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बुधवार, 17 मई 2017

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10




पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 20 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दसवां-(ध्यान का दीया जलाओ)

पहला प्रश्न: भगवान,
कहते हैं कि कामनाएं मूलतः तीन ही हैं--संभोग, संपत्ति और शक्ति की कामनाएं। शेष सब इनकी ही संतान हैं। इनमें भी फ्रायड संभोग को बुनियादी बताते हैं; माक्र्स संपत्ति को; और एडलर शक्ति को। और हालांकि तीनों अपने-अपने ढंग से सही मालूम पड़ते हैं, तो भी उलझन नहीं मिटती।
भगवान, फ्रायड, माक्र्स और एडलर के इस विवाद में--विवादी नहीं रहे, पर विवाद जारी है--मैं आपको पंच चुनता हूं। क्या आप पंचायत करेंगे? यदि हां, तो आपका पंच-फैसला क्या होगा?

अखिलानंद,
माक्र्स, फ्रायड और एडलर तीनों सही भी हैं और तीनों गलत भी। सही इसलिए कि प्रत्येक ने आंशिक सत्य को कहा है। गलत इसलिए कि प्रत्येक ने आंशिक सत्य को ही संपूर्ण सत्य है--ऐसा सिद्ध करने की चेष्टा की है।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 19 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-नौवा-(जिन डूबे तिन ऊबरे)

पहला प्रश्न: भगवान,
इधर आप भगवान की जगह भगवत्ता और धर्म की जगह धार्मिकता की बात कर रहे हैं। हमें भगवत्ता और धार्मिकता को विशद रूप से समझाने की कृपा करें।

पूर्णानंद,
भगवत्ता एक सत्य है; भगवान एक कल्पना। भगवत्ता एक अनुभव है; भगवान, एक प्रतीक, एक प्रतिमा। जैसे तुमने भारत माता की तस्वीरें देखी हों। कोई चाहे तो प्रेम की तस्वीर बना ले। लोगों ने प्रभात की तस्वीरें बनाई हैं, रात्रि की तस्वीरें बनाई हैं। प्रकृति को भी रूपायित करने की चेष्टा की है। काव्य की तरह वह सब ठीक, लेकिन सत्य की तरह उसका कोई मूल्य नहीं।
जीवन, अस्तित्व संज्ञाओं से नहीं बनता, क्रियाओं से बनता है। और हमारी भाषा संज्ञाओं पर जोर देती है। जैसे सच पूछो तो जब हम कहते हैं वृक्ष है, तो गलत कहते हैं।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08


पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 18 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आठवां-(एक अभिनव धर्म चाहिए)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपने महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर के उत्तर में कहा कि सात आसमानों के पार कोई व्यक्तिवाची ईश्वर नहीं है जो तुम्हारी प्रार्थना सुने; सब प्रार्थनाएं अनसुनी रह जाती हैं।
महाकवि ने अनगिनत प्रार्थना के गीत गाए; पता नहीं, किसी ने उन्हें सुना या नहीं; लेकिन मुझे लगता है, उनकी एक प्रार्थना जरूर सुनी गई। प्रार्थना इस प्रकार है:
आमि हब ना तापस, हब ना, हब ना, येमनी बलुन यिनि।
आमि हब ना तापस निश्चय यदि ना मेले तपस्विनी।
आमि करेछि कठिन पन, यदि ना मिले बकुलवन
यदि मनेर मतन मन ना पाई जिनि
तबे हब ना तापस, हब ना, यदि ना पाइ से तपस्विनी।
आमि त्यजिब ना घर, हब ना बाहिर उदासीन संन्यासी
यदि घरेर बाहिरे ना हासे केहइ भुवन-भुलानो हासि।
यदि ना उड़े नीलांचन मधुर बातासे विचंचल,
यदि ना बाजे कांकन मन रिनिक-झिनि--
आमि हब ना तापस, हब ना, यदि ना पाइगो तपस्विनी।
आमि हब ना तापस, तोमार शपथ, यदि से तपेर बले
कोनो नूतन भुवन न पारि गड़िते नूतन हृदयत्तले
यदि जागाए वीणार तार कारो टुटिया मरम-द्वार,
कोनो नूतन आंखिर ठार ना लइ चिनि
आमि हब ना तापस, हब ना, हब ना, ना पेले तपस्विनी।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 17 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-सातवां-(प्रार्थना नहीं—ध्यान)

