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सोमवार, 9 अप्रैल 2018

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--20

नानक नदरी नदरि निहाल—(प्रवचन—बीसवां)

पउड़ी: 38 
जतु पहारा धीरजु सुनिआरु  
अहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। 
भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

सलोकु:

पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु
दिवस राति दुइ दाई दाइआ खेले सगलु जगतु।।
चंगिआइआ बुरिआइआ वाचै धरमु हदूरि
करमी आपा आपणी के नेड़े के दूरि।।
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि
'नानक' ते मुख उजले केती छूटी नालि।।



जतु पहारा धीरजु सुनिआरु अहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--19


सच खंडि वसै निरंकारु—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

पउड़ी: 37

करम खंड की वाणी जोरु। तिथै होरु न कोई होरु।।
तिथै जोध महाबल सूर। तिन महि राम रहिआ भरपूर।।
तिथै सीतो सीता महिमा माहि। ताके रूप न कथने जाहि।।
न ओहि मरहि न ठागे जाहि। जिनकै राम बसै मन माहि।।
तिथै भगत वसहि के लोअ। करहि अनंदु सचा मनि सोइ।।
सच खंडि वसै निरंकारु। करि करि वेखै नदरि निहाल।।
तिथै खंड मंडल बरमंड। जे को कथै त अंत न अंत।।
तिथै लोअ लोअ आकार। जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार।।
वेखै विगसे करि वीचारु। 'नानक' कथना करड़ा सारु।।


नुष्य असहाय है। लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। मनुष्य दुर्बल है, दरिद्र है, दीन है, लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। उससे हमारी दूरी ही हमारी दरिद्रता है। और जितने हम उससे दूर होते जाते हैं, उतना ही जीवन अर्थहीन होता जाता है।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--18

नानक अंतु न अंतु—(प्रवचन—अट्ठाहरवां) 

पउड़ी: 35
धरम खंड का एहो धरमु।
गिआन खंड का आखहु करमु।।
केते पवन पाणि वैसंतर केते कान महेस।
केते बरमे घाड़ति घड़िअहि रूप रंग के वेस।।
केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस।
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस।।
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस।
केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद।।
केतीआ खाणी केतीआ वाणी केते पात नरिंद।
केतीआ सुरती सेवक केते 'नानक' अंतु न अंतु।।


पउड़ी: 36

गिआन खंड महि गिआनु परचंड।
तिथै नाद विनोद कोउ अनंदु।।
सरम खंड की वाणी रूपु।
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु।।
ताकीआ गला कथीआ ना जाहि।
जे को कहै पिछै पछुताइ।।
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि।
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधी की सुधि।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--17

करमी करमी होइ वीचारु—(प्रवचन—सतरहवां)

पउड़ी: 34

राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
तिसु विचि जीअ जुगुति के रंग। तिनके नाम अनेक अनंत।।
करमी करमी होइ वीचारु। साचा आप साचा दरबारु।।
तिथै सोहनि पंच परवाणु। नदरी करमी पवै नीसाणु।।
कच पकाई ओथै पाइ। 'नानक' गाइआ जापै जाइ।।


नानक के सूत्र के पहले कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात, कि जीवन को जो लक्ष्य मान लेता है, वह भटक जाता है। जीवन केवल एक अवसर है, लक्ष्य नहीं। मार्ग है, गंतव्य नहीं। उससे कहीं पहुंचना है। जीवित होने से ही मत समझ लेना कि पहुंच गए। जीवन कोई सिद्धि नहीं है, केवल एक प्रक्रिया है। उससे ठीक से गुजरे, तो पहुंच जाओगे। ठीक से न गुजरे, तो भटक जाओगे।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--16

नानक उतमु नीचु  कोइ—(प्रवचन—सोलहवां)

पउड़ी: 32

इकदू जीभौ लख होहि लख होवहि लख बीस।
लखु लखु गेड़ा अखिअहि एक नामु जगदीस।।
एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीए होइ इकीस।
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस।।
'नानक' नदरी पाईए कूड़ी कूड़ै ठीस।।

पउड़ी: 33

आखणि जोरु चुपै नह जोरू। जोरु न मंगणि देणि न जोरू।।
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरू। जोरु न राजि मालि मनि सोरू।।
जोरु न सुरति गिआनु वीचारि। जोरु न जुगती छुटै संसारू।।
जिसु हथि जोरू करि वेखै सोइ। 'नानक' उतमु नीचु  कोइ।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--15

जुग जुग एको वेसु—(प्रवचन—पंद्रहवां)

पउड़ी: 30

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु।
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीवाणु।।
जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु।
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

पउड़ी: 31

आसणु लोइ लोइ भंडार। जो किछु पाइआ सु एका वार।।
करि करि वेखै सिरजनहार। नानक सचे की साची कार।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनील अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--14


आदेसु तिसै आदेसु—(प्रवचन—चौदहवां)

पउड़ी: 28
मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूती।
किंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति।।
आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीत।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहति। 
जुगु जुगु एको वेसु।।


पउड़ी: 29

भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि बाजहि नाद।
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद।।
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहति। जुगु जुगु एको वेसु।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) प्रवचन--13


सोई सोई सदा सचु साहिबु—(प्रवचन—तेरहवां)

पउड़ी: 27

सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले।
बाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे।।
केते राग परी सिउ कहीअनि केते गावणहारे।
गावहि तुहनो पउणु पाणी वैसंतरु गावे राजा धरम दुआरे।।
गावहि चितगुपतु लिखि जाणहि लिखि लिखि धरमु वीचारे।
गावहि ईसरु बरमा देवी सोहनि सदा सवारे।।
गावहि इंद इंदासणि बैठे देवतिया दरि नाले।
गावहि सिध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे।।
गावनि जती सती संतोखी गावहि वीर करारे।
गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले।।
गावनि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले।
गावनि रतनि उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले।।
गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे।
गावहि खंड मंडल वरमंडा करि करि रखे धारे।।