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बिन घन परत फुहार—(सहजोबाई)--ओशो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शुक्रवार, 16 मार्च 2018

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-10



निस्‍चै कियो निहार—(प्रवचन—दसवां)

प्रातः; 10 अक्टूबर, 1975; श्री ओशो आश्रम, पूना.

प्रश्न सार :
1—साधना की गति बेबूझ मालूम पड़ती है। कभी सब दौड़ व्यर्थ लगती है कभी लगता है अभी यात्रा भी शुरू नहीं हुई। क्या साधना ऐसे ही चलती है?
2—क्या दर्शन के लिए विचार और समझ का कोई भी उपयोग नहीं हो सकता?
3—मेरे जैसे लोग तो जीवन की धूप-छांव से गुजरे बगैर संन्यस्त हो गए। कृपया बताएं हमारा क्या होगा?
4—सहजो धर्म-साधना गोपनीय ढंग से करने को कहती है, लेकिन हम तो माला और वस्त्र पहन कर उसकी खबर दिए रहते हैं। इस पहलू पर कुछ प्रकाश डालें।
5—कृपापूर्वक प्रसाद और पात्रता के अंतर्संबंध पर प्रकाश डालें।
6—ना काहू के संग है, सहजो ना कोई संग। पर सहजो जैसे संत ही संग, सत्संग का महिमा गुणगान भी करते हैं, ऐसे विरोधाभास क्यों है?

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-09



सदगुरू ने आंखे दयीं—(प्रवचन—नौवां)


प्रातः; 9 अक्टूबर, 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.

सारसूत्र :

सहजो सुपने एक पल, बीतैं बरस पचास।
आंख खुले जब झूठ है, ऐसे ही घट-बास।।
जगत तरैयां भोर की, सहजो ठहरत नाहिं।
जैसे मोती ओस की, पानी अंजुली माहिं।।
धूआं को सो गढ़ बन्यौ, मन में राज संजोय।
साईं माईं सहजिया, कबहूं सांच न होय।।
निरगुन सरगुन एक प्रभु, देख्यो समझ विचार।
सदगुरू ने आंखें दयीं, निस्चै कियो निहार।।
सहजो हरि बहुरंग है, वही प्रकट वही गूप।
जल पाले में भेद ना, ज्यों सूरज अरू धूप।।
चरनदास गुरु की दया, गयो सकल संदेह।
छूटे वाद-विवाद सब, भयी सहज गति तेह।।
सदगुरु ने आंखें दयीं

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-08



जलाना अंतर्प्रकाश को—(प्रवचन—आठवां)

प्रातः; 8 अक्टूबर, 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.

प्रश्न सार :
1—हमें बचाने के लिए आप कोई क्रूर उपाय क्यों नहीं करते हैं?
2—क्या कारण है कि समस्त पशुओं में केवल मनुष्य नामक पशु ही दिखावे के रोग का शिकार है?
3—विज्ञान सकारण खोज है। तो क्या धर्म की खोज अकारण की जाती है?
4—आपके पास आने का न तो मेरे पास कोई कारण है, न ये कह सकता हूं कि अकारण आ गया हूं। कृपया बताएं कि मैं कहा हूं?
5—जहां सहजोबाई की भक्ति भावना की परिणति अद्वैत में होती है, वहां गोस्वामी तुलसीदास की भक्ति में द्वैत बना रहता है। इस भेद पर प्रकाश डालें।

पहला प्रश्न:

आपने कहानी कही कि किसी राजा ने कैसे क्रूरता के द्वारा एक आदमी को उसके उदरस्थ सांप से उबारा। हम भी तो ऐसे ही मद-मत्सर का सांप उदरस्थ किए बैठे हैं। उससे हमें बचाने के लिए आप भी क्यों नहीं कोई क्रूर उपाय करते?

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-07



पारस नाम अमोल है—(प्रवचन—सातवां)

प्रातः, 7 अक्टूबर, 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.

