जो घर बारे आपना-(साधना-शिविर)
ओशो
प्रवचन-आठवां-(योग: कर्म की कुशलता)
प्रश्न: क्या ध्यान का परिणाम केवल धर्म-जीवन के लिए ही उपयोगी
है अथवा उसका परिणाम रोज के व्यावहारिक जीवन में भी उपयोगी है? कृपया यह
समझाएं।
मूलतः
तो धर्म के लिए ही उपयोगी है। लेकिन धर्म व्यक्ति की आत्मा है। और उस आत्मा में
परिवर्तन हो,
तो व्यवहार अपने आप बदलता ही है। भीतर बदले, तो
बाहर बदलाहट आती है। वह बदलाहट लेकिन छाया की भांति है, परिणाम
की भांति है। वह पीछे चलती है। जैसे हम किसी से पूछें कि कोई आदमी दौड़े, तो आदमी ही दौड़ेगा या उसकी छाया भी दौड़ेगी? ऐसा ही
यह सवाल है। आदमी दौड़ेगा तो छाया तो दौड़ेगी ही। हां, इससे
उलटा नहीं हो सकता कि छाया दौड़े तो आदमी दौड़ेगा क्या? पहली
तो बात छाया दौड़ नहीं सकती। और अगर दौड़े भी, तो भी आदमी के
उसके पीछे दौड़ने का उपाय नहीं है।


