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मंगलवार, 23 मई 2017

बांझ-(कहानी)--मनसा



बाँझ – कहानी

घर क्‍या था, एक भूतीय बंगला ही समझो। घर बनता है परिवार से, बच्‍चो की किलकारीयों से, इतनी बड़ी हवेली नुमा मकान के अंदर रहने को जिसमें मात्र एक पाणी हो, उसे घर कहना कुछ अनुचित सा लगता है। रहने के नाम का नाम क्या मात्र दीवरों पर आदमी की परछाई पड़ना है। एक बूढ़ी अम्‍मा कितना ओर कहां-कहां उस घर की दीवारों से अपने केा टकराये। हर कोना उसकी यादें से जूडा था। कहां वह दूध बिलोती थी,  कहां हारी लगा कर वह दूध को कढ़ने के लिए रखती थी। वहां आज भी धूए के निशान थे। कहां वह कंडे करखती थी। कहां ढिबरी का प्रकाश पूरें आंगन को ही नहीं साल ओर कोठे के कोने तक को स्वर्णिमय कर जाता था। अंदर पूजा का आला जहां वह नित नियम से देसी घी का दिया जलती थी। अब तो वहां जाने से भी अपने होने का भय लगाता है। क्या मनुष्य इतना मजबुर हो जाता है। समय की मार से की वह करहा भी नहीं पाता। क्या ऐसा नहीं होता की समय किस चुपके से आपके जीवन में बिना कोई आहाट किया चला आता है।

रविवार, 21 मई 2017

भोला-(कहानी्-मनसा



भोला


      भोला ये केवल एक नाम ही नहीं है। ये उस चलते-फिरते हाड़ मांस के शरीर मैं झलकती एक व्‍यक्‍ति के व्यक्तित्व कि कोमलता, गरिमा, उसका  माधुर्य उसके पोर-पोर से टपकती ही नहीं झरता हुआ आप देख सकते थे। भोला की मनुष्यता, मनस्विता, महिमा या गरिमा उसके दैनिक छोटे बड़े कार्यो मे देखी जा सकती थी। उसकी विशालता को मैने उसके अंतिम चरण मे एक बूढे होते वृक्ष के रूप में जाना था। उसका क्षीण होता शरीर भी बढ़ते उस अपूर सौन्दर्य को कम नहीं कर पर रहा था। परन्‍तु उसकी सुकोमल व पारदर्शी स्फटिक गहरी झील में प्रतिबिम्बित देख सकते थे। उसका शरीर जरूर झुरियां से भर गया था। पर अब भी उसमें एक सुकोमल ताजगी, एक जीवन्तता साफ दिखाई दे रही थी। मानों एक विशाल वृक्ष का खुरदरापन और उबड़-खाबड, रूखा पन भी अपने में एक आकर्षणता लिए हुये था।  जिस तरह से एक वृक्ष  का सौन्दर्य  केवल उसकी कोमलता ही नहीं बखानती, उसकी पूर्णता उसके पल्लव-पल्लव से टपक कर, झूमती लता पर इठलाते हुये पत्ते उसके रूप और आकरशण की कहानी कह रहे थे।

नीम का दर्द-(कहानी)-मनसा



नीम का दर्द—कहानी
नीम के उस पेड़ को अपनी विशालता, भव्‍यता और सौंदर्य पर बहुत गर्व था। गर्व हो भी क्‍यों न प्रत्‍येक प्राणी उसके रंग रूप और आकार को देख कर कैसा गद-गद हो जाता था। पक्षी उस पर आकर बैठते और अठखेलिया करते। आपस में लड़ते झगड़ते कूद-फुांदक कर कैसे मधुर गीतों की किलकारीयाँ गाते थे। मानों आपके कानों में कहीं दूर से घंटियों को मधुर नाद आ रहा है। कोई अपनी चोंच टहनियों पर रगड़-रगड़ कर उसे साफ़ कर रहा होता। कोई चोंच मार कर आपस में प्रेम प्रदर्शित कर रहा होता। आप बस यूं कह लीजिए की उस नीम के पेड़ के चारों और रौनक मेला लगा रहता था। उस सब को देख कर नीम भी मारे खुशी के पागल हुआ रहता था। उस नीम का तना हमारे आंगन में जरूर था पर उसकी शाखा-प्रशाखाओं दूर पड़ोसियों के छत और आंगन तक पसरी फैली हुई थी। वो इतना ऊँचा और विशाल था कि ये बटवारे की छोटी-छोटी चार दीवारी उसकी महानता के आगे बहुत ही नीची थी, इन दीवारों की उँचाई का कोई महत्‍व नहीं था उसकी विशालता के आगे। या यूं कह लीजिए कि नीम कि उँचाई के आगे वह बोनी महसूस होती थी। जड़ें और तना भले ही हमारे आंगन में हो, परन्‍तु उसकी छत्र छाया का आशीर्वाद दुर दराज के घरों को भी उतना ही मिलता था। ये शायद उसकी बुजुर्गता और महानता का ही वरदान था।

शनिवार, 20 मई 2017

पोकर-(कहानी्)- 'मनसा'



पोकर 


      बढ़ी अम्माँ बैल गाडियों की लीक के किनारे बैठी दूर से देखने पर ऐसी लग रही थी, जैसे कोई मूर्ति बैठी हो।  उसका शरीर एक दम थिर था, बिना हलचल के शांत मौन मुद्रा लिए हुए पाषाण वत लग रही थी। कितनी-कितनी देर तक बिना हीले-डूले अपनी मुद्रा बदले वह इसी तरह वह सालों से बैठती आ रही थी। उसके चेहरे की झुर्रियां में दुख, पीड़ा और संताप की लकीरें साफ देखाई दे रही थी। सालों से अम्माँ इसी तरह नितान्त अकेली यहाँ आकर रोज बैठती थी। और दूर उन धुँधली आँखों से क्षतिज का पोर-पोर निहारती रहती थी। अंबर में बनती मिटती धूधूंली उन अकृर्तियां सा ही उसके मन मष्तिष्क कुछ कुछ छपता मिटता रहता। परंतु उसको न वह किसी पर विभेद होने देती थी ओर नहीं उसे कोई जान पाया। दूर कहीं जब कोई आहट या बेलों के पैरो से उड़ती घुल तब वह अपना दायां हाथ आँखों पर हाथ रख अपनी मुद्रा बदल कर उस और देखने की बेकार कोशिश करती थी। क्‍योंकि अब अम्‍मा की आँखो कमजोर ओर धुँधली हो गई थी। शायद यह मूर्ति किसी अर्पूणता को पूर्णता में बदलने के लिए किसी आने वाले किसी कलाकार की राह तक रही हो। दूर तक फैला सफ़ेद काँस जैसे उसके बालों का विस्तार हो। पास पत्थर मिट्टी के टिब्बा उसके रूखे चेहरे जैसे लग रहे थे। और तालाब का पानी सूख कर चितका भर रह ऐसा लग रहा था, जैसे अम्माँ की आँखों में उतरा मोतियाबिंद। मानों उसके इस दूख को आस पास की पूरी पकृति ने अपने पर उकेर लिया हो। देखते हैं उसकी धुँधली आस कब तक हिलते हाथ की धुँधली परछाई को, आस भरी बूढ़ी आँखें निहार सकेगी।