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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-122



एस धम्‍मो सनंतनो—प्रवचन—122

      प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

यह मोह क्या है? उससे इतना दुख पैदा होता है, फिर भी वह छूटता क्यों नहीं है?

नुष्‍य शून्य होने की बजाय दुख से भरा होना ज्यादा पसंद करता है।
भरा होना ज्यादा पसंद करता है। खाली होने से भयभीत है। चाहे फिर दुख से ही क्यों न भरा हो। सुख न मिले, तो कोई बात नहीं है। दुख ही सही। लेकिन कुछ पकड़ने को चाहिए। कोई सहारा चाहिए।
दुख भी न हो, तो तुम शून्य में खोने लगोगे। सुख का किनारा तो दूर मालूम पड़ता है, दुख का किनारा पास। वहीं तुम खड़े हो। जो पास है, उसी को पकड़ लेते हो कि कहीं खो न जाओ। कहीं इस अपार में लीन न हो जाओ!
कहते हैं न. डूबते को तिनके का सहारा। दुख तुम्हारा तिनका है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-121



जागो और जीओ—प्रवचन—121

सूत्र:


आसा यस्‍य न विज्‍जन्‍ति अस्‍मिं लोके परम्‍हि च।
निरासयं विसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।324।।

अस्‍सालया न विज्‍जन्‍ति अज्‍जाय अकथंकथी।
अमतोगधं अनुप्‍पतं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।325।।

योध पुज्‍जज्‍च पापज्‍च उभो संगं उपच्‍चगा।
असोकं विरजं सुद्धं तमहं ब्रूमि ब्रह्मणं ।।326।।

चन्‍दंव विमलं सुद्धं विप्‍पसन्‍नमनाविलं।
नन्‍दीभवपरिक्‍खीणं तमहं ब्रूमि ब्राह्माणं ।।327।।

हित्‍वा मानुसकं योगं दिब्‍बं योगं उपच्‍चगा ।
सब्‍बयोगविसंयुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।328।।

पुब्‍बेनिवासं यो वेदि सग्‍गापायज्‍च पस्‍सति ।
अथो जातिखयं पत्‍तो अभिज्‍जवासितो मुनि
सब्‍बवोसितवोसानंतमहं ब्रमि ब्राह्माणं ।।329।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-120



अप्प दीपो भव!—प्रवचन—120

प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्‍न:

मैं तुम्हीं से पूछती हूं? मुझे तुमसे प्यार क्यों है?
कभी तुम जुदा न होओगे, मुझे यह ऐतबार क्यों है?

पूछा है मा योग प्रज्ञा ने।
प्रेम के लिए कोई भी कारण नहीं होता। और जिस प्रेम का कारण बताया जा सके, वह प्रेम नहीं है। प्रेम के साथ क्यों का कोई भी संबंध नहीं है। प्रेम कोई व्यवसाय नहीं है। प्रेम के भीतर हेतु होता ही नहीं। प्रेम अकारण भाव—दशा है। न कोई शर्त है, न कोई सीमा है।
क्यों का पता चल जाए, तो प्रेम का रहस्य ही समाप्त हो गया। प्रेम का कभी भी शास्त्र नहीं बन पाता। इसीलिए नहीं बन पाता। प्रेम के गीत हो सकते हैं। प्रेम का कोई शास्त्र नहीं, कोई सिद्धांत नहीं।
प्रेम मस्तिष्क की बात नहीं है। मस्तिष्क की होती, तो क्यों का उत्तर मिल जाता। प्रेम हृदय की बात है। वहा क्यों का कभी प्रवेश ही नहीं होता।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-119



ब्राह्मणत्व के शिखर—बुद्ध—प्रवचन—119

सूत्र:


न ब्राह्मणस्‍सेतदकिज्‍चि सेय्यो यदा निसेधो मनसो पियेहि।
यतो यतो हिंसमानो निवत्‍तति ततो ततो सम्‍मति एव दुक्‍खं ।।318।।

न जटाहि न गोत्‍तेहि न जच्‍चा होति ब्राह्मणो।
यम्‍हि सच्‍चज्‍च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो ।।319।।

