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मंगलवार, 27 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—24

मेरे एथिक्‍स के प्रोफेसर और मेरे पंचानवे प्रतिशत अंक
जब मैं विश्‍वविद्यालय में विद्यार्थी था। मैंने एथिक्‍स, निति शास्‍त्र लिया था। मैं उस विषय के प्रोफेसर के केवल एक ही लेक्‍चर में उपस्‍थित हुआ। मुझे तो विश्‍वास ही नहीं आ रहा था कि कोई व्‍यक्‍ति इतना पुराने विचारों का भी हो सकता है। वे सौ साल पहले जैसी बातें कर रहे थे। उन्‍हें जैसे कोई जानकारी ही नहीं थी। कि नीति शास्‍त्र में क्‍या-क्‍या परिवर्तन हो चुके है। फिर भी उस बात को में नजर अंदाज कर सकता था। वे प्रोफेसर एकदम उबाऊ आदमी थे।
और जैसे कि विद्यार्थियों को बोर करने की उन्‍होंने कसम खा ली थी। लेकिन वह भी कोई खास बात न थी। क्‍योंकि मैं उस समय सौ सकता था। लेकिन इतना ही नहीं वे झुंझलाहट भी पैदा कर रहे थे। उनकी कर्कश आवाज उनके तौर-तरीके,उनका ढंग, सब बड़ी झुंझलाहट ले आने वाले थे। लेकिन उसके भी अभ्‍यस्‍त हुआ जा सकता था। लेकिन वह बहुत उलझे हुए इंसान थे। सच तो यह है मैंने कभी कोई ऐसा आदमी नहीं देखा जिसमें इतने सारे गुण एक साथ हो।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—23

भट्टाचार्य की भूत से भेट
      मेरे गांव मैं एक आश्रम था, जहां कबीर के एक बहुत प्रसिद्ध अनुयायी साहिब दास रहते थे। वे मुझसे काफी पहले हुए थे। लेकिन वे ध्‍यान करने वालों के लिए एक बड़ा आश्रम एक बड़ा सा मंदिर और बहुत सह गुफाएं छोड़ कर गए थे। वे बहुत सुंदर गुफाएं थी। क्‍योंकि उनका आश्रम नदी के बहुत निकट था। नदी के किनारे छोटी-छोटी पहाड़ियों में उन्‍होंने उन गुफाएं को बनाया था। और उन गुफाओं के भीतर पानी के छोटे-छोटे तालाब बने हुए थे।  तुम गुफा के भीतर जा सकते थे, एक गुफा से दूसरी गुफा में जा सकते थे। यद्यपि कुछ गुफाएं बंद हो चुकी थी। या तो उनमें पूरी तरह पानी भर गया था या उनकी छत ढह चुकी थी। लेकिन उनको देखना ही अपने आप में सुदंर अनुभव था।
      और उन गुफाओं में बैठ जाना....वे इतनी शांत थीं—वहां पर हवा का झोंका तक नहीं आता था। उन्‍होंने उन गुफाओं को ठीक उस अनुपात में बनाया था कि एक व्‍यक्‍ति उन गुफाओं में बिना आक्‍सीजन की कमी के रह सकता था, क्‍योंकि वहां बाहर से हवा नहीं आती थी। लेकिन इस गुफा का आकार तुमको कम से कम ती माह के लिए आक्‍सीजन दे पाने के लिए पर्याप्‍त था। इसलिए लोगों को उन गुफाओं में ध्‍यान करने के लिए भेजा जाता था।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—22

