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शुक्रवार, 9 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-20



बीसवां प्रवचन—अहोभाव, आनंद, उत्सव है भक्ति

दिनांक २२ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार :
1—परम विरहासक्ति पर कुछ कहें?
2—ध्यान की गहराई की अवस्था स्थायी कैसे हो?
3—क्या मुक्ति के लिए अन्ततः आराध्य की छवि का विसर्जन भी अनिवार्य है?
4—आपके समीप आकर आपकी ओर देखा ही न गया। ऐसे क्यों हो जाता है?
5—आपको रोज-रोज सुनते हैं, देखते हैं; फिर भी जी क्यों नहीं भरता? और कहीं बाहर भी चले जाते हैं तो भी जी यहीं क्यों लगा रहता है?
6—नारद के बहुआयामी व्यक्त्तित्व पर कुछ प्रकाश डालें।
7—भक्त ध्रुव की पुराण-कथा पर कुछ प्रकाश डालें।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-19



(विशेष: दिनांक १९ एवं २० मार्च, )

(१९७६ को भगवान श्री प्रवचन के लिए उपस्थित नहीं हए...!)
उन्नीसवां प्रवचनप्रज्ञा की थिरता है मुक्ति
दिनांक २१ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र
वादो नावलम्ब्य ।।७४।।
बाहुल्यावकाशादनियतत्ववच्च ।।७५।।
भक्तिशास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधक कर्माण्यपि करणीयानि।।७६।।
सुखदुःस्वेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाण क्षगार्द्धमपि व्यर्थं न नेयम्।।७७।।
अहिंसासत्यशौचदयास्तिक्यादिचारित्र्याणि परिपालनियानि।।७८।।
सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितैर्भगवानेव भजनीयः।।७९।।
स कर्ीत्यमानः शीघ्रमेवाविर्भवति अनुभावयति च भक्तान्।।८०।।
त्रिसत्यस्य भक्त्तिरेव गरीयसी भक्त्तिरेव गरीयसी।।८१।।
गुणमाहात्म्यासक्त्ति रूपासक्त्ति पूजासति स्मरणासक्त्ति दास्यासक्त्ति साख्यासक्त्ति कांतासक्ति वात्सल्यासक्त्यात्मनि वेदनासक्त्ति तन्मयतासक्त्ति परमविरहासक्त्तिरूपा
एकधाप्येकादशधा भवति।।८२।।
इत्येवं वदन्ति जनजल्पपनिर्भया एकमताः
कुमारव्यासशुकशांडिल्यगर्गविष्णुकौण्डिन्य
शेषोद्धवारुणिबजिहनुमद्विभीषणादयो भक्त्ययाचार्याः।।८३।।
य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रद्धते स प्रेष्ठं लभते
स प्रष्ठं लभते इति।।८४।।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-18

अठारहवां प्रवचनएकांत के मंदिर में है भक्ति

दिनांक १८ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार
1—मैं बिलकुल अकेली हूं, बुढ़ापा भी आ गया है, पैर से अपाहिज हूं, नाच भी नहीं सकती! क्या मेरे जिए आशा की काई किरण संभव है?
2—आपको सुनकर तथा ध्यान करने से मेरी अज्ञात के प्रति आस्था जगने लगी है। क्या यह नए परिवेश का सम्मोहन तो नहीं?
3—वेद कुरान को त्याग कियो
परित्याग कियो री पुरानन को
कंत के नैन में ध्यान धरयो
ब्रह्मानंद सुनो सखि कानन को
गुरुअन की शरणन् में कबहूं न गई
मंदिर न चढ़ी नाही जोग लियो
पर जोग को भान भयो री सखी
जब प्यारे पिया संग भोग कियो।
क्या यह भी कोई मार्ग है?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-17

सत्रहवां प्रवचनकान्ता जैसी प्रतिबद्धता है भक्ति

दिनांक १७ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
 सूत्र :
त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकांता भजनात्मकं
वा प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्
भक्त एकान्तिनो मुख्याः
कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभिः परस्परं लपमानाः
पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मीकुर्वन्ति
कर्माणि सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि
तन्मयाः
मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः
यतस्तदीयाः

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-16



सोलहवां प्रवचन--उदासी नहीं--उत्सव है भक्ति

दिनांक १६ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्नसार
1—राजा हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद की पुराणकथा तथा होली उत्सव पर प्रकाश डालें।
2—यारी करके देखा यार मिलता नहीं, बेवफा मिलता है लेकिन बावफा मिलता नहीं।
3—भगवान इस समय हमारे और आपके बीच क्या करवाता है?
4—जो अनुभव आपके सान्निध्य और प्रवचन में होता है, वह कैसे अधिक समय तक रहे?
5—आपके जानने से पहले राधास्वामी संत से प्रभावित था,...मांस और शराब छोड़ने की शर्त थी। फिर अपनी किताब...बढ़िया अनूभव करता हूं। अब संन्यास...क्या केवल माला से ही काम नहीं चल सकता?

