जोगी तु क्यों आया मेरे द्वारा। तेरी आंखों में नहीं दिखता सपनों का अब वो संसार। जोगी तु क्यों आया मेरे द्वार.......... Mansa
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रविवार, 17 जून 2018
केनोउपनिषद--प्रवचन--16
दिनांक 16 जुलाई 1973; प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।
सूत्र:
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स एतदेवं
वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाच्छन्ति।। ६।।
उपनिषदं भो जूहीत्युक्ता त उपनिषद्
ब्राह्मी वाव त उपनिषदमलूमेति।। ७।।
तस्यै तपो दम: कर्मेति प्रतिष्ठा वेदा:
सर्वाङगानि सत्यमायतनम्।। ८।।
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाणानमनन्ते स्वर्गे
लोकेज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति।। ९।।।।
केनोउपनिषद--प्रवचन--15
दिनांक 15 जुलाई, 1973; संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।
प्रश्न सार :
*हिंदू पौराणिक देवी— देवताओं का क्या वास्तव में अस्तित्व है?
और उनके दर्शन का क्या अर्थ है?
*क्या पश्चिमी मनोविज्ञान की ट्रांसफरन्स यानी हस्तांतरण की घटना
समर्पण की पूर्वीय धारणा के अनुरूप ही है?
*मुझे अक्सर ऐसा क्यों महसूस होता है कि मैं किसी कठपुतली की भांति अज्ञात शक्तियों द्वारा नियंत्रित हूं?
केनोउपनिषद--प्रवचन--14
चतुर्थ खंड
सा ब्रह्मेति होवाच। ब्रह्मणा वा एतद्विजये महीयध्वमिति,
ततो हैव विदाडचकार ब्रह्मेति।। 1।।
तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यद्ग्निर्वायुरिन्द्रस्ते
हेनन्नेदिष्ठ पस्पृशस्ते ह्येनत् प्रथमो विदाज्वकार ब्रह्मेति।। 2।।
तस्माद् वा इंद्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं
पस्पर्श, स हेनत् प्रथमो विदाडचकार ब्रह्मेति।। 3।।
केनोउपनिषद--प्रवचन--13
दिनांक 14 जुलाई 1973; संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।
प्रश्न सार :
*ध्यान की तुलना में मनोविश्लेषण का क्या योगदान है?
*जो आपमें समग्रता से विश्वास या अविश्वास नहीं कर सकते उनके लिए क्या कोई तीसरा विकल्प भी है?
*आप पर सब कुछ छोड़ देने पर भी यदि कुछ न घटे तो क्या यह भी समर्पण ही है?
केनोउपनिषद--प्रवचन--12
दिनांक 14 जुलाई 1973; प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।
तृतीयखंड
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयंत त
ऐक्षंतास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति।।१।।
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति।।२।।
तेऽग्निमब्रुव जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति।।३।।
तदभ्यद्रवत तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति।।४।।
तस्मित्त्वयि किंवीर्यमिति। अपीद सर्व दहेयम् यदिदं पृथिव्यामिति।।५।।
केनोउपनिषद--प्रवचन--10
दिनांक 13 जुलाई 1973; प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।
सूत्र:
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद स:।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।।३।।
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्व हि विदन्ते।
आत्मना विदन्ते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्।।४।।
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि:।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।५।।
केनोउपनिषद--प्रवचन--09
दिनांक 12 जुलाई 1973; संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।
प्रश्न सार :
*सक्रिय ध्यान के चौथे चरण में निश्चल और साथ ही विश्राम
मैं कैसे रहा जा सकता है?
*परम अनुभव पाना इतना कठिन क्यों है?
*समर्पण कैसे करें?
पहला प्रश्न :
सुबह के सक्रिय ध्यान के चौथे चरण में
शरीर को मृत तथा निश्चल के प्रयास में, व्यक्ति तनावपूर्ण हो जाता है। चूंकि यह चरण पूर्ण
विश्राम का तथा अपने को छोड़ देने का है, कैसे कोई विश्राम
में जाये और साथ ही निश्चल भी रहे? बजाए आनंद के, यह एक तनाव हो जाता है।
केनोउपनिषद--प्रवचन--08
अनादि.....अनंत—आठवां प्रवचन
दिनांक 12 जुलाई 1973, प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।
यदि
मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि
नूनं
त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य
त्वं यदस्य देवेष्यथ नु
मीमांस्यमेव
ते मन्ये विदितम्।।1।।
नाहं
मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।
यो
नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च।।2।।
द्वितीय अध्याय
1
तुम
सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभांति जानते हो,
तो
तुम वास्तव में बहुत कम जानते हो,
क्योंकि ब्रह्म का जो रूप तुम जीवित प्राणियों
में
तथा
देवताओं में समाया हुआ देखते हो वह एक मामूली बात है।
इसलिए
तुम्हें ब्रह्म के बारे में और आगे खोजबीन करनी चाहिए।
केनोउपनिषद--प्रवचन--07
दिनांक 11 जुलाई 1973; संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।
प्रश्न सार :
*क्यों सदगुरुओं को ईश्वर की भांति पूजा जाता रहा है?
