कुल पेज दृश्य

जिन सूत्र --(महावीर)-भाग--1 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जिन सूत्र --(महावीर)-भाग--1 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

जिन सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--31


सम्‍यक दर्शन के आठ अंग—प्रवचन—इकतीसवां

सूत्र:
निस्‍संकिय निक्‍कंखिय निव्‍वितिगिच्‍छा अमूढ़दिट्ठी य। 
उवबूह थिरीकरणे, वच्‍छल पभावणे अट्ठ।। 78।।
                                                 
जत्‍थेव पासे कई दुप्‍पउत्‍तं, काएण वाया अदु माणसेण
तत्‍थेव धीरो पडिसाहरेज्‍जा, आइन्‍नओ खिप्‍पमिक्‍खलीणं।। 79।।

तिण्‍णो हु सि अण्‍णवं महं, किं पुणचिट्ठसि तीरमागओ
अभितुर पारं गमित्‍तए, समयं ! मा पमायए।। 80।।


पहला सूत्र:

"म्यक दर्शन के आठ अंग हैं: निःशंका, निष्कांक्षा, निर्विचिकित्सा, अमूढ़दृष्टि, उपगूहन, स्थिरीकरण, वात्सल्य और प्रभावना'
एक-एक अंग को बहुत ध्यान से समझना जरूरी है।

जिन सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--30

प्रेम है आत्‍यंतिक मुक्‍ति–प्रवचन—तीसवां

प्रश्‍न सार:

1—नरहरि कैसे भगति करूं मैं तोरी, चंचल है मति मोरी।

2—आपने कहा कि जहां उत्‍कट प्‍यास होगी वहां पानी को आना ही पड़ेगा। अब पानी तो आ गया है; लेकिन क्‍या मैं तुरंत अंजुलि भरकर पानी पीना शुरू करूं, या पानीमुंह तक आ जाए, उसकी प्रतीक्षा करूं?

3—आपके प्रति इतना प्रेम हुए भी आपको सुनते वक्‍त कभी—कभी अकुलाहट और क्रोध क्‍यों उठने लगता है?


पहला प्रश्न:

नरहरि कैसे भगति करूं मैं तोरी,
चंचल है मति मोरी!

जिन सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--29


मोक्ष का द्वार: सम्‍यक दृष्‍टि—प्रवचन—उनतीसवां
सूत्र:

दंसणभट्ठा भट्ठ, दंसणभट्ठस्‍स नत्‍थि निव्‍वाणं 
सिज्झंति चरियभट्ठा, दंसणभट्ठा  सिज्झंति।। 71।।

सम्‍मत्‍तस्‍स  लंभो, तलोक्‍कस्‍स  हवेज्‍ज जो लंभो
सम्‍मदंसणलंभो, वरं खु तेलोक्‍कलंभादो।। 72।।

किं बहुण भणिएणं, जे सिद्ध णरवरा गए काले।
सिज्‍झिहिंति जे वि भविया, तं जाणइ सम्‍ममाहप्‍पं।। 73।।

जह सलिलेण  लिप्‍पई, कमलिणिपत्‍तं सहावपयडीए
तह भावेण  लिप्‍पई कसायविसएहिं सप्‍पुरिसो।। 74।।


उवभोगमिंदियेहिं, दव्‍वाणमचेदणाणमिदराणं
जं कुणदिसम्‍मदिट्ठी, तं सव्‍वं णिज्‍जरणिमित्‍तं ।। 75।।

संवेतो वि ण सेवइ, असेवमाणो वि सेवगो कोई।
पगरणचेट्ठा कस्‍स वि, ण य पायरणो त्ति सो होई।। 76।।

 कामभोगा समयं उवेति, न यावि भोगा विगइं उवेति
जे तप्‍पओपी  परिग्‍गही , से तेसु मोहा विगइं विगइं उवेई।।77।।

जिनसूत्र-(भाग--1) प्रवचन--28

जीवन का ऋत्: भाव, प्रेम, भक्‍ति—प्रवचन—अट्ठाईसवां

प्रश्‍नसार:

1— आप कहते हैं कि पुण्य भी बांधता है और पाप भी बांधता है। तो तीर्थंकरों को उनका करुणाजन्य कर्म क्यों नहीं बांधता?