मेरा पुस्‍तक प्रेम
      मेरे पिता जी वर्ष में कम से कम तीन या चार बार बंबई जाया करते थे। और वे सभी बच्‍चों से पूछा करते थे, तुम अपने लिए क्‍या पसंद करोगे। और वे मुझसे भी पूछा करते यदि तुमको किसी वस्‍तु की आवश्‍यकता हो तो में उसको लिखा सकता हूं और बंबई से ला सकता हूं।
      मैंने कहा कभी कुछ लाने के लिए नहीं कहां। एक बार मैंने कहा, मैं केवल यह चाहता हूं कि आप और अधिक मानवीय, पिता पन से कम भरे हुए अधिक मैत्रीपूर्ण,कम अधिनायक वादी, अधिक लोकतांत्रिक, होकर वापस लौटिए। जब लौट कर आएं तो मेरे लिए अधिक स्‍वतंत्रता लेकर आइएगा।
      उन्‍होंने कहा: लेकिन बाजार में यह वस्‍तुएं उपलब्‍ध नहीं है।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—21

मुझे सुझाव दे--आदेश नहीं
    मेरे बचपन में मेरे माता पिता के साथ यह प्रतिदिन की समस्‍या थी। मैंने उनसे बार-बार कहा, एक बार आप लोगों को समझ लेनी चाहिए कि यदि आप चाहते है कि मैं कुछ करू, तो मुझको वह करने के लिए कहें मत, क्‍योंकि यदि आप कहेंगे कि मुझको इसे करना पड़ेगा, तो मैं ठीक उलटा कर देने वाला हूं—चाहे जो भी हो।      
      मेरे पिता ने कहा: तुम ठीक उलटा कर ड़ालोगे।
      मैंने कहा: बिलकुल सही—ठीक उलटा। मैं किसी भी दंड के लिए तैयार हूं, लेकिन वास्‍तव में इस स्‍थिति के लिए आप उत्‍तरदायी है, मैं नही; क्‍योंकि मैंने आरंभ से ही इस बात को स्‍पष्‍ट कर दिया है कि यदि आप वास्‍तव में कोई बात मुझसे करवाना चाहते है तो उसे करने के लिए मुझसे मत कहिए। उसे मुझे स्‍वयं ही खोजने दें।  

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—20

मुहर्रम का त्‍योहार—और मेरी सूई

      मेरे बचपन में मेरे गांव में...जब कभी भी मुसलमानों द्वारा मुहर्रम का त्‍यौहार मनाया जाता है, कुछ लोगों पर पवित्र आत्‍मा सवार हो जाती है। इस पवित्र आत्‍मा को वली कहा जाता है। कुछ लोग ऐसे है जिनको बहुत संत स्‍वभाव का समझा जाता है—उन पर वली सवार हो जाते है। और वे नृत्‍य करते है और चिल्‍लाते है, चीखते है और उनसे तुम सवाल भी पूछ सकते हो।
      और वे भाग कर दूर न चले जाएं, इसलिए उनके हाथ रस्‍सी से बांध दिए जाते है, और दो लोग उनको नियंत्रण में रखते है। बहुत सारे वली होते है। और प्रत्‍येक वली के साथ उसकी अपनी भीड़ होती है। और लोग मिठाइयों और फल उन्‍हें भेंट करने के लिए आते है—किसी को पिछले साल आशिष मिला था और उसके यहां बच्‍चे का, लड़के का जन्‍म हो गया है, किसी को विवाह हो गया है और कोई भविष्‍य के लिए आर्शीवाद लेने आया है।

