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रविवार, 16 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-091



सत्य अनुभव है अंतश्चक्षु का—प्रवचन—91

प्रश्‍न सार:

 सत्य क्या है?


सका  उत्तर नहीं हो सकेगा। इसका उत्तर हो ही नहीं सकता।
सत्य कैसे पाया जा सकता है, इसका तो उत्तर हो सकता है, विधि बतायी जा सकती है, लेकिन सत्य क्या है, उसे बताने का कोई उपाय नहीं। सत्य को तो स्वयं ही जानना होता है, दूसरा न बता सकेगा। और दूसरे का बताया गया सत्य न होगा। ऐसा नहीं कि दूसरे ने नहीं जाना है। सत्य जाना तो जा सकता है, लेकिन जनाया नहीं जा सकता।
प्रश्न महत्वपूर्ण है। लेकिन उत्तर की अपेक्षा न करो। उत्तर तुम्हें खोजना होगा। उत्तर मुझसे न मिल सकेगा। मेरी तरफ से इशारे हो सकते हैं कि ऐसे चलो, ऐसे जीओ, तो एक दिन सत्य मिलेगा। लेकिन सत्य क्या होगा, कैसा होगा, जब मिलेगा तो कैसा स्वाद आएगा, यह तो स्वाद आएगा तभी पता चलेगा।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-090



अकेला होना नियति है—प्रवचन—90

      सूत्र:


यावं हि वनयो न छिज्जति अनुमत्‍तोपि नरस्‍स नारिसु।
पटिबद्धमनो नु गव सो बच्‍छो खीरपकोव मातरि ।।235।।

उच्‍छिंद सिनेहमत्‍तनो कुमुदं सारदिकं व पाणिना।
संति मग्‍गमेव बूहय निब्‍बानं सुगतेन देतितं ।।236।।

इध वस्‍सं वसिस्‍सामि इध हमेत गिम्‍हसु।
इति बालो विचिंतेति अंतरायं न बुज्‍झति ।।237।।

तं पुत्‍तपसुसंपत्‍तव्‍यासत्‍तमनसं नरं।
सुतं गामं महोधोव मच्‍चु आदाय गच्‍छति ।।238।।

न संति पुत्‍ता ताणाय न पिता नापि बंधवा।
अंतकेनाधिपन्‍नस्‍स नत्‍थि नातिसु ताणता ।।239।।

एतमत्‍थावसं अत्‍व पंडितो सीलसंवुतो।
निब्‍बान—गमनं मग्‍गं खिप्‍पमेव विसोधये।।240।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-089



आचरण बोध की छाया है—प्रवचन—89

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

मैं जानता हूं कि क्या ठीक है, फिर भी उसे कर नहीं पाता हूं। और आप कहते हैं कि ज्ञान से ही, ज्ञानमात्र से ही आचरण बदल जाता है। यह बात मेरी समझ में नहीं आती!

 हीं भाई, जानते होते तो बदलाहट होती ही! कोई जाने और बदलाहट न हो, ऐसा होता ही नहीं। जानने में कहीं भ्रांति हो रही होगी। बिना जाने सोचते होओगे कि जान लिया। सुनकर जान लिया होगा, पढ़कर जान लिया होगा, जाना नहीं है। स्वयं का अनुभव नहीं है।
ज्ञान तो वही जो स्वयं के अनुभव से निकले। और सब शेष तो अज्ञान को छिपाने के ढंग हैं। जान तो वही जो स्वयं के जीवन की सुगंध की तरह आए। जीवन के अनुभवों का निचोड़ है ज्ञान। जैसे बहुत फूलों को निचोड़कर इत्र बनता है, ऐसे जीवन के बहुत अनुभवों को निचोड़कर ज्ञान बनता है। एक ज्ञान के कण में हजारों अनुभवों का निचोड़ होता है। यह बात उधार नहीं हो सकती। यह इत्र ऐसा नहीं है कि तुम बाजार से खरीद सको। शास्त्र से न मिलेगा, जीवन में ही संघर्ष से, जीवन में ही इंच—इंच चलकर, जीकर ही मिलेगा। जीए बिना ज्ञान नहीं मिलता।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-088



एकांत ध्यान की भूमिका है—प्रवचन—88

सूत्र:


सब्‍बे संखारा अनिच्‍चति यदा पज्‍जाय पस्‍सति।
अथ निब्‍बिन्‍दित दुक्‍खे एस मग्‍गो विसुद्धिया ।।229।।

सब्‍बो संखारा दुक्‍खाति यदा पज्‍जाय पस्‍सति।
अथ निब्‍बिन्‍दति दुक्‍खे एस मग्‍गो विसुद्धिया।।230।।

