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सोमवार, 1 जनवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--187

नरक के द्वार: काम, क्रोध, लोभ—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—16
सूत्र—

            त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।
काम: क्रोधस्तथा लौभस्तस्मादैतन्त्रयं त्यजेत्।। 21।।
एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमद्धोरैस्प्रिभिर्नर:।
आचरत्यक्ष्मन: श्रेयस्‍स्‍ततो यति परां गतिम्।। 22।।
यः शास्त्रविश्वैमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमावाप्‍नोतिप्त न सुखं न परां गतिम्।। 23।।
तस्माच्‍छात्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्‍यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्‍तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। 24।।

और हे अर्जुन, काम, क्रोध तथा लोभ, ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्‍मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले है, इससे इन तीनों को त्याग देना चाहिए। क्योंकि है अर्जुन, इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्‍त हुआ पुरूष अपने कल्याण का आचरण करता है।  इससे वह परम गति को जाता है अर्थात मेरे को प्राप्त होता है।
और जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है।

इसलिए तेरे लिए हम कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्र— विधि से नियत किए हुए कर्म को ही करने के लिए योग्य है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--186

ऊर्ध्‍वगमन और अधोगमन(प्रवचनछठवां)

अध्‍याय—16
सूत्र

            इदमद्य मया लब्‍धमिमं प्राप्‍स्‍ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। 13।।
असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्‍ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहम्हं भोगी सिद्धोsहं बलवान्तुखी।। 14।।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कीऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्‍ये दास्यामि मौदिष्य इत्‍याज्ञानविमीहिता:।। 15।।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता:।
प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेsशुचौ।। 16।।

और उन आसुरी पुरूषों के विचार इस प्रकार के होते है, कि मैने आज यह तो पाया है और हस मनोरथ को प्राप्त होऊंगा तथा मेरे पास यह हतना धन है और फिर भी यह भविष्य में और अधिक होवेगा।
तथा वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा। मैं ईश्वर अर्थात ऐश्वर्यवान हूं और ऐश्वर्य को भोगने वाला हूं और मैं सब सिद्धियों से युक्त एवं बलवान और सुखी हूं।

मैं का धनवान और के कुटुंब वाला हूं; मेरे समान दूसरा कौन है! मैं यज्ञ करूंगा, दान देऊंगा, हर्ष को प्राप्त होऊंगा—इस प्रकार के अज्ञान से आसुरी मनुष्य मोहित हैं। वे अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्त वाले अज्ञानीजन मोहरूप जाल में फंसे हुए एवं विषय—भोगों में अत्यंत आसक्त हुए महान अपवित्र नरक में गिरते हैं।

रविवार, 31 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--185

जीवन की दिशा(प्रवचनसातवां)

अध्‍याय—16
सूत्र:

अत्मसंभाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।। 17।।
अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोध च संश्रता:।
मामत्‍मपरहेहेषु प्रद्धईषन्तोऽभ्यसूक्का:।। 18।।
तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षियाम्यजस्रमशुभानासुरीष्येव योनिषु।। 19।।
आसुरी योनिमापन्‍ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामाप्राप्‍यैव कौन्तेय ततो यान्‍त्‍यधमां गतिम्।। 29।।

 वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष बन और मान के मद से युक्‍त हुए, शास्त्र— विधि से रहित केबल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखंड से यजन करते हैं।
तथा वे अहंकार, बल, धमंड, कामना और क्रोधादि के परायण हुए एंव दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाले हैं। ऐसे उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बारंबार आसुरी योनियों में ही गिरता हूं।

इसलिए हे अर्जुन, वे मूढ पूरूष जन्म— जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त हुए, मेरे को न प्राप्त होकर, उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--184

शोषण या साधना(प्रवचनपांचवां)

अध्‍याय—16
सूत्र—

            काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता:।
मोहाङ्गाहींत्त्वीसद्ग्राहागर्क्तन्‍तेउशुचिव्रता:।। 10।।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुयश्रिता:।
कामोयभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: ।। 11।।
आशापाशशातैर्बद्धा: कामक्रोधयरायणा ।
ईहन्‍ते कामभोगार्थमन्यायेनार्श्रसंचयान्।। 12।।

और वे मनुष्य दंभ, मान और मद से युक्त हुए किसी प्रकार भी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आसरा लेकर तथा मोह से मिथ्‍था सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों से युक्‍त हुए संसार में बर्तते हैं।
तथा वे मरणपर्यत रहने वाली अनंत चिंताओं को आश्रय किए हुए और विषय— भोगों को भोगने के लिए तत्‍पर हुए, इतना मात्र ही आनंद है, ऐसा मानने वाले हैं।

इसलिए आशारूप सैंकड़ों फांसियों से बंधे हुए और काम— क्रोध के परायण हुए विषय—भोगों की पूर्ति के लिए अन्यायपूर्वक धनादिक बहुत— से पदार्थो को संग्रह करने की चेष्टा करते हैं।

