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रविवार, 10 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--162

अकस्‍मात विस्‍फोट की पूर्व—तैयारी—(प्रवचन—बारहवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—

            यथा प्रकाशयत्‍येक: कृत्‍स्‍नं लोकमिमं रवि:।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्‍स्‍नं प्रकाशयति भारत।। 33।।
स्थ्यैज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचमुवा।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्‍तरं च ये विदुर्यान्‍ति ते परम्।। 34।।

है अर्जुन, जिस प्रकार एक ही सूर्य इस संपूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्‍मा संपूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
इस प्रकाश क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा विकारयुक्‍त प्रकृति से छूटने के उपाय को जो पुरूष ज्ञान—नेत्रों के द्वारा तत्‍व से जानते है, वे महात्‍माजन परम ब्रह्म परमात्‍मा को प्राप्त होते हैं।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--161

साधना और समझ—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—161

अनादित्वान्‍निर्गुणत्वात्परमात्मायमब्यय:।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करौति न लिप्‍यते।। 31।।
यथा सर्वगतं सौक्ष्‍म्यादास्काशं नोयलिप्‍यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्‍यते।। 32।।  

है अर्जुन, अनादि होने से और गुणातीत होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित हुआ थी वास्तव में न करता है और न लिपायमान होता है।
जिस कार सर्वत्र व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिपायमान नहीं होता है, वैसे ही सर्वत्र देह में स्थित हुआ भी आत्मा गुणातींत होने के कारण देह के गुणों से लिपायमान नहीं होता है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--160

कौन है आँख वाला—(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—160

            समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्‍स्‍वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।। 27।।
समं पश्यीन्ह सर्वत्र अमवीस्थतमीश्वरम्।
न हिनस्मात्मनात्मानं ततो याति पंरा गतिम् ।। 28।।
प्रकृत्यैव च कर्मीणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं ग़ पश्यति।। 29।।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनयश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्यद्यते तदा।। 30।।

हम प्रकार जानकर जो पुरुष नष्ट होते हुl सब बराबर भूतों में नाशरीहत परमेश्वर को समभाव मे स्थित देखता है, वही देखता है।
क्योंकि वह पुरुष सब में समभाव से स्थित हुए परमेश्वर को समान देखता हुआ, अपने द्वारा आपको नष्ट नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।
और जो पुरुष संपूर्ण क्रमों को सब प्रकार से प्रकृति से ही किए हुए देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है वही देखता है।
और यह पुरूष जिस काल में भूतों के न्यारे— न्यारे भाव को एक परमात्मा के संकल्य के आधार स्थित देखता है तथा उस परमात्‍मा के संकल्‍प से ही संपूर्ण भूतों का विस्‍तार देखता है? उस कम में सच्चिदानंदधन ब्रह्म को प्राप्त होता है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--159

पुरूष में थिरता के चार मार्ग—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—

ध्यानेनात्‍मनि पश्‍यान्ति केचिदात्‍मानमात्‍मना।
अन्ये सांख्‍येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।। 24।।
अन्ये त्वेवमजानन्‍त: श्रुत्‍वान्‍येभ्‍य उपासते।
तउपि चातितरन्‍त्येव मृत्‍यु श्रुतिपरायणा:।। 25।।
यावत्‍संजायते किंचित्‍सत्‍वं स्‍थावरजड्गमम्।
क्षेत्रक्षत्रज्ञसंयोत्‍तद्विद्धि भरतर्षभ।। 26।।

और है अर्जुन उस परम पुरुष को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्‍म बुद्धि से ध्यान के द्वारा हदय में देखते हैं तथा अन्य कितने ही ज्ञान— योग के द्वारा देखते हैं तथा अन्य कितने ही निष्काम कर्म— योग के द्वारा देखते हैं।
परंतु इनसे दूसरे अर्थात जो मंद बुद्धि वाले पुरूष है, वे स्वयं इस प्रकार न जानते न दूसरों से अर्थात तत्‍व के जानने वाले पुरूषों से सुनकर ही उपासना करते हैं और वे सुनने के यरायण हुए पुरुष भी मृत्‍युरूय संसार— सागर को निस्संदेह तर जाते हैं।
हे अर्जुन यावन्‍मात्र जो कुछ भी स्थावर— जंगम वस्तु उत्पन्‍न होती है, उस संपूर्ण को तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्‍न हुई जान

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--158

गीता में समस्‍त मार्ग है—(प्रवचन—आठवां)

      अध्‍याय—13
सूत्र—

            पुरूष प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुाणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्यसु।। 21।।
उपदृष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता म्हेश्वर:।
परमात्‍मेति चाप्‍युक्‍तो देहेउस्‍मिन्‍पुरूष: यर:।। 22।।
य एवं वेत्ति पुरूष प्रकृति च गुणै सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।। 23।।