सोमवार, 26 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—19

मौन की सुगंध
   मैं बहुत छोटा था, शायद बारह वर्ष का रहा होऊंगा, जब एक बहुत विचित्र व्‍यक्‍ति हमारे घर में आया। मेरे पिता उनको लेकर आए थे। क्‍योंकि वे विद्वान  थे। और न केवल विद्वान थे बल्‍कि उनके अपने कुछ प्रमाणिक अध्‍यात्‍मिक अनुभव भी थे। संभवत: उस समय तक वे संबुद्ध नहीं थे। मेरे लिए बिलकुल ठीक से उनको याद रख पाना संभव नहीं है। मैं उनका चेहरा भी याद नहीं कर पा रहा हूं। उन्‍होने सोचा कि शायद ये रहस्‍यदर्शी कुछ कर पाएंगे, कुछ सुझाव दे पाएंगे, मुझे किसी बात पर राज़ी कर पाएंगे, क्‍योंकि मेरे बारे में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति चिंचित था। यद्यपि मैं उनके घर में रह रहा था। लेकिन उन सभी को लगता था कि मैं उनके मध्‍य एक अजनबी था। और वे गलत भी नहीं थे। और अंतत: मेरी उपस्‍थिति कुछ इस भांति की थी नहीं जैसे कि कोई उपस्‍थित हो।
      मेरे पिता उन सूफी रहस्‍यदर्शी को यह सोच कर घर पर लाए थे कि संभवत: कुछ सहायक हो सकेंगे। और मेरे पिता तो हैरान हो गए,मेरा परिवार भी हैरान हुआ, क्‍योंकि उन सज्‍जन ने जो किया...उन्‍होंने मुझको एक अलग कमरा दे रखा था। जिससे कि मैं उनके लिए सतत उपद्रव न बना रहूँ, क्‍योंकि बस वहां पर बैठे रहना,कुछ भी न करना,उनको बेचैन करने के लिए पर्याप्‍त था—वे सभी कुछ न कुछ कर रहे है, प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति कार्य कर रहा है, और मैं आंखें बंद किए बैठा हूं, ध्‍यान कर रहा हूं।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—18

शिक्षक की शर्तें

      मेरे शिक्षकों में से एक प्रतिदिन अपनी कक्षा इस बात को कह कर शुरू किया करते थे। पहले मेरी शर्तों को सुन लो। मुझे सिर में दर्द होना स्‍वीकार नहीं है, मुझे पेट में दर्द होना स्‍वीकार नहीं है। मैं उन चीजों को स्‍वीकार नहीं करता जो मुझे ज्ञात न हो सकें। हां, यदि तुम्‍हें बुखार है, तो मैं इसको स्‍वीकार करता हूं, क्‍योंकि मैं जांच कर सकता हूं कि तुम्‍हारा तापमान बढा हुआ है। इसलिए याद रहे कोई भी ऐसी बात के लिए छुटटी नहीं मिलेगी जो सिद्ध न कि जा सके। कोई डाक्‍टर भी यह सिद्ध नहीं कर सकता कि सिर में दर्द है या नहीं। उन्‍होंने करीब-करीब प्रत्‍येक बात पर रोक लगा दी, क्‍योंकि तुमको दिखने वाली बीमारी प्रस्‍तुत करनी थी। केवल तब ही तुम बाहर जा सकते हो; लेकिन मुझे कुछ उपाय खोजना था, क्‍योंकि यह स्‍वीकार योग्‍य बात नहीं थी।
     
      वे एक वृद्ध व्‍यक्‍ति थे, इसलिए मुझे जो भी करना था वह रात में करना था....वे वृद्ध थे लेकिन बहुत शक्‍तिशाली थे, और व्‍यायाम करने के बारे में टहलने के बारे में बहुत नियमित थे, इसलिए वे सुबह जल्‍दी पाँच बजे उठ जाया करते थे। और अंधेरे में ही दूर तक टहलने के लिए निकल जाते थे। इसलिए मुझे बस उनके दरवाजे पर केले के छिलके रखने पड़े। सुबह-सुबह वे गिर पड़े और उनकी पीठ में चोट लग गई। मैं तुरंत वहां पहुंच गया, क्‍योंकि मुझे इस बारे में पता था।
      उन्‍होंने कहा: मेरी पीठ में बहुत दर्द हो रहा है।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—17

