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शुक्रवार, 8 जून 2018

सपना यह संसार--(प्रवचन--20)

ज्ञान से शून्य होने में ज्ञान से पूर्ण होना है—(प्रवचन—बीसवां)

 दिनांक; सोमवार, 30 जुलाई 1979;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान,
क्या प्रभु—मिलन में विरह—अवस्था से गुजरना आवश्यक है?
2—भगवान,
मैं मृत्यु की तो बात दूर, मृत्यु शब्द से भी डरती हूं। मृत्यु से कैसे छुटकारा हो सकता है?
3—भगवान,
आप इतने प्रेम से समझाते हैं, पर मुझ अज्ञानी के पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता। वैसे वेद, पुराण, गीता इत्यादि सब मेरी समझ में आ जाते हैं। फिर आप क्यों समझ में नहीं आते?

सपना यह संसार--(प्रवचन--19)

मुंह के कहे न मिलै, दिलै बिच हेरना—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

दिनांक; रविवार, 26 जुलाई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र:
हरि—चरचा से बैर संग वह त्यागिये
अपनी बुद्धि नसाय सवेरे भागिये।।
सरबस वह जो देइ तो नाहीं काम का।
अरे हां, पलटू मित्र नहीं वह दुष्ट जो द्रोही राम का।।

लोक—लाज जनि मानु वेद—कुल—कानि को।
भली—बुरी सिर धरौ भजौ भगवान को।।
हंसिहै सब संसार तौ माख न मानिये
अरे हां, पलटू भक्त जक्त से बैर चारो जुग जानिये।।

सपना यह संसार--(प्रवचन--18)

मुझे दोष मत देना!—(प्रवचन—अठारहवां)

दिनांक; २८ जुलाई १९७९;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान, मैं प्रभु को पुकारता हूं, वर्षों से पुकारता हूं, नियमित प्रार्थना करता हूं, लेकिन मेरी पुकारों का कोई उत्तर कभी मिलता नहीं। क्या मुझसे कहीं कोई भूल हो रही है?
2—मैकशों की यही आरजू है
साकिया आज ऐसी पिला दे
मैकदे में हैं जितने शराबी
आज सबको नामजी बना दे
3—यह कैसे पता चले कि जो हो रहा है वह प्रभु की मर्जी से हो रहा है या हम आलस्य के प्रभाव से नहीं कर पा रहे हैं? कृपा करके समझाएं।

गुरुवार, 7 जून 2018

सपना यह संसार--(प्रवचन--17)

ज्ञान ध्यान के पार ठिकाना मिलैगा—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक; शुक्रवार, 27 जुलाई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र—
टोप—टोप रस आनि मक्खी मधु लाइया
इक लै गया निकारि सबै दुख पाइया।।
मोको भा बैराग ओहि को निरखिकै
अरे हां, पलटू माया बुरी बलाय तजा मैं परिखिकै।।

फूलन सेज बिछाय महल के रंग में।
अतर फुलेल लगाय सुनदरी संग में।।
सूते छाती लाय परम आनंद है।
अरे हां, पलटू खबरि पूत को नाहिं काल को फंद है।।

खाला के घर नाहिं, भक्ति है राम की।
दाल भात है नाहिं, खाए के काम की।।
साहब का घर दूर, सहज ना जानिए।
अरे हां, पलटू गिरे तो चकनाचूर, बचन कौ मानिए।।

सपना यह संसार--(प्रवचन--16)

गहन से भी गहन प्रेम है सत्संग—(प्रवचन—सोलहवां)

दिनांक; गुरुवार, 26 जुलाई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान, बुद्ध कहते हैं: अप्प दीपो भव। अपने दीए स्वयं बनो। और आपकी देशना है: रसमय होओ, रासमय होओ। क्या दोनों उपदेश मात्र अभिव्यक्ति के भेद हैं?
2—भगवान, मैं वर्षों से संतों की वाणी के अध्ययन—मनन में लीन रहा हूं, पर अभी तक कहीं पहुंचा नहीं। और संत तो कहते हैं कि सत्संग क्षण में पहुंचा देता है!
3—भगवान, कोई इंसान इंसान को भला क्या देता है
आदमी सिर्फ बहाना है, बस खुदा देता है
वह जहन्नुम भी दे तो करूं शुक्र अदा
कोई अपना ही समझकर तो सजा देता है