2—पहली बार मैं किसी के प्रेम में पडा हूं, लेकिन मेरा अहंकार मुझे पूरी तरह प्रेम में डूबने नहीं देता। मेरा ह्रदय तो नारद के साथ है, लेकिन बुद्धि महावीर के साथ। उलझन है, खींचतानी है। कृपया मार्गनिर्देश दें।

3—कृपाकर कीर्तन—ध्‍यान के बारे में कुछ समझाएं।



पहला प्रश्न:

आप कहते हैं कि पुण्य भी बांधता है और पाप भी बांधता है। तो तीर्थंकरों को उनका करुणाजन्य कर्म क्यों नहीं बांधता?

जिन सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--27


साधु का सेवन: आत्‍मसेवन—प्रवचन—सत्‍ताईसवां
सूत्र:

सम्‍मदंसणणाणं, एसोलहदि त्‍ति णवरिववदेसं
सव्‍वणयपक्‍खरहिदो, भणिदोजोसोसमयसारो।। 66।।

दंसणाणचरित्‍तणि, सेविदव्‍वाणि साहुणा णिच्‍चं
ताणि पुण जाण तिणिण वि, अप्‍पाणं जाण णिच्‍छयदो।। 67।।

णिच्‍छयणयेण भणिदो, तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्‍पा
 कुणदि किंचि वि अन्‍नं, मुयदि सो मोक्‍खमग्‍गो त्ति।। 68।।

अप्‍पा अप्‍पम्मि रओ, सम्‍माइट्ठी हवेइ फुडु जीवो
जाणइ तं सण्‍णाणं, चरदिह चारित्‍तमग्‍गु त्‍ति।। 69।।

जिन सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--26

तुम्‍हारी संपदा—तुम हो—प्रवचन—छब्‍बीसवां

प्रश्‍नसार:
     
1— न मालूम खोपड़ी में कहां से कहां चला गया! चाहता था योग से शक्ति, यहां समझने को मिली शांति। चाहता था धर्म से प्रभुता, यहां समझने को मिली शून्यता। कुछ निर्णय नहीं कर पाता हूं। मन विक्षिप्त हुआ जाता है। यह यात्रा न मालूम कहां जाकर रुकेगी। पुराना विश्वास बिखर चुका है, नये का जन्म नहीं हो रहा। अब न पीछे जा सकता हूं और न आगे ही बढ़ पाता हूं। कृपया मार्गदर्शन दें!

2—दर्शन के तत्‍क्षण बाद घटी घटना को ही क्‍या भजन कहते है?

3—जो दिन आपके साथ प्रेमपूर्वक बिताए उनको मैं कैसे भूलूं? अतीत को भूलना मेरे बस की बात नहीं है। आप वीतराग है। अब इन आसुओं के सिवा मेरे पास कुछ भी नहीं है। मन बार—बार कहता है, आप कब आएंगे?

जिन सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--25


दर्शन
, ज्ञान, चरित्र—और मोक्ष—प्रवचन—पच्‍चीसवां
सूत्र:

नाणेण जाणई भावे, दंसणेण या सद्दहे
चरित्‍तेणे निगिण्‍हाई, तवेण परिसुज्‍झई।। 62।।

नादंसणिस्‍स नाणं, नाणेण विणा  हुंति चरण गुणा।
अगुणिस्‍स नत्‍थि मोक्‍खो, नत्‍थि अमोक्‍खरस निव्‍वाणं।। 63।।

हयं नाणं कियाहीणं, हया अण्‍णाणओ किया।
पासंतो पंगुलो दड्ढो, धावमाणो  अंधओ।। 64।।

संजोअसिद्धीइ फलं वयंति, न हु एगचक्‍केण रहो पयाइ
अंधो य पंगु य वणे समिच्‍चा, ते संपडत्‍ता नगरंपविट्टा।। 65।।


नाणेण जाणई भावे--ज्ञान से मनुष्य जानता है।
दंसणेण  सद्दहे--दर्शन से श्रद्धा उत्पन्न होती है।
चरित्तेण निगिण्हाइ--चरित्र से निरोध होता है, निषेध होता है।
तवेण परिसुज्झई--और तप से मनुष्य विशुद्ध होता है।