सौ फीट के पूल से छल्‍लांग

      मैंने इस जन्‍म में साहसी होने, प्रखर होने या होने या प्रति भावन होने के लिए आरंभ से ही कुछ अलग कार्य नहीं किया, और कभी इसे साहस प्रखरता प्रतिभा की भांति नहीं सोचा।
      यह तो बाद में धीर-धीरे मैं इस प्रति के प्रति सजग हुआ कि लोग कैसे मंदमति है। यह केवल बाद में प्रतिबिंबित हुआ। पहले मैं जानता ही नहीं था। कि मैं साहसी हूं। मैं सोचा करता था कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति ऐसा ही होना चाहिए। यह तो बाद में ही मुझे स्‍पष्‍ट हो पाया कि प्रत्‍येक  व्‍यक्‍ति वैसा नहीं है।
      अपने बचपन में लिए गए मजों में से एक है—नदी के किनारे की सबसे ऊंची पहाड़ी पर चढ़कर ओर कूद पड़ना। पड़ोस के अनेक बच्‍चे मेरे साथ आया करते थे। वे इसका प्रयास करते लेकिन वे बस छोर तक जा पाते और वापस लौट पड़ते; ऊँचाई को देख कर वे कहते, अचानक कुछ हो जाता है। मैं उनको बार-बार दिखाता था कि यदि मैं कूद सकता हूं—मेरे पास इस्‍पात की देह नहीं है। और यदि मैं कूदता रहता हूं, जिंदा बच जाता हूं, तो तुम क्‍यों नहीं कूद सकते।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—16

तैरना एक युक्‍ति है
      मेरे गांव में एक बहुत सुंदर वृद्ध भले व्‍यक्‍ति थे। उनको प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति प्रेम करता था। वे बहुत सरल और बहुत भोले थे, यद्यपि वे अस्‍सी वर्ष के ऊपर के थे। और मेरे गांव के साथ में ही एक नदी बहा करती थी। उन्‍होंने उस नदी में अपना स्‍वयं को एक स्‍थान बना रखा था,  जहां पर वे अपना स्‍नान किया करते थे। गांव में जहां तक कोई भी स्मरण कर पाता था उन्‍हें सदैव उनको वर्षो से प्रतिदिन वहीं पर देखा था। भले ही वर्षा हो, गर्मी हो या शीत ऋतु , इससे कोई अंतर नहीं आत था। भले ही वे अस्‍वस्‍थ हो या स्‍वस्‍थ , जरा भी भेद नहीं पड़ता था। वे प्रात: ठीक पाँच बजे अपने स्‍थान पर होते। और वह नदी का र्स्‍वाधिक गहरा स्‍थान था। इसलिए सामान्‍य: वहां कोई नहीं जाया करता था। और वह स्‍थान गांव से काफी दूर भी था।
      लोग नदी पर जाया करते थे, वह मेरे घर से कोई आधा फर्लांग दूर थी—वह स्‍थान कोई दो मील दूर था। और जैसे कि हमारे यहां पहाड़ियां नदी को घेरे हुए है। तुमको एक पहाड़ पार करना पड़ता है, फिर एक और पहाड़, फिर एक और पहाड़ पर करना पड़ता है, तब तुम उस स्‍थान पर पहुंच सकोगे। लेकिन यह बहुत सुंदर स्थान था। जैसे ही मुझको इसके बारे में पता लगा मैंने वहां जाना आरंभ कर दिया।