पहला प्रश्न: भगवान,
महाकवि रवींद्रनाथ ने अपने अंतिम दिनों में एक प्रश्नवाचक कविता लिखी जो इस प्रकार है:
भगवान तुमि युगे युगे
दूत पठायेछ बारे बारे
दयाहीन संसारे
तारा बले गेल, क्षमा करो सबे,
बले गेल, भालोबासो, अंतर हते
विद्वेषविष नाशो।
वरणीया तारा स्मरणीया तारा,
तबुओ बाहिर-द्वारे
आजि दुर्दिने फिरानु तादेर
व्यर्थ नमस्कारे।
आमि ये देखेछि, गोपनहिंसा कपट रात्रि-छाये हनेछे निःसहाए
आमि ये देखेछि, प्रतिकारहीन शक्तेर अपराधे विचारेर वाणी नीरवे निभृते कांदे
आमि ये देखेनु, तरुण बालक उन्माद हये छूटे
की यंत्रणाय मरेछे पाथरे निष्फल माथाकूटे।।
कंठ आमार रुद्ध आजिके, वांशि संगीतहारा अमावश्यार कारा
लुप्त करेछे आमार भुवन दुःस्वप्नेर तले; ताइ तो तोमाय शुधाइ अश्रुजले--
याहारा तोमार बिषाइछे वायु, निभाइछे तब आलो,
तामि कि तादेर क्षमा करियाछ, तुमि कि बेसेछ भालो?

मंगलवार, 16 मई 2017

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 16 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-छट्ठवां-(पीए बिना कोई मार्ग नहीं)

पहला प्रश्न: भगवान,
सजनां ने फूल मारया
सानूं पीड़ अंदरां तक होई
लोकां दे पत्थरां दी
सानूं पीड़ रता न होई
"साजन ने फूल मारा और हमें भीतर तक चोट लगी और लोगों ने पत्थर मारे और हमें रत्तीभर पीड़ा नहीं हुई।'

प्रेम संगीता,
अपेक्षा जहां है वहीं दुख की संभावना है। जहां अपेक्षा नहीं वहां विषाद का कोई उपाय नहीं। जिनसे तुम्हारी अपेक्षा है कि प्रीति मिलेगी, पत्थर नहीं; उनसे अगर फूल भी फेंका जाए तो घाव लगेगा। घाव फूल के कारण नहीं लगता, फूल तो बेचारा कैसे घाव करेगा? घाव लगता है तुम्हारी अपेक्षा के अनुपात से। जितनी बड़ी अपेक्षा उतनी गहरी चोट। हां, जिनसे तुम्हें कोई अपेक्षा नहीं है, वे पत्थर भी मारें तो भी दुख नहीं होता, तो भी पीड़ा नहीं होती।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 15 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवां-(बुद्धत्व आकाश-कुसुम है)

पहला प्रश्न: भगवान,
श्रुतिः विभिन्ना स्मृतयश्च भिन्ना,
न एको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्
महाजनो येन गतः स पंथाः।।
"अर्थात श्रुतियां विभिन्न हैं, स्मृतियां भी भिन्न हैं और एक भी मुनि के वचन प्रमाण नहीं हैं। धर्म का तत्व तो गहन है। इसलिए उसे जानने के लिए तो महाजन जिस मार्ग पर चलते हैं, वही केवल मार्ग है।'
भगवान, महाजन की पहचान क्या है? उनके मार्ग पर चलने का अर्थ क्या है? समझाने की अनुकंपा करें।
आनंद किरण,
यह सूत्र अत्यंत सारगर्भित है। श्रुतिः विभिन्ना...। शास्त्र दो प्रकार के हैं--एक श्रुति और एक स्मृति। श्रुति का अर्थ होता है प्रबुद्ध पुरुष से सीधा-सीधा सुना गया। जिन्होंने गौतम बुद्ध के पास बैठकर सुना और उसे संकलित किया, वह श्रुति। जो महावीर के पास उठे-बैठे, जिन्होंने कबीर का सत्संग किया; जीवंत गुरु के पास जिन्होंने प्रेम के सेतु बनाए; जिन्होंने समर्पण किया--और सुना; जिन्होंने अपने को बाद दी--और सुना; जिन्होंने अपनी बुद्धि को एक तरफ रख दिया हटाकर--और सुना; जिन्होंने स्वयं के तर्क को बाधा न देने दी, स्वयं की जानकारियों को बीच में न आने दिया--और सुना; इस तरह जो शास्त्र संकलित हुए, वे हैं श्रुतियां।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 14 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-चौथा-(संन्यास तो आईना है)

पहला प्रश्न: भगवान,
क्या हमारा अंधकार कभी न कटेगा? क्या हम सदा-सदा मूढ़ता में ही डूबे रहेंगे?
स्वामी अक्षयानंद महाराज ने यह भी कहा है कि आचार्य रजनीश जो शिक्षा दे रहे हैं उसे वे भारतीय संस्कृति कहकर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। उनकी शिक्षा भारतीय संस्कृति या शास्त्रों के अनुसार नहीं है। आचार्य रजनीश कलियुगी हैं।
क्या आप इस संबंध में कुछ कहेंगे?

