सूत्र :
समाधातुं वाह्मादृष्ट्या प्रारब्धं वदीत श्रुति:।
न तु देहादिसत्यत्व बोधनाय विपीश्चताम्।। 60।।
पीरपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेयमीवक्तियम्।
सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्यम्।। 611।
प्रत्कोकरसं पूर्णमनन्त सर्वतोमुखम्।
अहेयमुनपादेयमनधेयमनाश्रयम्।। 62।।
निर्गुण निष्क्रियं सूक्ष्मं निर्विकल्प निरंजनम्।
अनिरूप्यस्वरूपं यन्मनोवाचामगोचरम्।। 63।।
सत्समृद्धं स्वत: सिद्ध शुद्धं बुद्धिमनीदृशम्।
एकमेवढ़यं ब्रह्म नेह नानाऽस्ति किंचन।। 64।।
स्वानुभूत्या स्वयं ज्ञात्वा स्वमात्मानमखीडतम्।
स सिद्ध: सुसुखं तिष्ठन् निर्विकल्पात्मनाऽत्मत्रि।। 65।।
