बाँझ –
कहानी
घर क्या था, एक भूतीय बंगला ही समझो। घर बनता है परिवार से, बच्चो की किलकारीयों से, इतनी
बड़ी हवेली नुमा मकान के अंदर
रहने को जिसमें मात्र
एक पाणी हो, उसे घर कहना कुछ अनुचित सा लगता है। रहने के नाम का नाम क्या मात्र
दीवरों पर आदमी की परछाई पड़ना है। एक बूढ़ी अम्मा कितना
ओर कहां-कहां उस घर की दीवारों से अपने केा टकराये। हर कोना उसकी यादें से जूडा
था। कहां वह दूध बिलोती थी, कहां हारी लगा कर वह दूध को कढ़ने के लिए रखती थी। वहां
आज भी धूए के निशान थे। कहां वह कंडे करखती थी। कहां ढिबरी का प्रकाश पूरें आंगन
को ही नहीं साल ओर कोठे के कोने तक को स्वर्णिमय कर जाता था। अंदर पूजा का आला
जहां वह नित नियम से देसी घी का दिया जलती थी। अब तो वहां जाने से भी अपने होने का
भय लगाता है। क्या मनुष्य इतना मजबुर हो जाता है। समय की मार से की वह करहा भी
नहीं पाता। क्या ऐसा नहीं होता की समय किस चुपके से आपके जीवन में बिना कोई आहाट किया
चला आता है।



