अमृत द्वार-(विविध)
ओशो
प्रवचन-छट्ठवां-(नाचो शून्यता है
नाच)
टेप न. १० बंबई दिनांक ७ मई १९६८
एक बहुत अच्छा प्रश्न है। पूछा है, श्रद्धा के बिना
शास्त्र का अध्ययन नहीं, अध्ययन के बिना ज्ञान नहीं। और
ज्ञान के बिना आत्मा का अनुभव नहीं होता है।
श्रद्धा के बिना शास्त्र का अध्ययन क्यों नहीं होगा? हमारी धारणा ऐसी है कि या तो हम श्रद्धा करेंगे या अश्रद्धा करेंगे। हमारी
धारणा ऐसी है कि या तो हम किसी को प्रेम करेंगे या घृणा करेंगे। तटस्थ हम हो ही
नहीं सकते। जो श्रद्धा से शास्त्र का अध्ययन करेगा वह भी गलत, जो अश्रद्धा से शास्त्र का अध्ययन करेगा वह भी गलत है। शास्त्र का ध्यान
तटस्थ होकर करना होगा। तटस्थ होकर ही कोई
अध्ययन हो सकता है। श्रद्धा का अर्थ है आप पक्ष में पहले से मानकर बैठ गए
हैं, पक्षपात से भरे हैं। अश्रद्धा का अर्थ है आप पहले से ही
विपरीत मानकर बैठ गए। आप पक्षपात से भरे हैं।