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--183

आसुरी व्‍यक्‍ति की रूग्‍णताएं(प्रवचनचौथा)

अध्‍याय—16
सूत्र—

प्रवृत्तिं च निवृत्ति च जना न विदरासरा:।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।। 7।।
असत्यमप्रितष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्थरसंभूतं किमन्यत्काकैक्कुम्।। 8।।
एंता दृष्टिमवष्टथ्य नष्टमानोऽल्पबुद्धय:।
प्रभवन्‍ज्युक्कर्माण: क्षयाय जगतीऽहिता:।। 9।।

और हे अर्जुन, आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य कर्तव्य—कार्य में प्रवृत्त होने को और अकर्तव्य—कार्य से निवृत्त होने को भी नहीं जानते हैं। इसलिए उनमें न तो बाहर—भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है।
तथा वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहते हैं कि जगत आश्रयरहित है और सर्वथा झूठा है एवं बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री—पुरुष के संयोग से उत्पन्‍न हुआ है। इसलिए जगत केवल भोगों को भोगने के लिए ही है। इसके सिवाय और क्या है?

हम प्रकार इस मिथ्या—ज्ञान को अवलंबन करके नष्ट हो गया है स्वभाव जिनका तथा मंद है बुद्धि जिनकी, ऐसे वे सब का अहित करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत का नाश करने के लिए ही उत्पन्‍न होते हैं।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--182

आसुरी संपदा(प्रवचनतीसरा)

अध्‍याय—16
सूत्र:

दम्भो दयोंऽभिमानश्च क्रोध: पारूष्‍यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्म पार्थ संपदमासुशँम्।। 4।।
दैवी संयद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः संपदं दैवीमीभजातोऽसि पाण्डव।। 5।।
द्वौ भूतसगौं लस्कैऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे मृणु।। 6।।

और है पार्थ, पाखंड, घमंड और अभिमान तथा क्रोध और कठोर वाणी एवं अज्ञान, ये सब आसुरी संपदा को प्राप्त हुए पुरुष के लक्षण हैं।
उन दोनों कार की संपदाओं में दैवी संपदा तो मुक्‍ति के लिए और आसुरी संपदा बांधने के  मानी गई है। इसलिए है अर्जुन, तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी संपदा को प्राप्त हुआ है।
और हे अर्जुन, हम लोक में भूतों के स्वभाव दो कार के बताए गए हैं। एक तो देवों के जैसा और दूसरा असुरों के जैसा। उनमें देवों का स्वभाव ही विस्तारपूर्वक कहा गया, इसलिए अब असुरों के स्वभाव को भी विस्तारपूर्वक मेरे से सून।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--181

दैवीय लक्षण(प्रवचनदूसरा)

अध्‍याय—16
सूत्र—181

अहिंसा सत्‍यमक्रोधस्‍त्‍याग: शान्‍तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्‍वलोलुप्‍त्‍वं मार्दवं ह्ररिचापलम्।। 2।।
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीमीभिजातस्य भारत।। 3।।

दैवी संयदायुक्‍त पुरुष के अन्य लक्षण हैं : अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति और किसी की भी निंदादि न करना तथा सब भूत प्राणियों में दया, अलोलुपता, कोमलता तथा लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव; तथा तेज, क्षमा, धैर्य और शौच अर्थात बाहर— भीतर की शुद्धि एवं अद्रोह अर्थात किसी में भी शत्रु— भाव का न होना और अपने में पूज्‍यता के अभिमान का अभाव— ये सब तो हे अर्जुन, दैवी संपदा को प्राप्त हुए पुरूष के लक्षण हैं।

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--7)- प्रवचन--180

दैवी संपदा का अर्जन—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—16
सूत्र—180
(श्रीमद्भगवद्गीता)

श्रीभगवानवाच:
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति:।
दानं दमश्च यज्ञश्‍च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।। 1।।

उसके उपरांत श्रीकृष्‍ण भगवान फिर बोले कि हे अर्जुन, दैवी संपदा जिन पुरूषों को प्राप्त है तथा जिनको आसुरी संपदा प्राप्त है, उनके लक्षण पृथक—पृथक कहता हूं। दैवी संपदा को प्राप्त हुए पुरूष के लक्षण हैं :
अभय, अंतःकरण की अच्छी प्रकार से शुद्धी, ज्ञान— योग में निरंतर दृढ़ स्थिति और दान तथा इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय तथा तय एवं शरीर और इंद्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता।

गीता दर्शन--(भाग--7)- प्रवचन--179

प्‍यास और धैर्य(प्रवचनसातवां)

अध्‍याय—15
सूत्र—179

            यो मामैवमसंमूढो जानति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वोविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।। 19।।
इति गुह्यतमं शास्त्रीमदमुक्‍तं मयानघ।
एतदबद्ध्वा बुद्धिमान्‍स्‍यत्‍कृतकृत्‍यश्‍च भारत।। 20।।