रविवार, 25 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—15

पहली सतोरी नदी तीर
      पने बचपन के दिनों में मैं प्रात: काल जल्‍दी नदी पर जाया करता था। यह एक छोटा सा गांव का। नदी बहुत अधिक सुस्‍त थी। जैसे कि यह जरा भी प्रवाहित न हो रही हो। प्रति: काल जब सूर्योदय न हुआ हो। तुम देख ही नहीं सकते कि नदी प्रवाहित हो रही है या नहीं,यह इतनी मंद और शांत हुआ करती थी। और प्रात: काल मैं जब वहां कोई न हो,स्‍नान करने वाले अभी तक न आए हों।  वह आत्‍यंतिक रूप से शांत रहती थी। प्रात: काल जब पक्षी भी अभी गा रहे हो—ऊषा पूर्व, कोई ध्‍वनि नहीं, बस एक सन्‍नाटा व्‍याप्‍त रहता है। और नदी पर इधर से उधर तक आम के वृक्षों के सुगंध फैली रहती है।
      मैं नदी के दूरस्‍थ कोने तक बस बैठने के लिए,बस वहां होने के लिए जाया करता था। कुछ करने की अवश्‍यकता नहीं थी, वहां होना ही पर्याप्‍त था; वहां होना ही इतना सुंदर अनुभव था। मैं स्‍नान कर लेता, मैं तैर लेता और जब सूर्य उदय होता तो मैं दूसरे किनारे पर रेत के विराट विस्‍तार में चला जाता और वहां घुप में स्‍वय को सुखाता और वहां लेटा रहता। और जब कभी-कभी सो भी जाता।
      जब मैं लौट कर आता,तो मेरी मां पूछा करती, सुबह के पूरे समय तुम क्‍या करते हो?
      मैं कहता: कुछ भी नहीं,क्‍योंकि वास्‍तव में मैं कुछ भी नहीं करता था।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—14

बोतल का रहस्‍य
मेरे पिता, जब वे किस समारोह में, किसी विवाह में, किसी जन्‍म-दिवस की दावत में या कहीं और जा रहे होते,तो मुझको साथ ले जाया करते थे। वे मुझे इस शर्त पर ले जाते थे। कि मैं बिलकुल खामोश रहूंगा, अन्‍यथा तुम कृपया घर में ही रहो।
       मैं कहता: लेकिन क्‍यों? मेरे अतिरिक्‍त प्रत्‍येक व्‍यक्ति को बोलने की अनुमति है।
      वे कहते, तुम जानते हो, मैं जानता हूं,और प्रत्‍येक जानता है। कि तुमको बोलने की अनुमति क्‍यों नहीं है—क्‍योंकि तुम एक उपद्रव हो।
      लेकिन, मैं कहता, उन बातों में जितना संबंध मुझसे है आप वचन दें कि आप मेरे मामलों में हस्‍तक्षेप नहीं करेंगे, और मैं बचन देता हूं कि में खामोश रहूंगा।  
      और अनेक बार ऐसा हो गया कि उनको हस्‍तक्षेप करना पडा। उदाहरण के लिए, यदि काई बड़ी उम्र का व्‍यक्‍ति मिल गया—कोई दूर का सबंधी, परंतु भारत में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है—मेरे पिता उसके चरणस्‍पर्श करते और मुझसे कहते,उनके पैर छुओ।
      मैं कहता: आप मेरे मामले में हस्‍तक्षेप कर रहे है। और हमारा समझौता समाप्‍त। मैं इन बुजुर्ग व्‍यक्‍ति के चरण‍ क्‍यों स्पर्श करूं? उनका मस्‍तक स्‍पर्श क्‍यों न करूं, यदि आप उनके चरणस्‍पर्श करना चाहते है तो उनको दुबारा, तिबारा स्‍पर्श कर सकते है। मैं हस्‍तक्षेप नहीं करूंगा। लेकिन मैं चरण क्‍यों स्‍पर्श क्‍यों करूं?