सपना यह संसार--(प्रवचन--15)

करामाति यह खेल अंत पछितायगा—(प्रवचन—पंद्रहवां)
दिनांक; बुधवार, 25 जुलाई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र:
करामाति यह खेल अंत पछितायगा
चटक—भटक दिन चारि, नरक में जायगा।।
भीर—भार से संत भागि के लुकत हैं।
अरे हां, पलटू सिद्धाई को देखि संतजन थुकत हैं।

क्या लै आया यार कहा लै जायगा।
संगी कोऊ नाहिं अंत पछितायगा।।
सपना यह संसार रैन का देखना।
अरे हां, पलटू बाजीगर का खेल बना सब पेखना।।

जीवन कहिए झूठ, साच है मरन को।
मरूख, अजहूं चेति, गहौ गुरु—सरन को।।
मांस के ऊपर चाम, चाम पर रंग है।
अरे हां, पलटू जैहै जीव अकेला कोउ ना संग है।।

सपना यह संसार--(प्रवचन--14)

धर्म की भाषा है: वर्तमान—(प्रवचन—चौदहवां)
दिनांक; मंगलवार, २४ जुलाई १९७९;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—भगवान, पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। लोहा पारस हो जाए, क्या यह संभव है?
2—भगवान, नाम—जप करते—करते उम्र ढल गई। हाथ तो कभी कुछ लगा नहीं। लेकिन जब भी तथाकथित पंडित—पुजारियों, साधु—महात्माओं से पूछा, तो उन्होंने कहा—बेटा, यह कार्य जन्मों की साधना से होता है। और जीवन के अंतिम पहर में अब आप मिले तो लगता है: मैं भी किन धोखेबाजों के चक्कर में पड़ा रहा! अब मैं क्या करूं?
3—भगवान,
ये युगल बावरे नैन
और तू दूर देश का वासी
चिर से तव दर्शन की उत्कट अभिलाषा है
तेरे इस मधुर मिलन की इनको आशा है
दर्शन से पहले भी ये कुछ—कुछ गीले हैं
बात मिलन की करें, सजन उन्मीले हैं

सपना यह संसार--(प्रवचन--13)

राग का अंतिम चरण है वैराग्य—(प्रवचन—तेरहवां)

दिनांक; सोमवार, 23 जुलाई 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र:
जीवन है दिन चार, भजन करि लीजिए।
तन मन धन सब वारि संत पर दीजिए।।
संतहिं से सब होइ, जो चाहै सो करैं
अरे हां, पलटू संग लगे भगवान, संत से वे डरैं।।

ऋद्धि सिद्धि से बैर, संत दुरियावते
इंद्रासन बैकुठ बिष्ठा सम जानते।।
करते अबिरल भक्ति, प्यास हरिनाम की।
अरे हां, पलटू संत न चाहैं मुक्ति तुच्छ केहि काम की।।

आगम कहैं न संत, भड़ेरिया कहत हैं।
संत न औषधि देत, बैद यह करत हैं।।
झार फूंक ताबीज ओझा को काम है।
अरे हां, पलटू संत रहित परपंच राम को नाम है।।

सपना यह संसार--(प्रवचन--12)

होश और बेहोशी के पार है समाधि—(प्रवचन—बारहवां)
दिनांक, रविवार, 22 जुलाई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—भगवान, मुझे हिंदी तो बहुत आती नहीं, और कभी कुछ लिखा भी नहीं है, लेकिन जब से आप आए हैं जिंदगी में, आप साथ कविता भी ले आए हैं। कल आपने कहा कि होश से रहना, चूक मत जाना। तो आप ही बताएं, अब क्या होगा! जब इतनी पिला दी, तो होश में आने को कहते हो!

बैठे हैं राहगुजर पे तेरी, सांस थाम के
मदहोश गिर गए हम तेरे जाम से
लड़खड़ाऊं उठ न सकूंगा, जो उठूं कभी
पहुंचेंगे जाने कैसे हबी तेरे धाम पे
रातो सहर की होश नहीं आए जाए कब
कुर्बान हुए जब हम तेरे नाम पे।
जब से खुला मैखाना तेरे इश्क का हसीं
पीने चले दीवाने सभी, जिगर को थाम के।