्षण भी। वे जीवन के लिए पाथेय बन सकते हैं--मार्ग, इशारा--और जीवन पर बोझ भी बन सकते हैं, भार भी बन सकते हैं। इतना भार कि उनके नीचे दबी आत्मा की मुक्ति असंभव हो जाए। इसलिए जिन्होंने जाना है उन्होंने कहा: सत्य की खोज पर निकलना खड्ग की धार पर चलने के समान है।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
छठवां प्रवचन-(अद्वैत की अनुभूति ही संन्यास है)
दिनांक 26 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
कर्मत्यागान्न संन्यासौ न प्रैषोच्चारणेन तु।
संधौ जीवात्मनौरैक्यं संन्यासः परिकीर्तितः।।
कर्मों को छोड़ देना कुछ संन्यास नहीं है। इसी प्रकार, मैं संन्यासी हूं, ऐसा कह देने से भी कोई संन्यासी नहीं होता है। समाधि में जीव और परमात्मा की एकता का भाव होना ही संन्यास कहलाता है।
भगवान, संन्यास के इस प्रसंग में कहे गए मैत्रेयी उपनिषद के इस सूत्र को हमारे लिए बोधगम्य बनाने की अनुकंपा करें।

आनंद मैत्रेय!
कर्मत्यागान्न संन्यासौ...।
संन्यास सदियों से कर्म का त्याग ही समझा जाता रहा है। और कर्म का त्याग मन का त्याग नहीं है। कर्म के त्याग से एक भ्रांति भर पैदा होती है। भ्रांति गहरी और खतरनाक।
जैसे कोई गाली न दे, अपमान न करे, तो स्वभावतः क्रोध न उठेगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारे भीतर क्रोध की समाप्ति हो गई।

शनिवार, 6 मई 2017

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

पांचवां प्रवचन- (मेरे संन्यासी तो मेरे हिस्से हैं)
दिनांक 25 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, संस्कृत में एक सुभाषित है कि यदि शील अर्थात शुद्ध चरित्र न हो तो मनुष्य के सत्य, तप, जप, ज्ञान, सर्व विद्या और कला, सब निष्फल होते हैं।
सत्यं तपो जपो ज्ञान
      सर्वा विद्याः कला अपि।
नरस्य निष्फलाः सन्ति
      यस्य शील न विद्यते।।
भगवान, निवेदन है कि इस सूक्ति पर कुछ कहें।

आनंद किरण, सुभाषित शब्द तो बहुत प्यारा है। संभवतः दुनिया की किसी और भाषा में वैसा शब्द नहीं। उस शब्द से बहुत-सी बातों की ध्वनि उठती है--खिले हुए फूलों की, बजती हुई बांसुरी की, अमृत के स्वाद की, मिठास की।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

चौथा प्रवचन-(संसार से पलायन नहीं, मन का रूपांतरण)
दिनांक 24 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
मन  एव  मनुष्यानां  कारणं  बंधमोक्षयोः।
बंधाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्।।
अर्थात मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। जो मन विषयों में आसक्त होगा वह बंधन का तथा जो विषयों से पराङ्मुख होगा वह मोक्ष का कारण होगा।
शाटयायनीय उपनिषद का यह सूत्र काफी प्रचलित है। इस उपनिषद के अतिरिक्त अनेक अन्य शास्त्रों में भी इसे स्थान मिला हुआ है।
भगवान, क्या हमारे लिए इस सूत्र की व्याख्या करने की कृपा करेंगे?