है भारत, हस प्रकार तत्व से जो ज्ञानी पुरुष मेरे को पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार मे निरंतर मुझ परमेश्वर को ही भजता है।
है निष्पाप अर्जुन, ऐसे यह अति रहस्ययुक्‍त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, हमको तत्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।

गीता दर्शन--(भाग--7)- प्रवचन--178

पुरूषोत्‍तम की खोज(प्रवचनछठवां)

अध्‍याय—15
सूत्र—

 द्वाविमौ पुरूषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्‍यते।। 16।।
उत्तम: पुरूषस्‍त्‍वन्य: परमात्मेत्युदाह्वत:।
यो लस्केत्रयमाविश्य बिभर्त्सव्यय ईश्वर:।। 17।।
यस्मात्‍क्षरमर्तोतोऽहमक्षरादीप चोत्तम:।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम:।। 18।।

हे अर्जुन, हम संसार में क्षर अर्थात नाशवान और अक्षर अर्थात अविनाशी, ये दो प्रकार के पुरुष हैं। उनमें संपूर्ण भूत प्राणियों के शरीर तो क्षर अर्थात नाशवान और कूटस्थ जीवात्‍मा अक्षर अर्थात अविनाशी कहा जाता है।
तथा उन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है कि जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण—पोषण करता है, एवं अविनाशी ईश्वर और परमात्‍मा, ऐसे कहा गया है।

क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूं और माया में स्थित अक्षर, अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूं इसलिए लम्बे में और वेद में पुरूषोत्तम नाम मे प्रसिद्ध हूं।

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--7)- प्रवचन--177

एकाग्रता और ह्रदयशुद्धि(प्रवचनपांचवां)

अध्‍याय—15
सूत्र—

      यदादित्यगतं तेजो जगद्यासयतेऽखिलम्।
यच्‍चन्द्रमलि यचाग्नौ तत्तेजो विद्धि मांक्कम्।। 12।।
गामांविश्य च भूतानि धारयाथ्यमोजसा।
पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक:।। 13।।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमांश्रित:।
प्राणायानसमांयुक्त: पचाम्यन्‍नं चतुर्विधम्।। 14।।
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत: स्मृतिज्ञनिमयहेनं च।
वेदैश्च सवैंरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदीवदेव चाहम्।। 15।।

और हे अर्जुन, जो तेज सूर्य में स्थ्ति हुआ संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में स्थ्ति है और जो तेज अग्नि में स्थित है, उसको तू मेरा ही तेज जान।
और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्‍ति से सब भतों को धारण करता हूं और रस—स्वरूप अर्थात अमृतमय सोम होकर संपूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित हुआ वैश्वानर अश्निरूप होकर प्राण और अपान मे स्थ्ति हुआ चार प्रकार के अन्न को पचाता हूं।

और मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामीरूय से स्थित हूं तथा मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन अर्थात संशय—विसर्जन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूं तथा वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं।

गीता दर्शन--(भाग--7)- प्रवचन--176

समर्पण की छलांग(प्रवचनचौथा)

अध्‍याय—15
सूत्र—

            उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुज्‍जानं वा गुणान्यितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचमुष:।। 10।।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यज्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यक्यधेतस:।। 11।।

परंतु शरीर छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को और विषयों को भोगते हुए को अथवा तीनों गुणों से युक्त हुए को भी ज्ञानीजन नहीं जानते है केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले ज्ञानीजन ही तत्व से जानते हैं।
क्योंकि योगीजन भी अपने हृदय में स्थित हुए हस आत्मा को यत्न करते हुए ही तत्व से जानते हैं और जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते हुए भी हम आत्मा को नहीं जानते हैं।

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

गीता दर्शन--(भाग--7)- प्रवचन--175

संकल्‍पसंसार का या मोक्ष का(प्रवचनतीसरा)

अध्‍याय—15
सूत्र—175 

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पाक्क:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। 6।।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। 7।।
शरीरं यदवाम्नोति यच्‍चाप्‍युत्‍क्रामतीश्‍वर:।
गृहीत्‍वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्:।। 8।।
श्रोत्रं चक्षु: स्यर्शनं च रमनं घ्राणमेव च।
आधिष्ठाय मनश्चायं विश्यानुपसेवते।। 9।।

उस स्वयं प्रकाशमय परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर सकता है तथा जिम परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य पीछे संसार में गौं आते है वही मेरा परम धाम है।
और हे अर्जुन, हम देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और की इन त्रिगुणमयी माया में स्थित हुई मन सहित पांचों इंद्रियों को आकर्षण करता है।

जैसे कि वायु गंध के स्थान से गंध को ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिकों का स्वामी जीवात्मा भी जिस पहले शरीर को त्यागता है, उससे इन मन सहित इंद्रियों की ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें जाता है।
और उस शरीर में स्थित हुआ यह जीवात्‍मा श्रोत्र, चक्षु और त्‍वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों की सेवन करता है।