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मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--19)

अज्ञात अपरिचित गहराइयों में--(प्रवचन--उन्‍नीसवां)

तेरहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

शरीर : मन का अनुगामी:

प्रश्न: ओशो नारगोल शिविर में आपने कहा कि योग के आसन प्राणायाम मुद्रा और बंध का आविष्कार ध्यान की अवस्थाओं में हुआ तथा ध्यान की विभिन्न अवस्थाओं में विभित्र आसन व मुद्राएं बन जाती हैं जिन्हें देखकर साधक की स्थिति बताई जा सकती है। इसके उलटे यदि वे आसन व मुद्राएं सीधे की जाएं तो ध्यान की वही भावदशा बन सकती है। तब क्या आसन प्राणायाम मुद्रा और बंधों के अभ्यास से ध्यान उपलब्ध हो सकता है? ध्यान साधना में उनका क्या महत्व और उपयोग है?

 प्रारंभिक रूप से ध्यान ही उपलब्ध हुआ। लेकिन ध्यान के अनुभव से शात हुआ कि शरीर बहुत सी आकृतियां लेना शुरू करता है। असल में, जब भी मन की एक दशा होती है तो उसके अनुकूल शरीर भी एक आकृति लेता है। जैसे जब आप प्रेम में होते हैं तो आपका चेहरा और ढंग का हो जाता है, जब क्रोध में होते हैं तो और ढंग का हो जाता है। जब आप क्रोध में होते हैं तब आपके दांत भिंच जाते हैं, मुट्ठियां बंध जाती हैं,

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--18)

तंत्र के गुह्य आयामों में—(प्रवचन—अट्ठाहरवां)

बारहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

 भीतर के पुरुष अथवा स्त्री से मिलन:

प्रश्न: ओशो कल की चर्चा के अंतिम हिस्से में आपने कहा कि बुद्ध सातवें शरीर में महापरिनिर्वाण को उपलब्ध हुए। लेकिन अपने एक प्रवचन में आपने कहा है कि बुद्ध का एक और पुनर्जन्म मनुष्य शरीर में मैत्रेय के नाम से होनेवाला है। तो निर्वाण काया में चले जाने के बाद पुन मनुष्य शरीर लेना कैसे संभव होगा इसे संक्षिप्त में स्पष्ट करने की कृपा करें।

 सको छोड़ो, पीछे लेना, तुम्हारे पूरे नहीं हो पाएंगे नहीं तो।

 प्रश्न: ओशो आपने कहा है कि पांचवें शरीर में छंचने पर साधक के लिए स्त्री और पुरुष का भेद समाप्त हो जाता है। यह उसके प्रथम चार शरीरों के पाजिटिव और निगेटिव विद्युत के किस समायोजन से घटित होता है?

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--17)

मनस से महाशून्य तक—(प्रवचन—सतहरवां)

(ग्यारहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

कुंडलिनी जागरण के लिए प्रथम तीन शरीरों में सामंजस्य आवश्यक:

प्रश्न ओशो कल की चर्चा में आपने अविकसित प्रथम तीन शरीरों के ऊपर होनेवाले शक्तिपात या कुंडलिनी जागरण के प्रभाव की बात की। दूसरे और तीसरे शरीर के अविकसित होने पर कैसा प्रभाव होगा इस पर कुछ और प्रकाश डालने की कृपा करें भ्यसाथ हत्ती यह भी बताएं कि प्रथम तीन शरीर— फिजिकल ईथरिक और एस्ट्रल बॉडी को विकसित करने के लिए साधक इस संबंध में पहली बात तो यह समझने की है कि पहले, दूसरे और तीसरे शरीरों में सामंजस्य, हार्मनी होनी जरूरी है। ये तीनों शरीर अगर आपस में एक मैत्रीपूर्ण संबंध में नहीं हैं, तो कुंडलिनी जागरण हानिकर हो सकता है। और इन तीनों के सामंजस्य में, संगीत में होने के लिए दो—तीन बातें आवश्यक हैं।


 प्रथम शरीर के प्रति बोधपूर्ण होना:

जिन खोजा तिन पाइयां--( प्रवचन--16)

ओम् साध्य है, साधन नहीं—(प्रवचन—सौहलवां)

(दसवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

प्रश्न: ओशो कल सातवें शरीर के संदर्भ में ओम् पर कुछ आपने बातें की। इसी संबंध में एक छोटा सा प्रश्न यह है कि अर ऊ और म के कंपन किन चक्रों को प्रभावित करते हैं और उनका साधक के लिए उपयोग क्या हो सकता है? इन चक्रों के प्रभाव से सातवें चक्र का क्या संबंध है?


