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शनिवार, 12 मई 2018

मार्ग की अनुभुतिया-सन्यास का फूल


सन्यास का फूल-

सन्यास की यात्रा से पहले जीवन में कुछ पडाव कुछ घटनाये घटित होती है, जो इतनी मंद्र ओर अनछुई सी होती है कि उन्हें उस समय समझने के लिए एक लयवदिता चाहिए। क्योंकि जन्मों की यात्रा का बीज बिना मेध या अषाढ के अंकुरण होना कठिन है। ये कार्य गुरू के प्रेम की वर्षा ही कर सकती है। इसी लिए हिंदुओ ने सन्यास या गुरू को एक विशेष महत्व दिया है। मैं रोज पैडो में पानी डालता था किसी क्यारी में पूरानें पोधो के बीज गिर जाते है जो आंखों से दिखाई नहीं देते। परंतु मैं अकसर देखता की जैसे ही बरसात का मौसम होता अषाढ के बादल मंडराते ओर बरसात की चार बूंदे गिरी नहीं की वह पडे बीज अंकुरित हो उठते तब मैंने सोचा साल के 365 दिन मैं पानी डालता हूं परंतु ये बीज पहले क्यों नहीं अकुंरित हुए। पानी-पानी में भी भेद है बीज की भी मर्जी है की उस के उचित महोल नहीं उत्तपन हुआ था।

रविवार, 6 मई 2018

पूना एक तीर्थ-यात्रा-2018

पूना एक तीर्थयात्रा—

पूना में गुजारे 21 दिन बहुत ही अभुत पूर्व थे, या ये समझ ली जिए कि प्यास अधिक थी या जल की मात्रा प्रचुर हो गई थी, आज ओशो आश्रम में ओशो उर्जा की बाढ सी महसूस हुई, सच जब में स्वीमिंगपूल में अकेला तेर रहा होता तो आस पास कोई नहीं होता, कितना गहरा ध्यान होने लग जाता था। कभी कभी तो ऐसा लगता बीच तरनताल में कि ह्रदय के आर पास किसी ने बिंध दिया है। एक क्षण के लिए तो भय लगता फिर उस दर्द में एक माधुर्य भर जाता। ओर कान सुनना बंद कर करते, चारों ओर की ध्वनिया शांत हो जाती ओर में एकल ही निश्चल सा तैरता होता, एक तो मन भी तरल है ओर जल का स्वभाव भी तरल है इस लिए जल में या जल के आस पास ध्यान अधिक गहरा जाता है।
ओर श्याद इस समय ओशो उर्जा की बाढ को झेलने के लिए साधक कम है, वहां तो इस समय काम करने वाले अधिक है जो ओशो के प्रति न तो संवेदन शील है ओर न उन्हें उस उर्जा से कुछ लेना देना है। इस लिए ओशो उर्जा का आनंद लेने का ये बहुत ही सुंदर समय है।
यही हाल ओशो समाधि पर हे, इस बार जितना समाधि पर समय गुजारा उतना इससे पहले कभी नहीं गुजारा था। सुबह पहले डायेनमिक ध्यान के बाद, 7-30 से 8-30 ओर फिर में तीन से चार घंटे तरनताल में गुजारता अदविता या तो विपसना करती या फिर घर जाकर खाना बनाती ओर 1-15 तक मेरे लिए कटा पपिता लेकर आ जाती ओर फिर इस मधुर थकावट पर में पपीता ही खाकर हम दोनो ओशो समाधि पर चले जाते जो 1-45 से लेकर 3-45 तक उसी में रहते क्योंकि आज कल कम साधक होने की वजह से दिन का ध्यान जो ओशो आडोटोरियम पर होता था नादब्रह्मा वह भी ओशो समाधि पर ही होता।
बहुत मधुर ओर गहराई महसुस होती ....