सूत्र:
निस्संकिय निक्कंखिय निव्वितिगिच्छा अमूढ़दिट्ठी य।
उवबूह थिरीकरणे, वच्छल पभावणे अट्ठ।। 78।।
जत्थेव पासे कई दुप्पउत्तं, काएण वाया अदु माणसेण।
तत्थेव धीरो पडिसाहरेज्जा, आइन्नओ खिप्पमिक्खलीणं।। 79।।
तिण्णो हु सि अण्णवं महं, किं पुणचिट्ठसि तीरमागओ।
अभितुर पारं गमित्तए, समयं ! मा पमायए।। 80।।
पहला सूत्र:
"सम्यक दर्शन के आठ अंग हैं: निःशंका, निष्कांक्षा, निर्विचिकित्सा, अमूढ़दृष्टि, उपगूहन, स्थिरीकरण, वात्सल्य और प्रभावना।'
एक-एक अंग को बहुत ध्यान से समझना जरूरी है।