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—13

पूर्णत: मुक्‍ति

      मेरे पड़ोस में एक मंदिर था, कृष्‍ण का मंदिर, मेरे मकान से कुछ ही मकान आगे। मंदिर सड़क के दूसरी और था, मेरा मकान सड़क के इस और था। मंदिर के सामने वे सज्‍जन रहा करते थे जिन्‍होंने यह मंदिर बनवाया था। वे बहुत बड़े भक्‍त थे।
      वह मंदिर कृष्‍ण के बाल-रूप का था। क्‍योंकि जब कृष्‍ण युवा हो गए तो उन्‍होंने अनेक उपद्रव ओर ऐसे अनेक प्रश्‍न निर्मित कर दिए,इसलिए ऐसे अनेक लोग हैं जो कृष्‍ण को बाल रूप में पूजते है—इसलिए उस मंदिर  को बालाजी का मंदिर कहा जाता है।
      बालाजी का यह मंदिर उन सज्‍जन के घर के ठीक सामने था जिन्‍होंने इसको बनवाया था। उस मंदिर के और उन सज्‍जन की भक्ति, लगातार चलने वाली भक्‍ति के कारण...वे स्‍नान करते—मंदिर के ठीक सामने एक कुआं था। वहां वे अपना पहला कार्य करते—स्‍नान। फिर वे घंटों अपनी प्रार्थना किया करते; और उनको बहुत धार्मिक समझा जाता था। धीरे-धीरे लोगों ने उनको बालाजी कहना आरंभ कर दिया। यह नाम मेरी स्‍मृति में इस भांति बस गया है कि मुझे स्‍वयं भी उनका असली नाम याद नहीं पड़ता।
क्‍योंकि जब तक मुझे मालूम हो पाता कि वे है। तब मैने उनका नाम बालाजी ही सुना था। किंतु यह उनका वास्‍तविक नाम नहीं हो सकता था। यह नाम इस लिए पड़ गया होगा क्‍योंकि उन्‍होंने बालाजी को मंदिर बनवाया था।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—12

बहादुर या कायर मास्‍टर

    मेरे हाई स्‍कूल में, वहां विद्यालय भवन में दो इमारतें थी। और उनके बीच में  कम से कम बीस फिट  का फासला था। मुझे लकड़ी का एक ऐसा पटिया मिल गया जो बीस फिट लंबा था। पहले मैं इसे भूमि पर रख देता और अपने मित्रों से कहता, तुम इस पर चल सकते हो? और प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति इसपर बिना गिरे चल पाने में समर्थ था। और तब मैं लकड़ी के उस पटिये को उन दो इमारतों पर पुल की भांति रख देता था, और मेरे अतिरिक्‍त कोई उस पर चलने का प्रयास तक करने को तैयार नहीं होता।
      मैं कहा करता, अजीब मामला है यह,    क्‍योंकि उसी पटिये पर तुम चल चुके हो और तुम गिरे नहीं थे।
      वे कहते, वह भिन्‍न परिस्‍थिति थी। अब यह इतना खतरनाक है कि जरा सा भय लगता है, यदि बस एक कदम गलत पड़ गया तो तुम तीस फीट नीचे गिर पड़ोगे।

शनिवार, 24 मार्च 2018

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—11

ओम, ओम.....का नाद और दंड

      पने प्राइमरी स्‍कूल में उस समय मैं चौथी कक्षा में था, मेरे एक शिक्षक थे...स्‍कूल में यह उनकी कक्षा में मेरा पहला दिन था, और मैंने कुछ गलत किया भी नहीं था, मैं वहीं कर रहा था जो तुम ध्‍यान में किया करते हो: ओम, ओम....., लेकिन भीतर-भीतर मुंह बंद करके। मेरे कुछ मित्र थे, और मैंने उनको भिन्‍न—भिन्‍न स्‍थानों पर बैठने के लिए कह रखा था। जिस से वह  शिक्षक जान न सके कि ध्‍वनि कहां से आ रही है। एक समय यह ध्‍वनि यहां से आ रही होती, दूसरे समय यह वहां से आ रही होती, फिर एक बार यहीं से आ रही होती। वह खोजते रहे कि ध्‍वनि कहां से आ रही थी। इसलिए मैंने उनको कहा हुआ था, अपने मुंह बंद रखो और भीतर ओम का जाप करते रहो।
      एक क्षण को तो वे इसको जान नही पाए। मैं बिलकुल पीछे बैठा था। सारे अध्‍यापक चाहते थे कि में उनके सामने बैठा करूं जिससे वे मुझ पर निगाह रख सकें। और मैं सदा पीछे बैठना चाहता था। जहां तुम कई  और काम कर सकते हो, यह अधिक सुविधाजनक है। वे सीधे ही मेरे पास आए। अवश्‍य ही उन्‍हें तीसरी कक्षा के शिक्षक ने यह बता दिया होगा कि ‘’ आप इस लड़के पर निगाह रखें। इसलिए उन्‍होंने कहा: हालांकि मैं जान नहीं पा रहा हूं कि वे लोग क्‍या कर रहे है जो यह सब कर रहे है। तुम ही यह कर रहे होओगे।‘’