चिदानंद, यह सूत्र तो मूल्यवान है, लेकिन नासमझों के हाथ में पड़ कर मूल्यवान से मूल्यवान चीज दो कौड़ी की हो जाती है। कोहिनूर भी पत्थर हो जाता है। उपनिषद के ये अमृत वचन जिनके हाथों में पड़े उन्होंने जहर कर दिया। सारी बात ही उलटी हो गई। कुछ का कुछ हो गया। यह पूरा देश उसी पीड़ा में सड़ रहा है।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
तीसरा प्रवचन-मैं सदैव परम, प्रत्यक्ष और लब्ध हूं
दिनांक 23 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, पैंगल उपनिषद के अनुसार चार महावाक्य हैं।
पहला: तत्वमसि, वह तू है; दूसरा: त्वं तदसि, तू वह है; तीसरा: त्वं ब्रह्मास्मि, तू ब्रह्म है; और चौथा: अहं ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म हूं।
भगवान, इन महावाक्यों के अर्थ और अर्थभेद बताने की अनुकंपा करें।

चिदानंद, उपनिषद सदगुरु और शिष्य के बीच शून्य में हुआ संवाद है। आंखों-आंखों में बात हो गई है। हृदय ने हृदय पर गीत गाया है। न तो गुरु ने कुछ कहा है और न शिष्य ने कुछ सुना है, फिर भी गुरु ने सब कह दिया और शिष्य ने सब सुन लिया है।
गुरु के साथ तीन प्रकार के संबंध हो सकते हैं। विद्यार्थी का; तब गुरु केवल शिक्षक होता है। वहां वाणी आवश्यक है। संवाद जरूरी है। क्योंकि बात बुद्धि से बुद्धि तक होगी। वह सबसे ऊपरी नाता है। विद्यार्थी जिज्ञासु है, मुमुक्षु नहीं। जानना चाहता है, होना नहीं। होने के लिए तो न होने की तैयारी चाहिए। जानने में कुछ कीमत चुकानी नहीं पड़ती। जानकारी इकट्ठी करके और भी अहंकार को रस आता है। जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती है वैसे-वैसे अहंकार और परिपुष्ट होता है।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02



लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दूसरा प्रवचन-(कच्ची कंध उते काना ऐ)

दिनांक 22 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, पंजाबी भाषा में एक टप्पा है, जिसमें एक प्रेमी अपनी प्रेयसी से कहता है--
कच्ची कंध उते काना ऐ
मिलणा तां रब नूं है
तेरा पिआर बहाना है।
अर्थात कच्ची दीवार पर कौवा बैठा है। और मिलना तो परमात्मा से है, तेरा प्यार बहाना है।
भगवान, क्या लौकिक प्रेम अलौकिक प्रेम का साधन है? कृपया समझाएं।

विनोद भारती, टप्पा तो यह प्यारा है:
"कच्ची कंध उते काना ऐ--कच्ची दीवार पर कौवा बैठा है।'
अधिकतर लोगों की जिंदगी बस ऐसी--दीवार कच्ची और कच्ची दीवार पर कौवा बैठा है। जिंदगी भी कच्ची और काली भी। हंस भी नहीं, कौवा बैठा है। और दीवार भी रेत की है। अभी है, अभी नहीं हो जाएगी। कब गिर जाएगी, पता नहीं। किस क्षण समाप्त हो जाएगी, कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता। और इस कच्ची दीवार पर बैठा भी कौन है? कुछ मूल्यवान नहीं। सब दो कौड़ी का है।
"कच्ची कंध उते काना ऐ।'

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
पहला प्रवचन-(यह क्षण है द्वार प्रभु का)
दिनांक 21 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला के लिए आपने नाम चुना है: लगन महूरत झूठ सब।
निवेदन है कि संत पलटू के इस वचन पर प्रकाश डालें।

आनंद दिव्या, पलटू का पूरा वचन ऐसा है--
पलटू सुभ दिन सुभ घड़ी, याद पड़ै जब नाम।
लगन महूरत झूठ सब, और बिगाड़ैं काम।।
धर्म तो परवानों की दुनिया है! दीवानों की, मस्तों की। वहां कहां लगन-महूरत! धर्म तो शुरू वहां होता है जहां समय समाप्त हो जाता है। वहां कहां लगन-महूरत!
लगन-महूरत की चिंता तो उन्हें होती है जो अतीत में जीते हैं और भविष्य में जिनकी वासना अटकी होती है। जीते हैं उसमें जो है नहीं और आशा करते हैं उसकी जो अभी हुआ नहीं--और शायद कभी होगा भी नहीं।