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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--31


याद घर बुलाने लगी—प्रवचन—इकतीसवां

सूत्र:

ण वि दुक्‍खं ण वि सुक्‍खं, ण वि पीडा णेव विज्‍जदे बाहा।
णवि मरणं ण वि जणणं,तत्‍थेव य होई णिव्‍वाणं।। 156।।

ण वि इंदिय उवसग्‍गा, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं
ण य तिण्‍हा णे  छुहा, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं।। 157।।

ण वि कम्‍मं णोकम्‍मं, ण वि चिंता णेव अट्टरूद्दाणि
ण वि धम्‍मसुक्‍कझाणे, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं।। 158।।


णिव्‍वाणं ति अवाहंति,सिद्धीलोगाग्‍गमेव य।
खेमं सिवं अणाबाहं, जं चरंति महेसिणो।। 159।।

लाउअ एरण्‍डफले, अग्‍गीधूमे उसू धणुविमुक्‍के
गइ पुव्‍वपओगेणं, एवं सिद्धाण वि गती तु।। 160।।

अव्‍वाबाहमणिंदियमणोवमं पुण्‍णपावणिम्‍मुक्‍कं
पुणरागमणविरहियं, णिच्‍चं अचलं अणालंबं।। 161।।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--30


एक दीप से कोटि दीप हों—प्रवचन—तीसवां

प्रश्‍नसार:

1—जिन—धारा अनेकांत—भाव और स्‍यातवाद से भरी है, फिर भी प्रेमशून्‍य क्‍यों हो गई?

2—जीसस अपने शिष्‍यों से कहते थे कि यदि मेरे साथ चलने से कोई तुम्‍हें रोके तो उसे मार डालो और मेरे साथ चल पड़ो। प्रेमपुजारी जीसस की ऐसी आज्ञा?

3—अतीत में गुरु के पास एक ही मार्ग के साधक इकट्ठे होते थे। और आपके आश्रम में सभी विपरीत मार्गों का मेला लगा हुआ है—यह कैसे?

4—त्‍वमेव माता च पिता त्‍वमेव, त्‍वमेव, बंधुश्‍च सखा त्‍वमेव
   त्‍वमेव विद्या द्रविणं तवमेव, तवमेव सर्वं मम देव देवा


5—सीमार माझे असीम तुमी बाजाओ आपन सूर
   आमार मध्‍ये तोमार प्रकाश ताई एतो मधुर

6—एक पागल द्वार पर आया था, कुछ गुनगुनाकर चला गया; यह कौन था?

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--29


त्रिगुप्‍ति
 और मुक्‍ति—प्रवचन—उनतीसवां

सूत्र:

जहा महातलायस्‍स सन्‍निरूद्धे जलागमे
उस्‍सिंचणाए तवणाए, कमेण सोसणा भवे।वे।।
एवं तु संजयस्‍सावि पावकम्‍मनिरासवे
भवकोडीसंचियं कम्‍मं,तवसा निज्‍जारिज्‍जइ।। 152।।

तवसा चेव  मोक्‍खो संवरहीणस्‍स होई जिणवयणे
ण हु सोते पविसंते, किसिणं परिसुस्‍सदि तलायं।। 153।।


 अन्‍नाणी कम्‍मं खवेइ बहुआहिं बासकोडिहिं
तं नाणी तिहिं गुत्‍तो, खवेइ ऊसासमित्‍तेणं।।
सेणावइम्‍मि णिहए, जहां सेणा पणस्‍सई
एवं कम्‍माणि णस्‍संति,मोहणिज्‍जे खयं गए।। 154।।

सव्‍वे सरा नियट्टंति, तक्‍का जत्‍थ  विज्‍जइ
मई तत्‍थ  गाहिया, ओए अप्‍पइट्ठाणस्‍स खेयन्‍ने।। 155।।

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--28

रसमयता और एकाग्रता— प्रवचन—अट्ठाइसवां

प्रश्‍नसार:

1—कुछ दिन ध्‍यान में जी लगता है, कुछ दिन भजन में; लेकिन एकाग्रता कहीं नहीं होती।

2—आकस्‍मिक रूप से भगवान से मिलना हुआ और संन्‍यास भी ले लिया, क्‍या यह ध्‍यान कायम रहेगा?

3—भगवान श्री कृष्‍ण के सिर र्दद के लिए ज्ञानियों ने पैर की धूल देने से इंकार कर दिया लेकिन गोपियों ने दे दी—इसका रहस्‍य क्‍या है?

4—क्‍या ध्‍यान की मृत्‍यु और प्रेम की मृत्‍यु भिन्‍न होती है?