*अराजकतापूर्ण श्वास से पुराने ढांचों के टूट जाने के बाद नया कैसे निर्मित होगा?
*क्या यह कहना कि प्रार्थना मूर्तिपूजा मंदिर और चर्च सब झूठ पर आधारित हैं निषेध नहीं है?
पहला प्रश्न :
सुबह आपने कहा कि पूजा के द्वारा ब्रह्मको नहीं पाया जा सकता। वरन वह पूजा करने वाले के भीतर ही पाया जाता है। लेकिन सदगुरूओं को उनके शिष्यों ने सदा ही ईश्वर की भांति पूजा है। कृपया इसका महत्व समझायें।
केनोउपनिषद--प्रवचन--06
परमात्मा आस्तित्व है—छठवां—प्रवचन
दिनांक 11 जुलाई 1973; प्रात:, माउंट आबू राजस्थान।
सूत्र:
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षषि पश्यति
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। 6।।
यच्छोत्रेण न शृणोति येन श्रोतमिद श्रुतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। 7।।
यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राण: प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्ध नेदं यदिदमुपासते।। 8।।
केनोउपनिषद--प्रवचन--05
दिनांक 1० जुलाई 1973; संध्या,
माउंट आबू राजस्थान।
प्रश्न सार :
*बुद्धि के उपयोग का सर्वोत्तम मार्ग क्या है?
*सक्रिय ध्यान के प्रारंभिक दिनों में होने वाली पीड़ा से कैसे पार पाएं?
*सक्रिय ध्यान का पांचवां चरण क्या है?
*यदि सक्रिय ध्यान के दौरान गहन शांति उतरने लगे तो क्या गतिविधियां बंद हो जाने दें?
पहला प्रश्न :
आपने कहा कि बौद्धिक समझ तथा ज्ञान से किसी को लाभ नहीं हुआ है, और उपनिषद कहते है कि किसी भी चीज का निषेध मत करो। यदि बुद्धि है और हमें उसका निषेध नहीं करना है तो फिर कौन—सा सर्वाधिक उत्तम मार्ग है जिससे उसका उपयोग किया जाये?
केनोउपनिषद--प्रवचन--04
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नौ मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूवेंषां ये नस्तद्वयाचचक्षिरे।।३।।
यद्वाचानष्णुदितं येन वागष्णुद्यते
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।४।।
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।५।।
केनोउपनिषद--प्रवचन--03
प्रश्न सार :
*आध्यात्मिक साधना में गुरु की क्या भूमिका है?
*सक्रिय ध्यान में घटने वाले आतंरिक स्त्री—पुरुष के मिलन को समझाने की कृपा करें?
*भोगों में लिप्त हुए बिना शरीर का समग्र स्वीकार कैसे हो?
पहला प्रश्न:
आपने कहा कि जब गुरु की उपस्थिति उसकी अनुपस्थिति जैसी होती है और जब शिष्य भी अनुपस्थिति की अवस्था में आ जाता है। तभी परमात्मा का काम शुरू होता हे। यदि दोनों ही अनुपस्थिति की अवस्था में होते है, तो कृपया समझाएं की आध्यात्मिक साधना में गुरु की भूमिका होती है?
शनिवार, 16 जून 2018
केनोउपनिषद--प्रवचन--02
प्रथम खंड
अँ केनेषितं पतति प्रेषितं मन: केन प्राण: प्रथम: प्रैति युक्ति:।
केनेषितां वाचमिमां वदंति चक्षु: श्रोत्रं क उ देवो युनीक्ति।। १।।
श्रोत्रस्य श्रोत्र मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राण:।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुव्यधीरा: प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति। 1२।।
केनोपनिषद प्रथम अध्याय
किसकी इच्छा पर और किसके द्वारा उत्पे्ररित होकर मन अपने विषयों पर नीचे उतरता है? किसके द्वारा उत्प्रेरित होकर मुख्य प्राण संचारित होता है? किसके द्वारा उत्प्रेरित होकर मनुष्य यह वाणी बोलते हैं? कौन—सा देव आंखों तथा कानों को निर्दोंषित करता है?
वह आत्मा कान का भी कान है मन का भी मन? है वाणी की भी वाणी है, प्राण का भी प्राण है, और आंख की भी आंख है। और ज्ञानीजन अपनी आत्मा को इन ज्ञानेंद्रियों से अलग कर ज्ञानेंद्रियों से ऊपर उठ जाते हैं और अमरता को उपलब्ध होते हैं।
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