सब्‍बे धम्‍मा अनत्‍तति यदा पज्‍जाय पस्‍सति।
अथ निब्‍बिन्‍दति दुक्‍खे एस मग्‍गो विसुद्धिया ।।231।।

उट्ठानकालम्‍हि अनुट्ठहानो युवा बलि आलसियं उपेतो।
संसन्‍नसंकप्‍पमनो कुसीतो पज्‍जाय मग्‍गं अलसो न विंदति ।।232।।


            योगा के जायती। अयोगा संखयो।
एतं द्वेधापथं जत्वा— भवाय विभवाय च।
तथत्तानं निवेसेय्य यथा भूरि पवड्ढति ।।233।।

वनं छिंदथ मा रूक्‍खं वनतो जायती भयं।
            छेत्‍वा बन्‍ज्‍च बनथज्‍च निब्‍बना होथ भिक्‍खवो ।।234।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-087



जुहो! जुहो! जुहो!—प्रवचन—87

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

मेरे पास सब है, लेकिन शांति नहीं। पूंजी है, पद है, प्रतिष्ठा है, लेकिन सुख नहीं। मैं क्या करूं?

हीं जी, आपके पास कुछ भी नहीं है। सबकी तो बात ही छोड़ो, कुछ भी नहीं है। क्योंकि सब होता तो शांति होती। सब होता तो सुख होता। वृक्ष तो फल से पहचाना जाता है। फल ही न लगे, उस वृक्ष को वृक्ष कहोगे? सुख का फल न लगे तो वृक्ष झूठा होगा। मान लिया होगा। शांति का जन्म न हो तो संपदा कैसी? फिर तुम विपदा को संपदा कह रहे हो। संपत्ति का अर्थ ही यही होता है कि जिससे सुख पैदा हो, जिसमें सुख के फूल लगें। फल से ही कसौटी है। सुनार सोने को कसता है कसौटी पर, कसौटी पर सोने का चिह्न न बने और वह कहे—सोना तो मेरे पास है लेकिन कसौटी पर चिह्न नहीं बनता, तो तुम क्या कहोगे? पागल है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-086



सौंदर्य तो है अंतर्मार्ग में—प्रवचन—86

सूत्र:


मग्‍गानट्ठंगिको सेट्ठो सच्‍चानं पदा।
            विरागो सेट्ठो धम्‍मानं द्विपदानंच चक्‍खुमा।।225।।

एसोव मग्‍गो नत्‍थज्‍जो दस्‍सनस्‍स विसुद्धियां।
एतं हि तुम्‍हें पटिवज्‍जथ मारस्‍सेतंपरमोहंतं।।226।।

एतं हि तुम्‍हें पटिपन्‍ना दुक्‍खस्‍संतं करिस्‍सथ।
अक्‍खातो वे मया मग्‍गो अज्‍जाय सल्‍लसंथनं।।227।।

तुम्‍हेंहिकिच्‍चं आतप्‍पं अक्‍खातारो तथागता।
पटिपन्‍ना पमोक्‍खंति झायिनो मारबंधना ।।228।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-085



जागरण ही ज्ञान—प्रवचन—85

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

 पीछे लौटना अब मेरे लिए असंभव है। बीज अंकुरित हुआ है। लेकिन यह सब हुआ आपको सुनते—सुनते, देखते—देखते, पढते—पढ़ते। यह शास्त्र ही मेरे लिए नौका बनकर मुझे शून्य में लिए जा रहा है। भय छोड्कर बूंद सागर को मिलने को निकल पडी है। और आप कहते हैं कि शास्त्र से कुछ भी न होगा। यह आप कैसी अटपटी बात कहते हैं?

 मैं अभी शास्त्र नहीं। मैं अभी जीवित हूं। तुम सौभाग्यशाली हो कि तुम शास्त्र के करीब नहीं हो।
बुद्ध जब बोले, तब धम्मपद शास्त्र नहीं था, तब धम्मपद शास्ता था। तब धम्मपद में श्वास थी, प्राण चलते थे, हृदय धड़कता था, खून बहता था, तब धम्मपद जीवित था। कृष्ण जब अर्जुन से बोले, तब गीता गुनगुनाती थी, नाचती थी। तब शास्त्र नहीं था, शास्त्र तो शास्ता के जाने के बाद बनता है। शास्त्र तो समय की रेत पर छोड़ी गयी लकीरें है। सांप तो जा चुका, रेत पर निशान रह गया।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-084



मन की मृत्यु का नाम मौन—प्रवचन—84



सूत्र:

न मुंडकेन समणो अब्‍बतो अलिणं भणं।
इच्‍छालाभ समापन्‍नो समणो किं भविस्‍सति ।।218।।

यो च समेति पापनि अणु थूलानि सब्‍बनि।
समितत्‍ता हि पापानं समाणोति पवुच्‍चति ।।219।।

योध पुज्‍जज्‍च पापज्‍च वाहित्‍वा ब्रह्मचरिय वा।
संखाय लोके चरति स वे भिक्‍खूति वुच्‍चति ।।220।।

न मोनेन मुनि होति मूल्‍हरूपो अविछसू ।
यो च तुलं व पग्‍गय्ह वरमादाय पंडितो ।।221।।

पापानि परिवज्‍जोति स मुनि तेन सो मुनी।
यो मुनाति उभो लोके मुनी तेन पवुच्‍चति ।।222।।

न सीलब्‍बतमत्‍तेन बाहुसच्‍चेन वा पन।
अवथा समाधि लाभेन विवित्‍तयनेन वा ।।223।।

            फुसमि नेक्‍खम्‍मसुखं अपुथुज्‍जनसेवितं।
            भिक्‍खु विस्‍सासमापादि अप्‍पत्‍तो आसवक्‍खयं ।।224।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-083



क्षण है द्वार प्रभु का—प्रवचन—83

प्रश्‍न सार:

 संन्यास लेना चाहता हूं; कब लूं?


ब पूछा तो कभी न ले सकोगे। कब में कभी नहीं छिपा है। कब का अर्थ ही है, टालना चाहते हो, स्थगित करना चाहते हो। कल है नहीं, आज ही है। जो भी करना हो, अभी कर लो। अगर टालने की ही बहुत आदत हो तो बुरे को टालना, भले को मत टालना। क्रोध करना हो तो पूछना, कब? प्रेम करना हो तो मत पूछना। लोभ करना हो तो पूछना, कब? दान करना हो तो मत पूछना। शुभ को तत्‍क्षण कर लेना।
शुभ के संबंध में इतना ध्यान रखना, क्षणभर भी बीत गया तो शायद तुम चैतन्य की उस ऊंचाई पर न रह जाओ, जहां शुभ घटित हो सकता था। तुम सदा ही तो उस अवस्था में नहीं होते जहां प्रेम कर सको। कभी—कभी होते हो। कभी—कभी खिड़की खुलती है। फिर भटक जाते हो। कभी—कभी तारा दिखायी पड़ता है, फिर अंधेरा हो जाता है। तो जब तारा दिखायी पड़े, तभी कर लेना।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-082



धर्म तुम हो—प्रवचन—82


सूत्र:


न तने होति धम्‍मट्ठो येनत्‍थं सहसा नये।
यो च अत्‍थं अनत्‍थज्‍च उभो निच्‍छेय्य पंडितो ।।213।।

असाहसेन धम्‍मेन समेन नयती परे।
ध्‍म्‍मस्‍स गुत्‍तो मेधावी धम्‍मट्ठोति पवुच्‍चति ।।214।।

न तेन पंडितो होति होति यावता बहु भासति।
खेमी अवेरी अभयो पंडितोति पवुच्‍चति ।।215।।

न तेन थेरो होति येनस्‍स पलितं सिरो।
परिपक्‍को वयो तस्‍स मोधजिण्‍णोति वुच्‍चति ।।216।।

यम्‍हि सच्‍चज्‍च धम्‍मो च अहिंसा सज्‍जमो दमो।
से वे वंतमलो धीरो थेरो इति पवुच्‍चति ।।217।।

एस धम्‍मो सनंतनो—(भाग—9) ओशो






मालूम किन शांत, हरियाली घाटियों से आए है। न—मालूम किस और दूसरी दुनिया के हम वासी है। यह जगत हमारा घर नहीं है। यहां हम अजनबी है। यहां हम परदेशी है। और निरंतर एक प्‍यास भीतर है अपने घर लौटने की, हिमाच्‍छादित शिखरों को छूने की । जब तक परमात्‍मा में हम वापस न लौट जाएं तब तक यह प्‍यास जारी रहती है।
प्‍यास सभी के भीतर है—पता हो, या न हो। होश से समझो, तो साफ हो जाएगी; होश से न समझोगे, तो धुधंली—धुधली बनी रहेगी और भीतर—भीतर सरकती रहेगी। लेकिन यह पृथ्‍वी हमारा घर नहीं है। हमार घर कहीं और है समय के पार स्‍थान के पार। यहां हम अजनबी है। बहार हमारा घर नहीं है। भीतर हमारा घर है। और भीतर है शांति, और भीतर है सुख, और भीतर है समाधि।उसकी ही प्‍यास है।
ओशो
एस धम्‍मो सनंतनो
भाग—9