परंतु प्रकृति में स्थित हुआ ही पुरूष प्रकृति मे उत्पन्न हुए त्रिगुणत्मक सब पदाथों की भोगता है। और इन गुणों का संग ही ड़सके अच्छी— बुरी योनियों में जन्म लेने में कारण है। वास्तव में तो यह पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ही है,
केवल साक्षी होने से उपदृष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने मे अनुमंता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता? जीवरूय से भोक्‍ता तथा बह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्‍चिदानंदघन होने से परमत्मा, ऐसा कहा गया है।
इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित कृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है, वह सब प्रकार से बर्तता हुआ भी फिर नही जन्‍मता है अर्थात पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--157

पुरूष—प्रकृति—लीला—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्‍तं समासत:।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्यावायोपयद्यते।। 18।।
प्रकृतिं पुरूषं चैव विद्यनादी उभावपि।
क्किारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।। 19।।
कार्यकरणकर्तृन्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।
पुरुष: सुखदुखानां भोक्‍तृत्‍वे हैतुरूच्‍यते।। 20।।

हे अर्जुन, इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया, इसको तत्व से जानकर मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
और हे अर्जुन, कृति अर्थात त्रिगुणमयी मेरी माया और पुरुष अर्थात क्षेत्रज्ञ, इन दोनों को ही तू अनादि जान और रागद्वेषदि विकारों को तथा त्रिगुणास्थ्य संपूर्ण यदार्थो को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान।
क्योंकि कार्य और करण के उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और पुरुष सुख— दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--156

स्‍वयं को बदलो(प्रवचनछठवां)

गीता दर्शन—भाग—6
सूत्र—156

बहिरन्तश्चइ भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थ चान्‍तिके च तत्।। 15।।
अविभक्तं  भूतेषु विभक्तीमव  स्थितम्
भूतभर्तृ  तज्ज्ञेयं ग्रीअष्णु प्रभविष्णु च।। 16।।
ज्योतिषामयि तज्जयोतिस्तमस: परमुच्‍यते
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं ह्रदि सर्वस्य विष्ठितम्।। 17।।

तथा वह परमात्मा बराबर अब भूतों के बाहर— भीतर परियूर्ण है और चर— अचर रूप भी की है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है अर्थात जानने में नहीं आने वाला है। तथा अति समीप में और अति दूर में भी स्थित वही है।
और वह विभागरीहत एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण हुआ भी चराचर संपूर्ण भूतों में पृथक— पथक के सदृश स्थित प्रतीत होता है। तथा वह जानने योग्य परमात्मा भूतों का धारण— पोषण करने वाला और संहार करने वाला तथा सब का उत्पन्‍न करने वाला है।
और वह ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अति परे कहा जमा है। तथा वह परमात्मा बोधस्वरूप और जानने के योग्य है एवं तत्‍वज्ञान से प्राप्त होने वाला और सबके ह्रदय में स्थित है।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--155

समस्‍त विपरीतताओं का विलयपरमात्‍मा में(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—155

            ज्ञेयं यत्‍तत्‍प्रवक्ष्यामि यजज्ञात्‍वामृतमश्‍नुते।
अनादिमत्‍परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्‍यते।। 12।।
सर्वत: पाणियादं तत्‍सर्वतोउक्षिशिरोमखम्।
सर्वत: श्रुतिमल्‍लेके सर्वमावृत्य तिष्‍ठति।। 13।।
सर्वोन्द्रयगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्‍तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभक्‍तृ च।। 14।।

और हे अर्जुन, जो जानने योग्य है तथा जिसकी जानकर मनुष्य अमृत और परमानंद को प्राप्त होता है, उसको अच्छी प्रकार कहूंगा। वह आदिरहित परम बह्म अकथनीय होने से न सत कहा जाता है और न असत ही कहा जाता है।  परंतु वह सब ओर से हाथ—पैर वाला एवं सब ओर नैत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर से श्रोत बाला हे, क्योंकि वह संसार में सब को व्याप्त करके स्थित है। और संपूर्ण इंद्रिंयों के विषयों को जानने वाला है, परंतु वास्तव में सब इंद्रियों से रहित है। तथा आसक्‍तिरीहत है और गुणों से अतीत हुआ भी अपनी योगमाया से सब को धारण—पोषण करने वाला और गुणों को भोगने वाला है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--154

समत्‍व और एकीभावप्रवचनचौथा

अध्‍याय—13 
सूत्र—154
असक्‍तिरभिष्‍वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समीचत्‍तत्‍वमिष्टानिष्टोययीत्तषु।। 9।।
मयि चानन्ययोगेन भाक्तईरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसोईख्वमरतिर्जनसंसदि।। 10।।
अध्यात्‍मज्ञाननित्यन्वं तत्‍वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानीमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोउन्यथा।। 11।।

