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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-10


एकांत की गरिमा—दसवां प्रवचन

प्रश्न-सार

1. संत परमात्मा की खोज में समाज और परिवार का छोड़ने जंगल क्यों चले जाते हैं?
2. आपके आश्रम में यदि कोई एक ही साधना पद्धति हो, तो क्या साधकों को ज्यादा सुविधा नहीं होगी?
3. एक मस्ती छा रही है, लेकिन भय लगता है कि यह खो तो नहीं जाएगी?
4. सती-प्रथा का आज क्या मूल्य है?
5. जीवन का अर्थ क्या है?

पहला प्रश्नः संत परमात्मा की खोज में समाज और परिवार को छोड़ कर जंगल में क्यों चले जाते हैं? कृपया समझाएं।

और जाएं भी तो कहां जाएं! और कोई स्थान भी नहीं है।
समाज और परिवार ने ही तुम्हें विकृत किया है; उससे ही मुक्त होना होगा। चाहे कोई वस्तुतः समाज को छोड़ कर चला जाए तो; या चाहे कोई मानसिक रूप से समाज को छोड़े तो, लेकिन समाज से मुक्त तो होना ही पड़ेगा। इस में भेद हो सकता है।

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-09


मन लागो यार फकीरी में—नौवां प्रवचन

सूत्र :

मन लागो मेरा यार फकीरी में।
जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।
भला बुरा सबको सुन लीजै, कर गुजरान गरीबी में।।
प्रेम नगर में रहनि हमारी, भलि बनी आइ सबूरी में।
हाथ में कूरी बगल में सोंटा, चारो दिसि जागीरी में।।
आखिरी यह तन खाक मिलेगा, कहा फिरत मगरूरी में।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहब मिले सबूरी में।।

समझ देख मन मीत पियरवा, आसिक होकर सोना क्या करे।
पाया हो तो दे ले प्यारे, पाय-पाय फिर खोना क्या रे।।
जब अंखियन में नींद घनेरी, तकिया और बिछौना क्या रे।
कहै कबीर प्रेम का मारग, सिर देना तो रोना क्या रे।।

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-08


प्रेम का अंतिम निखार-(परमात्मा)—आठवां प्रवचन


प्रश्न-सार
1. आप प्रेम को सर्वोपरि महिमा क्यों देते हैं?
2. अदृश्य और अश्राव्य परमात्मा कैसे दृश्य और श्राव्य बनता है?
3. कबीर--आप--बेबूझ हैं। बेबूझ में कैसे डूबें?
4. चैथा प्रश्नः आपका मूल संदेश क्या है?
5. मुझे आपका प्रेम है या नहीं इससे मुझे जरा भी आंच नहीं है।
6. आखिरी प्रश्नः प्रार्थना यानी क्या?


पहला प्रश्नः कमोबेश सभी संतों ने प्रेम की महिमा बताई है। लेकिन आपने प्रेम को गौरीशंकर पर आसीन कर दिया! क्या सच ही प्रेम इस महापद का अधिकारी है? और क्या अस्तित्व में प्रेम इतना अधिक स्थान घेरता है, जितना आप उसे देते हैं?

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-07


प्रभु-प्रीति कठिन-सातवां प्रवचन

 सूत्र :

साई से लगन कठिन है भाई।
जैसे पपीहा प्यासा बूंद का, पिया पिया रट लाई।।
प्यासे प्राण तरफै दिनराती, और नीर ना भाई।।
जैसे मिरगा सब्द-सनेही, सब्द सुनन को जाई।।
सब्द सुने और सत-प्राणदान दे, तनिको नाहिं डराई।
जैसे सती चढ़ी सत-ऊपर, पिया की राह मन भाई।।
पावक देखि डरै वह नाहीं, हंसते बैठे सदा माई।
छोड़ो तन अपने का आसा, निर्भय हवे गुन गाई।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, नाहिं तो जन्म नसाई।।