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—10

दंड या पुरस्‍कार

      क्षियों को सुनते-सुनते मुझे स्‍मरण हो आता है.....होई स्‍कूल में बस मेरी कक्षा के बाहर ही आम के अनेक वृक्ष थे। और आम के वृक्षों पर कोयलें अपना घोंसला बनाया करती है। जिसकी पुकार इस समय आ रही है, वहीं है कोयल, और कोयल की बोली में मधुर और कुछ भी नहीं है।
      इसलिए मैं खिड़की के पास पक्षियों की ओर, वृक्षों की और बाहर देखता हुआ बैठा करता था, और मेरे शिक्षक बहुत अधिक नाराज रहा करते थे। वे कहा करते,तुम्‍हें ब्‍लैक बोर्ड की और देखना पड़ेगा।
      मैं कहता,यह मेरा जीवन है और मुझको यह चुनने का पुरा अधिकार है कि कहां देखना है। बाहर कितना सुंदर है—पक्षी गीत गा रहे ह,और ये पुष्‍प, और ये वृक्ष, और वृक्षों की पत्‍तियों से छन-छन कर आती हुई यह धूप—तो मैं ऐसा नहीं सोचता कि आपका ब्‍लैक बोर्ड कहीं से इनका स्‍थानापन्‍न बन सकता है।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—09

मैं निर्वासित व्‍यक्‍ति था

      ब मैं अपनी प्राथमिक पाठशाला में पढ़ा करता था। उस समय मेरा घर विद्यालय से बहुत निकट था। इसलिए जब विद्यालय के आरंभ होने की घंटी बजती, मेरे लिए वह स्‍नानागार मैं जाने का समय होता। मेरा पूरा परिवार दरवाजा खटखटा रहा होता, और मैं खामोश रहता—किसी बात का उत्‍तर भी न देता।
      यह प्रतिदिन का क्रम था कि प्रधानाध्‍यापक मुझे ले जाने आया करते थे, क्‍योंकि मैं अपनी स्‍वयं की इच्‍छा से नहीं जाता था। और वे आ जाते, और पिता कहते, करें क्‍या? आप इस घंटी को बजाना बंद कर दीजिए, क्‍योंकि जिस क्षण इसे बजाते है वह तुरंत स्‍नानागार में चला जाता है। और दरवाजा बंद कर लेता है। और फिर निरर्थक है यह कि आप कुछ कर सकें, क्‍योंकि आप जो कुछ भी करते रहो, वह उत्‍तर नहीं देगा।
      अंतत: विद्यालय ने घंटी न बजाने का निर्णय ले लिया। और प्रधानाध्‍यापक आया करते थे—पहले मुझको पकड़ लिया जाता था और तब अन्‍य बच्‍चों के लिए घंटी बजा दी जाती थी।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—08