सारसूत्र :

मोह मिरग काया बसै, कैसे उबरै खेत।
जो बावै सोई चरै, लगैं न हरि सू हेत।।
प्रभुताई कूं चहत है, प्रभु को चहै न कोइ।
अभिमानी घट नीच है, सहजो ऊंच न होइ।।
सदा रहै चितभंग ही, हरिदै थिरता नाहिं।
रामनाम के फल जिते, काम लहर बहि जाहिं।।
पारस नाम अमोल है, धनवंते घर होय।
परख नहीं कंगाल हूं, सहजो डारे खोय।।
सहजो सुमिरन कीजिये, हरिदै माहिं दुराय।
होठ होठ सूं ना हिलै, सकै नहीं कोइ पाय।।
रामनाम यूं लीजिये, जानै सुमिरनहार।
सहजो कै करतार ही, जानै ना संसार।।
पारस नाम अमोल है

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-06



भक्‍त में भगवान का नर्तन—(प्रवचन—छठवां)

प्रातः, 6 अक्टूबर 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.
प्रश्न सार :
1—बुद्ध शून्यता का आग्रह करते हैं और शंकर पूर्णता का। वे दूसरे का खंडन एवं स्वयं का मंडन क्यों करते हैं? आप दोनों का समर्थन करते हैं, ऐसा क्यों?
2—सहजोबाई का मार्ग है प्रेम, भक्ति का। फिर भी वह अंतर्यात्रा और वीतरागता पर जोर क्यों देने लगती है?
3—आपने कहा कि यदि तुम्हें पता है कि मैं संतुष्ट हूं, कि मैं सुखी हूं, तो समझना कि अभी संतोष और सुख नहीं आए हैं। इस हालत में स्वयं साधु होकर सहजोबाई कैसे कह सकी कि--साध सुखी सहजो सहै?
4—अद्वैत को उपलब्ध सहजो के लिए भक्त की भिन्नता हमें समझाने की कृपा करें।
5—दर्शन की भिन्नता क्या द्रष्टा के व्यक्तित्व की भिन्नता पर निर्भर है?
6—भक्त में भगवान का नर्तन

मंगलवार, 13 मार्च 2018

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-05



जो सोवे तो सुन्‍न में—(प्रवचन—पांचवां)  

प्रातः; 5 अक्टूबर, 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.
सारसूत्र :

निर्दुन्दी निर्वेरता, सहजो अरु निर्वास।
संतोषी निर्मल दसा, तकै न पर की आस।।
जो सोवै तो सुन्न में, जो जागै हरिनाम।
जो बोलै तो हरिकथा, भक्त्ति करै निहकाम।।
नित ही प्रेम पगै रहैं, छकै रहैं निज रूप।
समदृष्टि सहजो है, समझैं रंक न भूप।।
साध असंगी संग तजै, आतम ही को संग।
बोधरूप आनंद में, पियैं सहज को रंग।
मुये दुखी जीवन दुखी, दुखिया भूख अहार।
साध सुखी सहजो कहै, पायो नित्त विहार।।
जो सोवै तो सुन्न में
क छोटी कहानी से शुरू करें। हसीद कथा है।
एक सम्राट का इकलौता बेटा था--शराबी, जुआरी, वेश्यागामी। सम्राट परेशान था। सब तरह समझाया, कोई राह न बनी। मजबूरी में, आखिरी उपाय की तरह, शायद इस तरह चेत जाए, सम्राट ने उसे राज्य से बाहर निकाल दिया।
सोचा था, क्षमा मांगेगा, पछतावा करेगा, वापस लौट आएगा। समझ आ जाएगी। ऐसा कुछ भी न हुआ। बेटा गया तो वापस न लौटा। भटकता रहा राज्य की सीमाओं के आसपास। अंततः उसने एक शराबियों के अड्डे में प्रवेश पा लिया।

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-04



हरि संभाल तब लेह—(प्रवचन—चौथा)
 