 ओम् के संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। उस संबंध में थोड़ी सी और बातें जानने जैसी हैं। एक तो यह कि ओम् सातवीं अवस्था का प्रतीक है, सूचक है, वह उसकी खबर देनेवाला है। ओम् प्रतीक है सातवीं अवस्था का। सातवीं अवस्था किसी भी शब्द से नहीं कही जा सकती। कोई सार्थक शब्द उस संबंध में उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए एक निरर्थक शब्द खोजा गया, जिसमें कोई अर्थ नहीं है। यह मैंने कल आपसे कहा। इस शब्द की खोज भी चौथे शरीर के अनुभव पर हुई है। यह शब्द भी साधारण खोज नहीं है।

असल में, जब चित्त सब भांति शून्य हो जाता है—कोई विचार नहीं होते, कोई शब्द नहीं होते—तब भी शून्य की ध्वनि शेष होती है। शून्य भी बोलता है, शून्य का भी अपना सन्नाटा है। अगर कभी बिलकुल सूनी जगह में आप खड़े हो गए हों—जहां कोई आवाज नहीं, कोई ध्वनि नहीं—तों वहा शून्य की भी एक ध्वनि है, वहां शून्य का भी एक सन्नाटा है।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--15)

धर्म के असीम रहस्य सागर में—(प्रवचन—पंद्रहवां)

(नौवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

धर्म और विज्ञान के भिन्न दृष्टिकोण:

प्रश्न : ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि विज्ञान का प्रवेश पांचवें शरीर स्पूचुअल बॉडी तक संभव है। बाद में चौथे शरीर में विज्ञान की संभावनाओं पर चर्चा की। आज कृपया पांचवें शरीर में हो सकने वाली कुछ वैज्ञानिक संभावनाओं पर संक्षिप्त में प्रकाश डालें।

 क तो जिसे हम शरीर कहते हैं और जिसे हम आत्मा कहते हैं, ये ऐसी दो चीजें नहीं हैं कि जिनके बीच सेतु न बनता हो, ब्रिज न बनता हो। इनके बीच कोई खाई नहीं है, इनके बीच जोड़ है।
तो सदा से एक खयाल था कि शरीर अलग है, आत्मा अलग है; और ये दोनों इस भांति अलग हैं कि इन दोनों के बीच कोई सेतु, कोई ब्रिज नहीं बन सकता। न केवल अलग हैं, बल्कि विपरीत हैं एक—दूसरे से। इस खयाल ने धर्म और विज्ञान को अलग कर दिया था। धर्म वह था, जो शरीर के अतिरिक्त जो है उसकी खोज करे, और विज्ञान वह था, जो शरीर की खोज करे— आत्मा के अतिरिक्त जो है, उसकी खोज करे।

जिन खोजा तिन पाईया--(प्रवचन--14)

सात शरीर और सात चक्र—(प्रवचन—चौहदवां)

आठवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

साधक की बाधाएं:

प्रश्न: ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि साधक को पात्र बनने की पहले फिकर करनी चाहिए जगह— जगह मांगने नहीं जाना चाहिए। लेकिन साधक अर्थात खोजी का अर्थ ही है कि उसे साधना में बाधाएं हैं। उसे पता नहीं है कि कैसे पात्र बने कैसे तैयारी करे। तो वह मांगने न जाए तो क्या करे? सही मार्गदर्शक से मिलना कितना मुश्किल से हो पाता है।