आनंदमूर्ति,
यूं न कहो। अंधकार है तो आलोक भी हो सकता है। अंधकार सबूत है इस बात का कि आलोक की संभावना है। मूढ़ता है तो टूट भी सकती है। जड़ता है तो मिट भी सकती है। श्रम की जरूरत है, अथक श्रम की जरूरत है। चूंकि जड़ता बहुत पुरानी है, उसकी जड़ें गहरी चली गई हैं। हमारे प्राण उस जहर से सदियों से सींचे गए हैं। हमारी हड्डी-मांस-मज्जा में उसका प्रवेश हो गया है। लेकिन फिर भी निराश होने की कोई बात नहीं, हताश होने की कोई बात नहीं। बल्कि ठीक इसके विपरीत, इसे चुनौती समझो। इसे एक निमंत्रण समझो--एक पुकार। यह संघर्ष प्यारा है। इस संघर्ष में मिट भी जाना पड़े तो भी अहोभाग्य है।

सोमवार, 15 मई 2017

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 13 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-तीसरा-(रब्ब दा की पाना)

पहला प्रश्न: भगवान,
संत बुल्लेशाह का वचन है--
रब्ब दा की पाना,
एथों पुटिया, ते एथे लाना।
"अर्थात परमात्मा का क्या पाना, यहां से उखाड़ना और वहां लगाना।'
भगवान, क्या इतनी सी ही बात है?

  सुरेंद्र सरस्वती,
सरल है बात, यही कठिनाई है। कठिन होती तो कठिन न होती, क्योंकि कठिन बात के लिए तो अहंकार बहुत आतुर होता है। कठिनाई में अहंकार को चुनौती है, आमंत्रण है, बुलावा है। जितनी कठिन हो--असंभव हो तो और भी भला--और आदमी करने की ठान लेता है। गौरीशंकर पर चढ़ेगा। पाने को वहां कुछ भी नहीं, मगर अहंकार अद्वितीय होने का मजा लेना चाहता है। चांद पर जाएगा, कंकड़-पत्थर लाएगा। यहीं कुछ कमी है कंकड़-पत्थरों की? मंगल पर पहुंचेगा, दूर के सितारों पर भी एक दिन जाकर रहेगा; हाथ कुछ भी न लगेगा। पर यह दंभ कि मैं हूं पहला व्यक्ति जो गौरीशंकर पर चढ़ा, कि मैं हूं पहला व्यक्ति जो चांद पर चला! जीवनभर लोग न्योछावर करते थे ऐसी ही मूढ़ताओं पर।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02



पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक: 12 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दूसरा-(मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयः)

पहला प्रश्न: भगवान,
महाभारत का यह सूत्र बिलकुल आपके दर्शन से मिलता हुआ मालूम पड़ता है--
मुहूर्तं ज्वलितं श्रेयः,
न तु धूमायितं चिरम्।
"मुहूर्त भर जलना श्रेयस्कर है, बहुत समय तक धुआंना नहीं।'
यह कैसे संभव है, यह समझाने की अनुकंपा करें।
सहजानंद,
यह सूत्र निश्चित ही मेरी जीवन-दृष्टि को एक अत्यंत संक्षिप्त संकेत में रूपांतरित कर देता है। जीवन है त्वरा का नाम, तीव्रता का नाम, सघनता का नाम। जैसे कोई धूप की किरणों को इकट्ठा कर ले, एकाग्र कर ले तो तत्क्षण आग प्रज्वलित हो जाती है। वे ही किरणें बिखरकर पड़ती हैं तो सिर्फ कुनकुनापन देती हैं; वे ही इकट्ठी हो जाती हैं तो प्रज्वलित अग्नि पैदा हो जाती है।

पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01




पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक: 11 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पहला-(धर्म का सार: खुमारी)

पहला प्रश्न: भगवान,
आपने संत-शिरोमणि कबीर साहब के पद "पीवत रामरस लगी खुमारी' को नई प्रवचन माला का शीर्षक बनाया है। क्या सच ही ब्रह्मानुभव परम मद है? यह ब्रह्मानुभव क्या है?
भगवान, ऐसा लगता है कि कबीर साहब आपको अतिशय प्रिय हैं। क्यों?

आनंद मैत्रेय,
कबीर निश्चय ही मुझे अतिप्रिय हैं। कारण बहुत हैं। बुद्ध से मुझे बहुत लगाव है, लेकिन बुद्ध राजमहल के एक उपवन हैं। सुंदर फूल खिले हैं। बड़ी सजावट है बगिया में, बड़ी रौनक है। परिष्कार है। लेकिन जंगल की जो सहजता है, स्वाभाविकता है, उसका अभाव है। बुद्ध अगर उपवन हैं तो कबीर जंगल हैं। जंगल का अपना सौंदर्य है--अछूता, कुंवारा। न तो मालियों ने संवारा है, न शिक्षा है, न संस्कार हैं, न ज्ञान है। और फिर भी परम प्रकाश का अनुभव हुआ है।