तथा पुत्र, स्त्री, घर और धनादि में आसक्‍ति का अभाव और ममता का न होना तथा प्रिय—अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही मिल का सम रहना अर्थात मन के अनुकूल और प्रतिकूल के प्राप्त होने पर हर्ष— शोकादि विकारों का न होना। और मुझ परमेश्वर में एकीभाव से स्थितिरूप ध्यान— योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्‍त मनुष्यों के समुदाय में अरति, प्रेम का न होना।
तथा अध्यात्म— ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्‍वज्ञान के अर्थरूय परमत्मा को सर्वत्र देखना,  यह सब तो ज्ञान है; और जो हमसे विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा जाता है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--153

रामकृष्‍ण की दिव्‍य बेहोशी(प्रवचनतीसरा)

अध्‍याय—13
सूत्र—

            अमानित्‍वमदम्भिन्वमीहंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योयासनं शौचं स्थैर्यमविनिग्रह:।। 7।।
हन्द्रियाथेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्‍युजराव्‍याधिदु:खदौषानुदर्शनम्।। 8।।

और हे अर्जुन, श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दंभाचरण का अभाव, प्राणिमात्र को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन—वाणी की सरलता, श्रद्धा— भक्ति सहित गुरु की सेवा— उपासना, बाहर— भीतर की शुद्धि, अंतःकरण की स्थिरता, मन और इंद्रियों सहित शरिर का निग्रह तथा इस लोक और परलोक के संपूर्ण भोगों में आसक्‍ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव एवं जन्म, मृत्य्र, जरा और रोग आदि में दोषों का बारंबार दर्शन करना, ये सब ज्ञान के लक्षण हैं।

 पहले कुछ प्रश्न।

एक मित्र ने पूछा है कि चेतना के खो जाने पर प्राप्त समाधि क्या मूर्च्छा की अवस्था है? रामकृष्ण परमहंस कई दिनों तक मृतप्राय अवस्था में लेटे रहते थे!

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--152

क्षेत्रज्ञ अर्थात निर्विषय, निर्विकार चैतन्‍य(प्रवचनदूसरा)

अध्‍याय—13
गीता सूत्र:

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दौभिर्विविधै: पृथक।
ब्रह्मसूत्रदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितै:।। 4।।
महाभूतान्‍हंकारो बुद्धिरव्‍यक्‍तमेव च।
हन्द्रियाणि दशैकं च पंज्च चेन्दियगोचरा:।। 5।।
इच्छा द्वेष: सुखं दुख संघलश्चेतना धृति:।
एतत् क्षेत्रं समासैन सधिकारमुदहतम्।। 6।।

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और नाना कार के छंदों से विभागपूर्वक कहा गया है तथा अच्छी प्रकार निश्चय किए हुए युक्‍ति—युक्‍त बह्मसूत्रों के पदों द्वारा भी वैसे ही कहा गया है।
और हे अर्जुनु वही मैं तेरे लिए कहता हूं कि पांच महाभूत? अहंकार, बुद्धि और मूल कृति प्रकृति अर्थात त्रिगुणमयी माया भी तथा दस इंद्रियां, एक मन और पांच इंद्रियां के विषय अर्थत शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध।
तथा इच्‍छा, द्वेष, सुख, दुख और स्थूल देह का पिंड एवं चेतना और धृति, हम कार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप से कहा गया है।

गीता दर्शन--(भाग--6 प्रवचन--151

दुःख से मुक्‍ति का मार्ग: तादात्‍म’‍य का विसर्जन—(प्रवचन—पहला)
अध्‍याय—13
सार—सूत्र:

 श्रीमद्भगवद्गीता अथ त्रयौदशोऽध्याय:

 श्री भगवानुवाच:
ड़दं शरीर कौन्तेय क्षेत्रीमित्यीभधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं पाहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्धिद:।। 1।।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोज्ञनिं यतज्ज्ञानं मतं मम।। 2।।
तत्‍क्षेत्रं यच्च यादृक्‍च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्‍प्रभावश्च तत्‍समासेन मे श्रेृणु।। 3।।

उसके उपरांत श्रीकृष्‍ण भगवान बोले है अर्जुन, यह शरीर क्षेत्र है, ऐसे कहा जाता है। और इसको जो जानता है, उसको क्षेत्र ऐसा उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं। और हे अर्जुन तू अब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मेरे को ही जान।
और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का अर्थात विकार रहित प्रकृति का और पुरूष का जो तत्‍व से जानना है, वह ज्ञान है, ऐसा मेरा मत है। इसलिए वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप में मेरे से मन।