 लेकिन खोजना और मांगना दो अलग बातें हैं। असल में, जो खोजना नहीं चाहता वही मांगता है। खोजना और मांगना एक तो हैं ही नहीं, विपरीत बातें हैं। खोजने से जो बचना चाहता है वह मांगता है, खोजी कभी नहीं मांगता। और खोज और मांगने की प्रक्रिया बिलकुल अलग है। मांगने में दूसरे पर ध्यान रखना पड़ेगा—जिससे मिलेगा। और खोजने में अपने पर ध्यान रखना पड़ेगा—जिसको मिलेगा।

यह तो ठीक है कि साधक के मार्ग पर बाधाएं हैं। लेकिन साधक के मार्ग पर बाधाएं हैं, अगर हम ठीक से समझें तो इसका मतलब होता है कि साधक के भीतर बाधाएं हैं; मार्ग भी भीतर है। और अपनी बाधाओं को समझ लेना बहुत कठिन नहीं है। तो इस संबंध में थोड़ी सी विस्तीर्ण बात करनी पड़ेगी कि बाधाएं क्या हैं और साधक उन्हें कैसे दूर कर सकेगा।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--13)

सात शरीरों से गुजरती कुंडलिनी—(प्रवचन—तैहरवां)


सातवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

मनुष्य के सात शरीर:

प्रश्न: ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि कुंडलिनी के झूठे अनुभव भी प्रोजेक्ट किए जा सकते हैं— जिन्हें आप आध्यात्मिक अनुभव नहीं मानते हैं मानसिक मानते हैं। लेकिन प्रारंभिक चर्चा में आपने कहा था कि कुंडलिनी मात्र साइकिक है। इसका ऐसा अर्थ हुआ कि आप कुंडलिनी की दो प्रकार की स्थितियां मानते हैं— मानसिक और आध्यात्मिक। कृपया इस स्थिति को स्‍पष्‍ट करें।

 सल में, आदमी के पास सात प्रकार के शरीर हैं। एक शरीर तो जो हमें दिखाई पड़ता है—फिजिकल बॉडी, भौतिक शरीर। दूसरा शरीर जो उसके पीछे है और जिसे ईथरिक बॉडी कहें— आकाश शरीर। और तीसरा शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे एस्ट्रल बॉडी कहें—सूक्ष्म शरीर। और चौथा शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे मेंटल बॉडी कहें— मनस शरीर। और पांचवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे म्प्रिचुअल बॉडी कहें— आत्मिक शरीर। छठवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे हम कास्मिक बॉडी कहें—ब्रह्म शरीर। और सातवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे हम निर्वाण शरीर, बॉडीलेस बॉडी कहें— अंतिम।
इन सात शरीरों के संबंध में थोड़ा समझेंगे तो फिर कुंडलिनी की बात पूरी तरह समझ में आ सकेगी।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--12)

सतत साधना : न कहीं रुकना, न कहीं बंधना—(प्रवचन—बाहरवां)


छठवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:


 प्रश्न: ओशो आपने पिछली एक चर्चा में कहा कि सीधे अचानक प्रसाद के उपलब्ध होने पर कभी— कभी दुर्घटना भी घटित हो सकती है और व्यक्ति क्षतिग्रस्त तथा पागल भी हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। तो सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या प्रसाद हमेशा ही कल्याणकारी नहीं होता है? और क्या वह स्व— संतुलन नहीं रखता है? दुर्घटना का यह भी अर्थ होता है कि व्यक्ति अपात्र था। तो अपात्र पर कृपा कैसे हो सकती है?

 दो—तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो प्रभु कोई व्यक्ति नहीं है, शक्ति है। और शक्ति का अर्थ हुआ कि एक—एक व्यक्ति का विचार करके कोई घटना वहां से नहीं घटती है। जैसे नदी बह रही है। किनारे जो दरख्त होंगे, उनकी जड़ें मजबूत हो जाएंगी; उनमें फूल लगेंगे, फल आएंगे। नदी की धार में जो पड़ जाएंगे, उनकी जड़ें उखड़ जाएंगी, बह जाएंगे, टूट जाएंगे। नदी को न तो प्रयोजन है कि किसी वृक्ष की जड़ें मजबूत हों, और न प्रयोजन है कि कोई वृक्ष उखाड़ दे। नदी बह रही है। नदी एक शक्ति है, नदी एक व्यक्ति नहीं है।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--11)