लोका जानि न भूलो भाई!
खालिक खलक खलक में खालिक, सब घर रह्यो समाई।

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-06


सदगुरु की महत्ता-छठवां प्रवचन


 प्रश्न-सार

1. कबीर के इन दो विरोधाभासी वचनों पर आपका क्या कहना हैः
 राम ही मुक्ति के दाता हैं, सदगुरु तो केवल प्रभु-स्मरण जगाते हैं।
 हरि सुमिरै सो वार है, गुरु सुमिरै सो पार।
2. मैं अपने दुखभरे अतीत को क्यों नहीं भूल पाता हूं?
3. क्या ममता और मेरेपन के भाव के बिना प्रेम संभव है?
4. संतों ने जीवन को दुखा की भांति क्यों निरूपित किया है? क्या यह दुखवाद उचित है?
5. आप आश्रम दूसरी जगह ले जा रहे हैं, तो पूना छोड़ आपके साथ चलूं या यहीं रुक कर काम करूं?

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-05


क्या तेरा क्या मेरा-पांचवां प्रवचन



सूत्र :

रे यामै क्या मेरा क्या तेरा।
लाज न मरहिं कहत घर मेरा।।
चारि पहर निसि भोरा, जैसे तरवर पंखि बसेरा।
जैसे बनिए हाट पसारा, सब जग कासो सिरजनहारा।।
ये ले जारे वे ले गाड़े, इन दुखिइनि दोेऊ घर छाड़े।
कहत कबीर सुनहु रे लोई, हम तुम्ह विनसि रहेगा सोई।।

मन तू पार उतर कहं जैहौं।
आगे पंथी पंथ न कोई, कूच-मुकाम न पैहों।।
नहिं तहं नीर नाव नहिं खेवट, ना गुन खैंचनहारा।
धरती-गगन-कल्प कछु नाहीं, ना कुछ वार न पारा।।
नहिं तन नहिं मन, नहीं अपनपौं, सुन्न में सुद्ध न पैहौ।
बलीवान होय पैठो घट में, वाहीं ठौंरें होइहौ।।
बार हि बार विचार देख मन, अन्त कहूं मत जैहो।
कहै कबीर सब छाड़ि कल्पना, ज्यों के त्यों ठहरैहौ।।

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-04


आनंद पर आस्था-चौथा प्रवचन


प्रश्न-सार

1. सच में ही आनंद बरस रहा है, या मैं कल्पना और अतिशयोक्ति कर रहा हूं?
2. मैं अकारण ही उदास क्यों रहता हूं?
3. यह पूछूं कि वह पूछूं? आज पूछूं कि कल पूछूं?
4. प्रभु-खोज कहां से शुरू करूं?

पहला प्रश्नः मुझ पर आनंद की वर्षा हो रही है, उसके लिए आपको धन्यवाद देने की इच्छा होती है। लेकिन पता नहीं है कि सच में आनंद बरसता है या मैं कल्पना कर रहा हूं या अतिशयोक्ति कर रहा हूं!

मनुष्य का मन बड़ा उपद्रवी है। दुख हो तो भरोसा करता है और आनंद हो तो संदेह करता है। दुख पर कभी संदेह नहीं आता कि कहीं यह कल्पना तो नहीं है! दुख को तो तुम एकदम मान लेते हो--बड़ी निष्ठा, बड़ी श्रद्धा से। मैंने आदमी ही नहीं देखा, जो दुख पर संदेह करता आता हो कि मैं बहुत दुखी हूं, मुझे संदेह होता है कि सच में मैं दुखी हूं कि मैं कल्पना कर रहा हूं! कोई ऐसा कहता नहीं कि कहीं मैं दुख के संबंध में अतिशयोक्ति तो नहीं कर रहा!