गुरुवार, 8 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-15



पंद्रहवा प्रवचन—हृदय-सरोवर का कमल है भक्ति

दिनांक १५ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :
अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ
प्रमाणान्तरस्यानपेक्षत्वात् स्वयंप्रमाणत्वात्
शान्तिरूपात्परमानन्दरूपाच्च
लोकहानौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात्
न तदसिद्धौ लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव
स्त्रीधननास्तिकवैरिचरित्रं न श्रवणीयम्
अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम्
तदर्पिताखिलाचारः सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम्

भक्ति तो एक है।
बुद्ध ने कहा है, जैसे सागर को कहीं से भी चखो, खारा है: ऐसा ही सत्य भी है--एक स्वाद है, एक रस है। फिर भी नारद ने भक्ति के तीन विभाजन किए हैं। पराभक्ति के वे विभाजन नहीं हैं, गौणी भक्ति के विभाजन हैं।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-14



चौदहवां प्रवचन—असहाय हृदय की आह है प्रार्थना-भक्ति

दिनांक १४ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्न-सार
1—भगवान! सामर्थ्य तो कुछ है नहीं और प्यास उठी अनंत की। मिलन होगा?
2—क्या प्रेम और मृत्यु के बीच कोई आंतरिक संबंध है?
3—बहुतेरे आपके संन्यासी ध्यान नहीं करते; कहते हैं, समझ काफी है। क्या उनकी यह समझ काफी है?
4—भगवान! मैं आपसे संन्यस्त नहीं हुआ; फिर भी क्या आप मृत्यु के क्षण में मुझे धक्का देने आएंगे?
5—क्यों आप प्रतिदिन प्रवचन के लिए आने पर और फिर विदा लेते हुए भी हाथ जोड़कर हमें प्रणाम करते हैं?
6कब किस घड़ी में संन्यासी शिष्य के भीतर से अपेक्षा का भाव गिर जाता है?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-13



तेरहवां प्रवचन—शून्य का संगीत है प्रेमा-भक्ति

दिनांक १३ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र :
अनिर्वचनीशं प्रेमस्वरूपम्
मूकास्वादमवत्
प्रकाशते क्वापि पात्रे
गुणरहितं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम्
तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति
भाषयति तदेव चिन्तयति
गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा
उत्तरस्मांदुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति

अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम!
प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है--जो कहा न जा सके--जीया जा सके, भोगा जा सके, अनुभव किया जा सके--पर कहा न जा सके।
लहर सागर में है सागर भी लहर में है। लेकिन लहर पूरी की पूरी सागर में है; पूरा का पूरा सागर लहर में नहीं है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-12



बारहवां प्रवचनअभी और यहीं है भक्ति

दिनांक १२ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्न-सार :
1—भगवान, भक्ति और भोग में क्या कुछ आंतरिक तारतम्य है?
2—एक मित्र ने...सुझाव दिया है! कि नारद के सूत्र में सुधार होना चाहिए!
3—क्या कारण है कि कामवासना के उठने पर होश में भी उसकी प्रगाढ़ता बनी रहती है?
4—जिसे आप स्वप्न कहते हैं, वह हमें सत्य मालूम देता है और आपका सत्य हमारे लिए स्वप्नवत है। किसकी गंगा उलटी बहती है?
5—सत्रह-अठारह वर्ष की उम्र में मेरे पिताजी धूनीवाले बाबा के सान्निध्य में कुछ अनुभव पाकर विक्षिप्त हो गए, समाज में स्वीकृत न हो सके...! अब जीवन के अंतिम चरण में उनके लिए नये जन्म की क्या कोई संभावना है?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-11



ग्यारहवां प्रवचन—शून्य की झील में प्रेम का कमल है भक्ति

दिनांक ११ मार्च, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र :
दुःसंगः सर्वथैव त्याज्य
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात्
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति
कस्तरति कस्तरति मायाम? यः संगास्त्यजति यो
महानुभावं सेवते निर्ममो भवति
यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति,
निस्त्रैगुण्यौ भवति, योगक्षेमं त्यजति
यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो भवति
वेदानपि संन्यस्यति केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते
स तरति स तरति स लोकांस्तारयति

जो नहीं है, उसे निर्बल मत जानना। जो नहीं है, उसमें भी बड़ा बल है। अन्यथा, मरु-मरीचिकाएं मनुष्य को आकर्षित न करतीं और स्वप्नों पर भरोसा न आता, क्षितिज आमंत्रण न देता, स्वप्न सत्य मालूम न होते।