मुक्ति सोपान की सीढियां—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

पांचवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

शक्तिपात और प्रसाद:

प्रश्न: ओशो आपने नारगोल शिविर में कहा कि शक्तिपात का अर्थ है— परमात्मा की शक्ति आप में उतर गई। बाद की चर्चा में आपने कहा कि शक्तिपात और ग्रेस में फर्क है। इन दोनों बातों में विरोधाभास सा लगता है। कृपया इसे समझाएं।

 दोनों में थोड़ा फर्क है, और दोनों में थोड़ी समानता भी है। असल में, दोनों के क्षेत्र एक—दूसरे पर प्रवेश कर जाते हैं। शक्तिपात परमात्मा की ही शक्ति है। असल बात तो यह है कि उसके अलावा और किसी की शक्ति ही नहीं है। लेकिन शक्तिपात में कोई व्यक्ति माध्यम की तरह काम करता है। अंततः तो वह भी परमात्मा है। लेकिन प्रारंभिक रूप से कोई व्यक्ति माध्यम की तरह काम करता है।
जैसे आकाश में बिजली कौंधी; घर में भी बिजली जल रही है; वे दोनों एक ही चीज हैं। लेकिन घर में जो बिजली जल रही है, वह एक माध्यम से प्रवेश की है घर में—नियोजित है। आदमी का हाथ उसमें साफ और सीधा है। वह भी परमात्मा की है। वर्षा में जो बिजली कौंध रही है वह भी परमात्मा की है। लेकिन इसमें बीच में आदमी भी है, उसमें बीच में आदमी नहीं है। अगर दुनिया से आदमी मिट जाए तो आकाश की बिजली तो कौंधती रहेगी, लेकिन घर की बिजली बुझ जाएगी।

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--10)

आंतरिक रूपांतरण के तथ्य—(प्रवचन—दसवां)

चौथी प्रश्नोत्तर चर्चा


 प्रश्न : ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि शक्ति का कुंड प्रत्येक व्यक्ति का अलग— अलग नहीं है लेकिन कुंडलिनी जागरण में तो साधक के शरीर में स्थित कुंड से ही शक्ति ऊपर उठती है। तो क्या कुंड अलग— अलग हैं या कुंड एक ही है इस इस स्थिति को कृपया समझाएं।

 सा है, जैसे एक कुएं से तुम पानी भरो। तो तुम्हारे घर का कुआं अलग है, मेरे घर का कुआं अलग है, लेकिन फिर भी कुएं के भीतर के जो झरने हैं वे सब एक ही सागर से जुड़े हैं। तो अगर तुम अपने कुएं के ही झरने की धारा को पकड़कर खोदते ही चले जाओ, तो उस मार्ग में मेरे घर का कुआं भी पड़ेगा, औरों के घर के कुएं भी पड़ेंगे, और एक दिन तुम वहां पहुंच जाओगे जहां कुआं नहीं, सागर ही होगा। जहां से शुरू होती है यात्रा वहां तो व्यक्ति है, और जहां समाप्त होती है यात्रा वहां व्यक्ति बिलकुल नहीं है, वहां समष्टि है; इंडिविजुअल से शुरू होती है और एकोल्युट पर खतम होती है।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--09)

श्वास की कीमिया—(प्रवचन—नौवां)

तीसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

प्रश्न :  ओशो रूस के बहुत बड़े अध्यात्मविद् और मिस्टिक जॉर्ज गुरजिएफ ने अपनी आध्यात्मिक खोज— यात्रा के संस्मरण 'मीटिंग्स विद दि रिमार्केबल मेन' नामक पुस्तक में लिखे हैं। एक दरवेश फकीर से उनकी काफी चर्चा भोजन को चबाने के संबंध में तथा योग के प्राणायाम व आसनों के संबंध में हुई जिससे वे बड़े प्रभावित भी हुए। दरवेश ने उन्हें कहा कि भोजन को कम चबाना चाहिए कभी— कभी थी सहित भी निगल जाना चाहिए; इससे पेट शक्तिशाली होता है। इसके साथ ही दरवेश ने उन्हें किसी भी प्रकार के श्वास के अभ्यास को न करने का सुझाव दिया। दरवेश का कहना था कि प्राकृतिक श्वास—प्रणाली में कुछ भी परिवर्तन करने से सारा व्यक्तित्व अस्तव्यस्त हो जाता है और उसके घातक परिणाम होते हैं इस संबंध में आपका क्या मत है?