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-03


कहै कबीर मैं पूरा पाया

तीसरा प्रवचन
साधो, सब्द साधना कीजै

सूत्र

साधो, सब्द साधना कीजै।
जेही सब्द ते प्रकट भए सब, सोइ सब्द गहि लीजै।।
सब्द गुरु सब्द सुन सिख भए, सब्द सो बिरला बूझै।
सोई सिष्य सोई गुुरु महातम, जेही अन्तर गति सूझै।।
सब्दै वेद पुरान कहत हैं, सब्दै सब ठहरावै।
सब्दै सुर मुनि संत कहत हैं, सब्द भेद नहिं पावै।।
सब्दै सुन सुन भेष धरत हैं, सब्दै कहै अनुरागी।
खट-दरसन सब सब्द कहत हैं, सब्द कहै वैरागी।।
सब्दै काया जग उतपानी, सब्दै केरि पसारा।
कहै कबीर जहं सब्द होत हैं, भवन भेद है न्यारा।।
कबीर सबद सरीर में, बिन गुण बाजै तंत।
बाहर भीतर भरि रह्या, ताथै छूटि भंरति।।
सब्द सब्द बहु अंतरा सार सब्द चित देय।
जा सब्दै साहब मिलै, सोई सब्द गहि लेय।।
सब्द बराबर धन नहीं, जो कोई जानै बोल
हीरा तो दामों मिलै, सब्दहिं मोल न तोल।।
सीतल सब्द उचारिए। अहम आनिए नाहिं।
तेरा प्रीतम तुज्झमें, सत्रु भी तुझ माहिं।।

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-02

कहै कबीर मैं पूरा पाया

दूसरा प्रवचन
शून्य में छलांग

प्रश्न-सार

1. मैं शून्य होता जा रहा हूं; अब क्या करूं?
2. कबीर का धर्म-गुरु की तरह व्यापक प्रभाव क्यों नहीं पड़ा?
3. दुख से मुक्ति कैसे मिले?
4. गुरु-कृपा कब मिलेगी मुझे?

पहला प्रश्नः मैं शून्य होता जा रहा हूं; अब क्या करूं?

भई, अब किए कुछ भी न हो सकेगा! थोड़ी देरी कर दी। थोड़े समय पहले कहते, तो कुछ किया जा सकता था। शून्य होने लगे--फिर कुछ किया नहीं जा सकता। करने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि शून्य तो पूर्ण का द्वार है।
तुम शून्य होओगे, तो ही परमात्मा तुम में प्रविष्ट हो सकेगा। तुम अपने से भरे हो, यही तो अड़चन है। पर खाली होने में डर लगता है। तुम्हारा प्रश्न सार्थक है, संगत है।
जब भी शून्यता आएगी, तो प्राण कंपते हैं; भय घेर लेता है। क्योंकि शून्यता ऐसी ही लगती है, जैसे मृत्यु; मृत्यु से भी ज्यादा। ज्ञानियों ने उसे महामृत्यु कहा है। क्योंकि मृत्यु में तो देह ही मरती है, शून्यता में तो तुम ही मर जाते हो।

कहै कबीर मैं पूरा पाया-प्रवचन-01

कहै कबीर मैं पूरा पाया


सावधान--पांडित्य से-पहला प्रवचन
दिनांक 21-09-1977 से 30-09-1077 तक
ओशो आश्रम पूना।

सूत्र

पंडित वाद बदंते झूठा।
राम कह्या दुनिया गति पावे, खांड कह्या मुख मीठा।।
पावक कह्या पांव ते दाझै, जल कहि तृषा बुझाई।
भोजन कह्या भूख जे भाजै, तो सब कोई तिरि जाई।।
नर के संग सुवा हरि बोलै, हरि परताप न जानै।
जो कबाहुं उड़ि जाय जंगल में, बहुरि न सुरतैं आनै।।
बिनु देखे बिनु अरस परस बिनु, नाम लिए का होई।
धन के कहे धनिक जो हो तो, निरधन रहत न कोई।।
सांची प्रीति विषतु माया सूं, हरि भगतन सुं हांसी।
कहै कबीर प्रेम नहिं उपज्यौ, बांध्यो जमपुर जासी।।

चलन चलन सब को कहत है, ना जानै बैकुंठ कहां है।
जोजन परमिति परमनु जानै। बातनि ही बैकुंठ वखानै।।
जब लगि है बैकुंठ ही आसा। तब लगि नहिं हरि चरण निवासा।।
कहै सुनै कैसे पतिअइए। जब लगि तहां आप नहिं जइए।।
कहै कबीर यहु कहिए काहि। साध संगत बैकुंठहि आहि।।