किं ते जटाहि दुम्मेध! किं ते अजिनसाटिया।
अब्‍भन्‍तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्‍जसि ।।320।।

सब्‍बसज्‍जोजनं छेत्‍वा यो वे न परितस्‍सति।
संगातिगं विसज्‍जुत्‍तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।321।।

छेत्‍वा नन्‍दिं वरत्‍तज्‍च सन्‍दामं सहनुक्‍कमं।
उक्‍खित्‍तपलिधं बुद्धं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।322।।

अक्कोसं बधबन्धज्व अदुट्ठो यो तितिक्सति ।
खन्तिबलं बलानीकं तमहं ब्रमि ब्राह्मण ।।323।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-118



समग्र संस्कृति का सृजन—प्रवचन—118

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

पूर्व के और खासकर भारत के संदर्भ में एक प्रश्न बहुत समय से मेरा पीछा कर रहा है। वह यह कि जिन लोगों ने कभी दर्शन और चिंतन के, धर्म और ध्यान के गौरीशंकर को लांघा था, वे ही कालांतर में इतने ध्वस्त, और पतित, और विपन्न कैसे हो गए? भगवान, इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

स्वाभाविक ही था। अस्वाभाविक कभी होता भी नहीं। जो होता है, स्वाभाविक है। यह अनिवार्य था। यह होकर ही रहता। क्योंकि जब भी कोई जाति, कोई समाज एक अति पर चला जाता है, तो अति से लौटना पड़ेगा दूसरी अति पर। जीवन संतुलन में है, अतियों में नहीं। जीवन मध्य में है और आदमी का मन डोलता है पेंडुलम की भांति। एक अति से दूसरी अति पर चला जाता है। भोगी योगी हो जाते हैं; योगी भोगी हो जाते हैं। और दोनों जीवन से चूक जाते हैं।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-117



बुद्धत्व का आलोक—प्रवचन—117

सूत्र:



छिंद सोतं परक्‍कम्‍म कामें पनुद ब्राह्मण।
संखारानं खयं जत्‍वा अकतज्‍जूसि ब्राह्मण ।।313।।

यदा द्वयंसु धम्मेसु पारगू होति ब्राह्मणो।
अथस्‍स सब्बे संयोगा अत्‍थं गच्‍छंति जानतो ।।314।।

यस्‍स पारं अपारं वा पारापारं न विज्‍जति।
वीतद्दरं विसज्‍जुत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं ।।315।।

झायिं विरजमासीनं कतकिच्‍चं अनासवं।
उत्‍तमत्‍थं अनुप्‍पत्तं तमहं ब्रूमि ब्राह्मण ।।316।।

दिवा तपति आदिच्‍चो रतिं आभाति चन्‍दिमा।
सन्‍नद्धो खत्‍तियो तपति झायी तपति ब्राह्मणो।
अथ सब्‍बमहोरत्‍तिं बुद्धो तपति तेजसा ।।317।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-116



राजनीति और धर्म—प्रवचन—116

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न:

आपने कबीर और मीरा की एक ही सभा में उपस्थित होने की कहानी कही। लेकिन यह ऐतिहासिक रूप से संभव नहीं है। क्योंकि दोनों समसामयिक नहीं थे।

 तिहास का मूल्य दो कौड़ी है। इतिहास से मुझे प्रयोजन भी नहीं है। कहानी अपने आप में मूल्यवान है, इतिहास में घटी हो या न घटी हो। घटने से मूल्य बढ़ेगा नहीं।
कहानी का मूल्य कहानी के भाव में है। और ऐतिहासिक रूप से भी घट सकती है, कोई बहुत कठिन बात नहीं है। अगर कबीर एक सौ बारह साल जिंदा रहे हों—जो कि संभव है—तो कबीर और मीरा का मिलन हो सकता है।
लोग एक सौ पचास साल तक भी जीते, हैं। रूस में हजारों लोग हैं, जो एक सौ पचास साल के करीब पहुंच गए हैं।

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-115



विराट की अभीप्सा—प्रवचन—115

सूत्र:



सुज्‍जागारं पविट्ठस्‍स संतचित्‍तस्‍स भिक्‍खुनो।
अमानुसी रति होति सम्‍माधम्‍मं विपस्‍सतो ।।307।।

यतो यतो सम्मसति खन्‍धानं उदयव्ययं ।
लभती पीतिपामोज्जं अमतं नं विजानतं ।।308।।

पटिसन्‍थारवुत्‍तस्‍स आचारकुसलो सिया।
ततो पामोज्‍जबहुलो दुक्‍खस्‍सन्‍तं करिस्‍सति ।।309।।

विस्‍सिका विय पुप्‍फनि मद्दवानि पमुज्‍चति।
एवं रागज्‍च दोसज्‍च विप्‍पमुज्‍चेथ भिक्‍खवो ।।310।।

अत्‍तना चोदयत्‍तानंपटिवासे अत्‍तमत्‍तना।
सो अत्‍तगुत्‍तो सतिमा सुखं भिक्‍खु विहाहिसि ।।311।।

अत्‍त हि उत्‍तनो नाथो अत्‍ता हिह अत्‍तनो गति।
तस्‍मा सज्‍जमयत्‍तानं अस्‍सं भद्रंव वाणिजो ।।312।।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-114



जीन की कला—प्रवचन—114

प्रश्‍न सार:


पहला प्रश्‍न

आत्मा और परमात्मा को अस्वीकार करने वाले गौतम बुद्ध धर्म-गंगा को पृथ्वी पर उतार लाने वाले विरले भगीरथों में गिने गए। और आपने अपने धम्मपद-प्रवचन को नाम दिया-एस धम्मो सनंतनो। धम्मपद-प्रवचन के इस समापन-पर्व में हमें संक्षेप में एक बार फिर इस धर्म को समझाने की अनुकंपा करें।

त्‍मा और परमात्मा को मानना-वस्तुत: किसी भी चीज को मानना-कमजोरी और अज्ञान का लक्षण है। मानना ही अज्ञान का लक्षण है। जानने वाला मानता नहीं। जानता है, मानने की कोई जरूरत नहीं। मानने वाला जानता नहीं। जानता नहीं, इसीलिए मानता है।
मानने और जानने के फर्क को खूब गहरे से समझ लेना। मानने से जानने की भ्रांति पैदा हो जाती है। वह सस्ता उपाय है। वह झूठी दवा है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-113



संन्यास की मंगल—वेला—प्रवचन—113

सूत्र:


सब्‍बसो नाम—रूपस्‍मिं यस्स नत्‍थि ममयितं।
असता च न सोचति स वे भिक्‍खूति वुच्‍चति ।।303।।

सिज्‍च भिक्‍खु! इमं नावं सित्‍ता ते लहुमेस्‍सति।
छेत्‍वा रागज्‍च दोसज्‍च निब्‍बाणमेहिसि ।।304।।

पज्‍च छिन्‍दे पज्‍च जहे पज्‍च चुत्‍तरि भावये।
पज्‍च संगातिगो भिक्‍खु ओधतिण्‍णोति वुच्‍चति ।।305।।

नत्‍थि झानं अपज्‍जस्‍स पज्‍जानत्‍थि अझायतो।
यम्‍हि झानज्‍च पज्‍जा च स वे निब्‍बाणसन्‍तिके ।।306।।

एस धम्मो सनंतनो-(भाग-12)-ओशो



एस धम्‍मो सनंतनो
(भाग—12)
ओशो
  स देश ने एक ऐसी संपदा जानी है, जिसके सामने और सब संपदाएं फीकी हो जाती है।
इस देश को ऐसे हीरों का पता है। जिनके सामने तुम्‍हारे हीरे कंकड़—पत्‍थर है। इस देश ने ध्‍यान का धन जाना है। और जिसने ध्‍यान जान लिया, उसके लिए फिर और कोई धन नहीं है; सिर्फ ध्‍यान ही धन है। इस देश ने समाधि जानी है। और जिसने समाधि जानी है, वह सम्राट हुआ। उसे असली साम्राज्‍य मिला।

ओशो
एस धम्‍मो सनंतनो
भाग—12