 समें पहली बात तो यह है कि यह तो ठीक है कि अगर भोजन चबाया न जाए, तो पेट शक्तिशाली हो जाएगा। और जो काम मुंह से कर रहे हैं वह काम भी पेट करने लगेगा। लेकिन इसके परिणाम बहुत घातक होंगे।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--08)

यात्रा: दृश्य से अदृश्य की और—(प्रवचन—आठवां)

दूसरी प्रश्नोत्तर चर्चा:

 प्रश्न : ओशो आपने नारगोल शिविर में कहा है कि कुंडलिनी साधना शरीर की तैयारी है। कृपया इसका अर्थ स्पष्ट समझाएं।

 हली बात तो यह शरीर और आत्मा बहुत गहरे में दो नहीं हैं; उनका भेद भी बहुत ऊपर है। और जिस दिन दिखाई पड़ता है पूरा सत्य, उस दिन ऐसा दिखाई नहीं पड़ता कि शरीर और आत्मा अलग—अलग हैं, उस दिन ऐसा ही दिखाई पड़ता है कि शरीर आत्मा का वह हिस्सा है जो इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है और आत्मा शरीर का वह हिस्सा है जो इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है।

 शरीर और आत्मा—एक ही सत्य के दो छोर:


शरीर का ही अदृश्य छोर आत्मा है और आत्मा का ही दृश्य छोर शरीर है, यह तो बहुत आखिरी अनुभव में शात होगा। अब यह बड़े मजे की बात है. साधारणत: हम सब यही मानकर चलते हैं कि शरीर और आत्मा एक ही हैं।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--07)

कुंडलिनी जागरण व शक्तिपात—(प्रवचन—सातवां)

पहली प्रश्नोत्तर चर्चा:

 ताओ—मूल स्वभाव:

प्रश्न:

ओशो ताओ को आज तक सही तौर से समझाया नहीं गया है। या तो विनोबा भावे ने ट्राई किया या फारेनर्स ने ट्राई किया या हमारे एक बहुत बड़े विद्वान मनोहरलाल जी ने ट्राई किया लेकिन ताओ को या तो वे समझा नहीं पाए या मैं नहीं समझ पाया। क्योंकि यह एक बहुत बड़ा गंभीर विषय है।

 ताओ का पहले तो अर्थ समझ लेना चाहिए। ताओ का मूल रूप से यही अर्थ होता है, जो धर्म का होता है। धर्म का मतलब है स्वभाव।  जैसे आग जलाती है, यह उसका धर्म हुआ। हवा दिखाई नहीं पड़ती है, अदृश्य है, यह उसका स्वभाव है, यह उसका धर्म है। मनुष्य को छोड्कर सारा जगत धर्म के भीतर है। अपने स्वभाव के बाहर नहीं जाता। मनुष्य को छोड्कर जगत में, सभी कुछ स्वभाव के भीतर गति करता है। स्वभाव के बाहर कुछ भी गति नहीं करता। अगर हम मनुष्य को हटा दें तो स्वभाव ही शेष रह जाता है। पानी बरसेगा, धूप पड़ेगी, पानी भाप बनेगा, बादल बनेंगे, ठंडक होगी, गिरेंगे। आग जलाती रहेगी, हवाएं उड़ती रहेंगी, बीज टूटेंगे, वृक्ष बनेंगे। पक्षी अंडे देते रहेंगे। सब स्वभाव से होता रहेगा। स्वभाव में कहीं कोई विपरीतता पैदा न होगी।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--06)

गहरे पानी पैठ—(प्रवचन—छठवां)

(समापन प्रवचन)

 मेरे प्रिय आत्मन्!

तीन दिनों में बहुत से प्रश्न इकट्ठे हो गए हैं और इसलिए आज बहुत संक्षिप्त में जितने ज्यादा प्रश्नों पर बात हो सके, मैं करना चाहूंगा।

 कितनी प्यास?