प्रातः; 4 अक्टूबर, 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.
प्रश्न-सार :
1—आपकी और सहजोबाई की भाषा की मधुरिमा और लयपूर्णता में साम्य सा क्यों लगता है?
2—आपने कहा कि महत्वाकांक्षी प्रेम नहीं कर सकता। तो क्या हमारा प्रेम झूठा है?
3—आपने कहा कि आदर मेंर् ईष्या सम्मिलित है। क्या श्रद्धा इस विष भरे आदर का अतिक्रमण करती है?
4—प्रेम और करुणा में क्या भेद है?
5—वाणी का मौन भीतर के कौन के लिए किस प्रकार सहायक है?
6—हरि संभाल तब लेह

पहला प्रश्न:

आपकी और सहजोबाई की भाषा की मधुरिमा और लयपूर्णता में साम्य सा क्यों लगता है?

क ही कुएं से पानी पीने के कारण। शब्द या तो अंतर के अनुभव से आते हैं, या मस्तिष्क के संग्रह से। पंडित की भाषा में साम्य होगा। संतों की भाषा में भी साम्य होगा। पंडितों की भाषा में साम्य होगा तर्क का, साम्य होगा शब्द विन्यास का, साम्य होगा बाल की खाल निकालने का। संतों की भाषा में भी साम्य होगा--उस गहराई का जहां से शब्द आते हैं। शास्त्र का साम्य नहीं होगा; शून्य का, स्वाद का साम्य होगा। मधुरिमा होगी। तर्क नहीं है आधार उनके वक्तव्य का, प्रेम आधार है। इसलिए नहीं कुछ कह रहे हैं क्योंकि कुछ कहना है, बल्कि इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कहने में एक करुणा है। कुछ देना है। कहने से ज्यादा देना। वक्तव्य से ज्यादा एक भेंट।

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-03



पाँव पड़ै कित कै किती—(प्रवचन—तीसरा)  

प्रातः; 3 अक्टूबर 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना.

सारसूत्र :

प्रेम दिवाने जे भये, पलटि गयो सब रूप।
सहजो दृष्टि न आवई, कहा रंक कह भूप।
प्रेम दिवाने जे भये, जाति वरन गए छुट।
सहजो जग बौरा कहे, लोग गए सब फूट।।
प्रेम दिवाने जे भये, सहजो डिगमिग देह।
पांव पड़ै कित कै किती, हरि संभाल तब लेह।।
मन में तो आनंद रहै, तन बौरा सब अंग।
ना कहू के संग है, सहजो ना कोई संग।।
पावं पड़ै कित कै किती
चेतना की दो दशाएं हैं। एक प्रेम की, एक प्रेम के प्रभाव की। चाहो तो कहो जागने की, सोने की। चाहो तो कहो धर्म की, अधर्म की। शब्दों से भेद नहीं पड़ता।
लेकिन चेतना दो ढंग से हो सकती है। जिसे तुमने संसार कहा है, वह चेतना के अप्रेम की अवस्था है। प्रेमशून्य आंखों से जब अस्तित्व को देखा जाता है तो संसार दिखायी पड़ता है। आंखें जब प्रेम से भर जाती हैं, तो वही जो कल तक संसार दिखायी पड़ता था, अचानक क्षणमात्र में परमात्मा हो जाता है।

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-02



बहना स्‍वधर्म में—(प्रवचन—दूसरा)

प्रातः दिनांक 2 अक्टूबर 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना

प्रश्न सार :

1—भक्ति के मार्ग पर जीवन की किसी भी बात का इनकार नहीं। फिर क्यों कर सहजोबाई शरीर, इंद्रिय एवं घर परिवार को बंधन, प्रवचन, परमात्मा से विपरीत मानती हैं?
2—क्या प्रेम में रोग और आसक्ति निहित नहीं हैं?
3—आप कैसे जानते हैं कि सहजोबाई आत्मोपलब्ध थीं?
4—क्या स्त्रियों और पुरुषों के प्रश्न भिन्न होते हैं?
5—स्त्रियों को संघ में प्रवेश देने के कारण, भगवान बुद्ध का धर्म भारत में पांच हजार की जगह पांच सौ वर्ष ही चला। आप अपने संघ में स्त्रियों को मुक्तभाव से प्रवेश दे रहे हैं; आपका धर्म कितना दीर्घजीवी होगा?