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--27

पंडितमरण सुमरण है—प्रवचन—सत्‍ताईसवां

सूत्र:
सरीमाहु नाव त्‍ति, जीवो वुच्‍चइ नाविओ 
संसारो अण्‍णवो वुत्‍तो, जं तरंति महेसिणो।। 146।।

धीरेण वि मरियव्‍वं, काउरिसेण वि अवस्‍समरियव्‍वं
तम्‍हा अवस्‍समरणे, वरं खु धीरत्‍तणे मरिउं।। 147।।

इक्‍कं पंडियमरणं, छिंदइ जाईसयाणि बहुयाणि
तं मरणं मरियव्‍वं, जेण मओ सुम्‍मओ होई।। 148।।

इक्‍कं पंडियमरणं, पडिवज्‍जइ सुपुरिसो असंभंतो
खिप्‍पं सो मरणाणं, काहिइ अंतं अणंताणं।। 149।।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--26

प्रेम के कोई गुणस्‍थान नहीं—प्रवचन छब्बीसवां
प्रश्‍नसार: 
1— बारहवें और तेरहवें गुणस्थान: क्षीणमोह और सयोगिकेवलीजिन में क्या भिन्नता है इसे स्पष्ट करने की कृपा करें।

2—क्‍या तेरहवें गुणस्‍थान को उपलब्‍ध होकर भी उससे च्‍युत हुआ जा सकता है?

3—क्‍या प्रेम के मार्ग पर भी कोई सीढ़ियां होती है?

4—रजनीश एशो आमी तोमार बोइसागी
   आमी पूना गेलाम, आमी काशी गेलाम
   लाओ री लाओ संगे डुगडुगी।

5—देह की वृद्धावस्‍था, मन में आशंका, मरने की पूरी तैयारी, वापसी की भी भय नहीं—लेकिन दुबारा भगवान तो मिलेंगे नहीं।

6—रजनीश महाराज को नमस्‍कार कैसे करें, जब तक कि भीतर का रजनीश उभरकर न आ जाए?

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--25

चौदह गुणस्‍थान—प्रवचन—पच्‍चीसवां

सूत्र:
जेहिं दु लक्‍खिज्‍जंते, उदयादिसुसंभवेहिं भावेहिं 
जीवा ते गुणसण्‍णा, णिद्दिट्ठा, सव्‍वदरिसीहिं।। 144।।

मिच्‍छो सासण मिस्‍सो, अविरदसम्‍मो  देसविरदो य। 
विरदो पमत्‍त इयरो, अपुत्‍व अणियट्टि सुहुमो य।
उवसंत खीणमोहो, सजोगिकेवलिजिणो अजोगी य।
चोद्दस गुणट्ठाणाणि , कमेण सिद्धा य णायव्‍वा।।145।।

ज के सूत्र महावीर की साधना-पद्धति में अत्यंत विशिष्ट हैं। साधक की यात्रा में जैसा सूक्ष्म पड़ावों का विभाजन महावीर ने किया है, वैसा किसी और ने कभी नहीं किया। राह का पूरा नक्शा, रास्ते पर पड़नेवाले पड़ाव, मील के किनारे लगे पत्थर, सभी की ठीक-ठीक सूचना दी है।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--24

आज लहरों में निमंत्रण—प्रवचन—चौबीसवां

प्रश्‍नसार:

1— जैन मानते हैं कि जिन-शासन के अतिरिक्त सभी शासन मिथ्या हैं, जाग्रत व सिद्ध पुरुषों के बाबत बताए जाने पर भी वे उनकी ओर उन्मुख नहीं होते। क्या उन्हें सन्मार्ग पर लाना संभव नहीं है?

2—आपका विरोध करने वाले लोग यदि आपमें उत्‍सुकता लेने लगें तो हम संन्‍यासियों को क्‍या करना चाहिए?

3—महावीर की तरह आप भी अंधविश्‍वासों पर प्रहार करके सदधर्म का तीर्थबना रहे है; फिर भी अंधश्रद्धालुओं में जाग क्‍यों नहीं आती?


4—मुझे गरज किसी से वास्‍ता
  मुझे काम अपने ही काम से
  तेरी जिक्र से, तेरी फिक्र से
  तेरी याद से,  तेरे नाम से।।

5—मन की आवाज कौन—सी है और ह्रदय की कौन--सी?

6कृष्‍ण का भाव करते—करते गोपी भाव में लीन होना और नाचते—नाचते आपके सन्‍मुख हो जाना—यह क्‍या है?