एक मित्र ने पूछा है कि ओशो विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछा कि क्या आपने ईश्वर देखा है? तो रामकृष्ण ने कहा लूं जैसा मैं तुम्हें देख रहा हूं ऐसा ही मैने परमात्मा को भी देखा है। तो वे मित्र पूछते हैं कि जैसा विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछा क्या हम भी वैसा आपसे पूछ सकते हैं?

 हली तो बात यह, विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछते समय यह नहीं पूछा कि हम आपसे पूछ सकते हैं या नहीं पूछ सकते हैं। विवेकानंद ने पूछ ही लिया। और आप पूछ नहीं रहे हैं, पूछ सकते हैं या नहीं पूछ सकते हैं, यह पूछ रहे हैं। विवेकानंद चाहिए वैसा प्रश्न पूछनेवाला। और वैसा उत्तर रामकृष्ण किसी दूसरे को न देते। यह ध्यान रहे, रामकृष्ण ने जो उत्तर दिया है वह विवेकानंद को दिया है, वह किसी दूसरे को न दिया जाता।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--05)

कुंडलिनी, शक्तिपात व प्रभु प्रसाद—(प्रवचन—पांचवां)

अंतिम ध्यान प्रयोग

 मेरे प्रिय आत्मन्!

हुत आशा और संकल्प से भर कर आज का प्रयोग करें। जानें कि होगा ही। जैसे सूर्य निकला है, ऐसे ही भीतर भी प्रकाश फैलेगा। जैसे सुबह फूल खिले हैं, ऐसे ही आनंद के फूल भीतर भी खिलेंगे। पूरी आशा से जो चलता है वह पहुंच जाता है, और जो पूरी प्यास से पुकारता है उसे मिल जाता है।
जो मित्र खड़े हो सकते हों, वे खड़े होकर ही प्रयोग को करेंगे। जो मित्र खड़े हैं, उनके आसपास जो लोग बैठे हैं, वे थोड़ा हट जाएंगे.. .कोई गिरे तो किसी के ऊपर न गिर जाए। खड़े होने पर बहुत जोर से क्रिया होगी—शरीर पूरा नाचने लगेगा आनंदमग्न होकर। इसलिए पास कोई बैठा हो, वह हट जाए। जो मित्र खड़े हैं, उनके आसपास थोड़ी जगह छोड़ दें—शीघ्रता से। और पूरा साहस करना है, जरा भी अपने भीतर कोई कमी नहीं छोड देनी है।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--04)

ध्‍यान पंथ ऐसो कठिन—(प्रवचन—चौथा)

प्रभु—कृपा और साधक का प्रयास
मेरे प्रिय आत्मन्!

 एक मित्र ने पूछा है कि ओशो क्या ध्यान प्रभु की कृपा से उपलब्ध होता है?

 स बात को थोड़ा समझना उपयोगी है। इस बात से बहुत भूल भी हुई है। न मालूम कितने लोग यह सोचकर बैठ गए हैं कि प्रभु की कृपा से उपलब्ध होगा तो हमें कुछ भी नहीं करना है। यदि प्रभु—कृपा का ऐसा अर्थ लेते हैं कि आपको कुछ भी नहीं करना है, तो आप बड़ी भ्रांति में हैं। दूसरी और भी इसमें भांति है कि प्रभु की कृपा सबके ऊपर समान नहीं है।
लेकिन प्रभु—कृपा किसी पर कम और ज्यादा नहीं हो सकती। प्रभु के चहेते, चूज़न कोई भी नहीं हैं। और अगर प्रभु के भी चहेते हों तो फिर इस जगत में न्याय का कोई उपाय न रह जाएगा।
प्रभु की कृपा का तो यह अर्थ हुआ कि किसी पर कृपा करता है और किसी पर अकृपा भी रखता है। ऐसा अर्थ लिया हो तो वैसा अर्थ गलत है। लेकिन किसी और अर्थ में सही है। प्रभु की कृपा से उपलब्ध होता है, यह उनका कथन नहीं है जिन्हें अभी नहीं मिला, यह उनका कथन है