बुधवार, 7 मार्च 2018

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-10



दसवां प्रवचन—परम मुक्ति है भक्ति

दिनांक २० जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्नसार :
1—मुझे कभी लगता है कि मैंने आपसे बहुत-बहुत पाया है और कभी यह भी कि मैं आपसे बहुत चूक रहा हूं। ऐसा क्यों?
2—एक भक्त भगवान होना पसंद करे और दूसरा सिर्फ भक्त रहना चाहे, तो दोनों में श्रेष्ठ कौन है?
3—"भक्त्या अनुवृत्या' ऐसा कहा है, तो भक्ति साकार ही होना चाहिए। सूर्य सूर्यलोक में साकार ही है, वैसे ही भगवान भी साकार क्यों नहीं?
4—आशीर्वाद क्या है? गुरु शिष्य के सिर पर क्या प्रेषित करता है? क्या आशिर्वाद लेने की क्षमता होती है?
5—कल के प्रवचन में अचानक कुछ घटा!...प्रणाम स्वीकार करें!
6—क्या भक्ति-सूत्र के रचयिता के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-09

नौवां प्रवचन—हृदय का आंदोलन है भक्ति

दिनांक १९ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
सूत्र :
तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्यः
तत्तु विषयत्यागात् संगत्यागाच्च
अव्यावृतभजनात्
लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात्
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा
महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च
लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्
तदेव साध्यतां तदेव साध्याताम्

पहला सूत्र: "तस्या साधनानि गायन्त्याचार्याः'
जितने भी हिंदी में अनुवाद हैं, वे सभी कहते हैं: "आचार्यगण उस भक्ति के साधन बतलाते हैं। मूल सूत्र कहता है: आचार्यगण उस भक्ति के साधन गाते हैं। और भेद थोड़ा नहीं है। बतलाना बतलाना ही है--गाना बात और! गाने में कुछ खूबी छिपी है।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-08



आठवां प्रवचन—अनंत के आंगन में नृत्य है भक्ति

दिनांक १८ जनवरी, १९७६; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार

1—प्रेम भक्ति का जनक है या भक्ति प्रेम की जननी ? प्रेम कली है और भक्ति फूल? अथवा प्रेम आदि है और भक्ति अंत? या दोनों भिन्न हैं?
2—इस कथन में क्या सच्चाई है कि भक्ति है द्वैत और ज्ञान है अद्वैत?
3—संन्यास के लिए गैरिक वस्त्र क्यों जरूरी हैं?
4—सुरक्षा के लिए मुझे जो नाटक करना पड़ता है, उसे करूं या छोड़ दूं?
5—अगर ज्ञान भक्ति के लिए बाधा है, फिर महातार्किक और महापंडित चैतन्य एकदम से भक्त कैसे हो गए?
6—सैकड़ों बार भ्रम के टूटने पर भी भरोसा नहीं आता। क्या करूं?
7—भक्त कण-कण में भगवान को देखता है। लेकिन जिसे सिर्फ आपका पता है, कण में बसनेवाले भगवान का नहीं, उसके लिए क्या साधना होगी?

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-07



सातवां प्रवचन—योग और भोग का संगीत है भक्ति

दिनांक 17 जनवरी, 1976; रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :
सा तु कर्मज्ञानयोगेभ्योऽप्यधिकतरा।
फलरूपत्वात्।
ईश्वरस्या६यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च।
तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके।
अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये।
स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः।
राजगृह भोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्।
न तेन राजपरितोषः क्षुधाशांतिर्वा।
तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः।

भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-06

छठवां प्रवचन—प्रसादस्वरूपा है भक्ति

दिनांक १६ जनवरी, १९७६; रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार :
1—विराट का अनुभव किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त होता ही है। क्या ऐसा नहीं है?
2—आये थे दर पर तेरे सिर झुकाने के लिए, उठता नहीं है सिर अब वापस जाने के लिए...!
3—प्रवचन सुनते समय प्रेम-विभोर हो आंसू बहने लगते हैं और अचेतन में अहंकार को रस आता है कि अहोभाव के आंसू बहा रहा हूं। क्या इससे अद्वैत का रूखा-सूखा मार्ग अच्छा नहीं?
4—क्या विधिविहित पूजा-प्रार्थना व्यर्थ है?
5—एक हम हैं कि...प्यासे ही जाते हैं!
6—इश्क पर जोर नहीं ये तो आतिश "गालिब' कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे। फिर देवर्षि नारद ने प्रेम पर यह शास्त्र क्यों लिखा?