ब्राह्मण की चोटी काटना
    मेरे बचपन में—क्‍योंकि उसके बारे में मैं तुमसे अधिक अधिकार पूर्वक बात कर सकता हूं; मैं तुम्‍हारे बचपन के बारे में नहीं जानता, केवल अपने बचपन के बारे में जानता हूं—यह प्रश्न प्रतिदिन का था। मुझसे लगातार सत्‍यभाषी होने के लिए कहा जाता था। मैंने अपने पिता को कहा: ‘जब कभी आप मुझसे सत्‍यभाषी होने के लिए कहते है, आपकेा एक बाप स्‍मरण रखनी चाहिए कि सत्‍य को पुरस्‍कृत किया जाना चाहिए, अन्‍यथा आप मुझको सत्‍य भाषण न करने भाषण न करने के लिए बाध्‍य कर रहे है। में सत्‍य भाषण के लिए राज़ी हूं।’
      बहुत सालता से मैंने जान लिया था कि सत्‍य से कुछ नहीं मिलता, तुमको दंड दिया जाता है। असत्‍य से मिलता है: पुरस्‍कृत किए जाते हो तुम। अब यह प्रश्‍न बहुत निर्णायक था, बहुत अधिक महत्‍व का था। इसलिए मेंने अपने माता-पिता से यह मामला स्‍पष्‍ट कर दिया था कि यह बात बहुत साफ-साफ समझ जी जानी चाहिए, यदि आप चाहते है कि मैं सत्‍यवादी रहूँ तो सत्‍य को पुरस्‍कृत किया जाना चाहिए, और पुरस्‍कार भविष्‍य के जीवन में नहीं वरन अभी और यहीं मिलना चाहिए।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—07

‘’पिता का थप्‍पड़ मारना’’

    मेरे दादा प्रत्‍येक मामले मैं सदैव मेरे पक्ष में रहा करते थे। यदि वे कर सकते तो वे मेरे साथ सहभागिता करने को तत्‍पर रहते थे। निस्‍संदेह उन्‍होंने कभी मुझे दंडित नहीं किया, उनहोंने मुझे सदा पुरस्‍कृत किया।
      मैं हर रात देर से घर आया करता था, और घर में घुसते ही जो पहली बात वे पूछते थे सह यह कि ‘आज तुमने क्‍या-क्या किया है।’ सब कुछ कैसा चल रहा है, कोई परेशानी तो पैदा नहीं हुई, रात में उनके बिस्‍तर पर साथ  बैठ कर हमारी सदा महफिल जमा करती थी। और वे हद बात का मजा लेते थे। मैं उनको हद बात बताया करता था। जो उस दिन हुई थी और वे कह देते, ‘वास्‍तव में एक अच्‍छा दिन था।’
      मेरे पिता ने मुझको केवल एक बार दंडित किया, क्‍योंकि मैं एक मेले में जो नगर से कुछ मील दूर प्रतिवर्ष हुआ करता था, चला गया था। वहां पर हिंदुओं की पवित्र नदियों में से एक नर्मदा बहा करती थी, और नर्मदा के तट पर एक महीने तक एक विशाल मेला लगा करता था। इसलिए मैं बिना उनसे पूछे वहां मेले में चला गया।

स्वर्णिम बचपन (परिशिष्ट प्रकरण)—06

दादा और मेरी शरारतें
     मेरे दादा मेरी शरारतों के कारण मुझसे बहुत प्रेम करते थे। उस वृद्धावस्‍था में भी वे शरारती थे। उन्‍होंने मेरे पिता या चाचाओं को कभी पसंद नहीं किया, क्‍योंकि वे सभी इस बूढ़े आदमी की शरारतों के विरूद्ध थे। वे सभी उनसे कहते थे कि ’अब आप सत्‍तर साल के हो चुके है और आपको उसी प्रकार से आचरण करना चाहिए। अब आपके बेटे पचास-पचपन साल के है, आपकी बेटियाँ पचास साल कि है। उनके बच्‍चों की शादियाँ हो चुकी है, उनके बच्‍चों के बच्‍चें हो चूके है। और आप ऐसे काम करते रहते है कि हमको शर्म आती है।’
      मैं एक मात्र व्यिक्त था। जिससे उनकी निकटता थी, क्‍योंकि मैं उन्‍हें इसीलिए चाहता था कि सत्‍तर साल की आयु में भी उन्‍होंने अपना बचपना नहीं खोया था। वे किसी बच्‍चे की भांति ही शरारती थे। और वे शरारतें अपने स्‍वयं के बेटों और बेटियों और दामादों के साथ किया करते थे। और वे लोग केवल अचंभित रह जात थे।