सोमवार, 12 मार्च 2018

बिन घन परत फुहार—प्रवचन-01


  रस बरसे मैं भीजूं—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 1 अक्टूबर, 1975;
श्री ओशो आश्रम, पूना,
 सारसूत्र :
राम तजूं पै गुरु न बिसारूं।
गुरु को सम हरि को न निहारू।।
हरि ने जनम दियो जग माहीं।
गुरु ने आवागमन छुटाहीं।।
हरि ने पाचं चोर दिये साथा।
गुरु ने लई छुटाया अनाथा।।
हरि ने कुटुंब जाल में गेरी।
गुरु ने काटी ममता बेरी।।
हरि ने रोग भोग उरझायौ।
गुरु जोगी कर सबै छुटायौ।।
हरि ने कर्म भर्म भरमायौ।
गुरु ने आतम रूप लखायौ।।
हरि ने मोसूं आप छिपायौ।
गुरु दीपक दै ताहि दिखायौ।।
फिर हरि बंधि मुक्ति गति लाये।
गुरु ने सबही भर्म मिटाये।।
चरनदास पर तन मन वारूं।
गुरु न तजूं हरि को तज डारूं।।
रस बरसै मैं भीजूं
बिन धन परत फुहार--यह वार्तामाला एक नयी ही यात्रा होगी। मैं अब तम मुक्त पुरुषों पर बोला हूं। पहली बार एक मुक्तनारी पर चर्चा शुरू करता हूं। मुक्त पुरुषों पर बोलना आसान था। उन्हें मैं समझ सकता हूं--वे सजातीय हैं। मुक्तनारी पर बोलना थोड़ा कठिन होगा--वह थोड़ा अजनबी रास्ता है। ऐसे तो पुरुष और नारी अंतरतम में एक हैं, लेकिन उनकी अभिव्यक्तियां बड़ी भिन्न-भिन्न हैं। उनके होने का ढंग, उनके दिखायी पड़ने की व्यवस्था, उनका वक्तव्य, उनके सोचने की प्रक्रिया, न केवल भिन्न है बल्कि विपरीत है।

बिन घन परत फुहार—(सहजोबाई) ओशो



 बिन घन परत फुहार—(सहजोबाई)

ओशो
ब तक किसी मुक्तनारी पर नहीं बोला। तुम थोड़ा मुक्त पुरुषों को समझ लो, तुम थोड़ा मुक्ति का स्वाद चल लो, तो शायद मुक्तनारी को समझना भी आसान हो जाए।
जैसे सूरज की किरण तो सफेद है, पर प्रिज्म से गुजर कर सात रंगों में टूट जाता है। हरा रंग लाल रंग नहीं है, और न लाल रंग हरा रंग है; यद्यपि दोनों एक ही किरण से टूटकर बने हैं, और दोनों अंततः मिलकर पुनः एक किरण हो जाएंगे। टूटने के पहले एक थे, मिलने के बाद फिर एक हो जाएंगे, पर बीच में बड़ा फासला है; और फासला बड़ा प्रीतिकर है। बड़ा भेद है बीच में, और भेद मिटना चाहिए। भेद सदा बना रहे, क्योंकि उसी भेद में जीवन का रस है। लाल लाल हो, हरा हरा हो। तभी तो, हरे वृक्षों पर लाल फूल जाते हैं। हरे वृक्षों पर हरे फूल बड़ी शोभा न देंगे। लाल वृक्षों पर लाल फूल फूल जैसे न लगेंगे।