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गुरुवार, 14 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-12



भारत का भविष्य—ओशो
प्रवचन-बारहवां
ए टाक गिवन एट आजोल, इंडिया
डिस्कोर्स नं० १२

वाचक--गांधी जी का कभी कभी मजाक करते हैं तो ऐसा नहीं है कि गांधी जी ने इस देश का निरीक्षण किया, पर्यटन किया और करुणा की वजह से उन्होंने जीवन में जो जरूरी थी इतनी चीजों से चलाकर वह सादगी का विचार किया था वह करुणा की वजह से किया नहीं है वह।

ओशो—करुणा की वजह से हो या ना हो। इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता, मेरे लिए यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं कि गांधी जी ने किस वजह से सादगी अखतियार की, मेरे लिए महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सादगी का रुख मुल्क को गरीब बनाता है। मेरे लिए वह महत्त्वपूर्ण नहीं है। वह गांधी जी की व्यक्तिगत बात है, वह करुणा के साधे रह रहे हैं, या उनको कोई ओपशेशन है इसलिए साधे रह रहे हैं, या दिमाग खराब है इसलिए साधे रह रहे हैं। इससे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। वह गांधी जी की निजी बात है। मेरे लिए प्रयोजन जिस बात से है वह यह है कि जो मुल्क सादगी को प्रतिष्ठा देता है। वह मृत संपन्न नहीं हो सकता।

बुधवार, 13 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-11



भारत का भविष्य—ओशो
प्रवचन-ग्यारहवां
ए टाक गिवन इन बोम्बे,  इण्डिया।
डिस्कोर्स नं० ११

मेरे प्रिय आत्मन् ,
एक नए भारत की ओर इस संबंध में, मैं थोड़ी-सी बातें आपसे कहना चाहूंगा। पहली बात तो यह कि भारत को हजारों वर्ष तक कि यह पता ही नहीं था कि वह पुराना हो गया  है। असल में पुराने होने का पता ही तब चलता है। जब हमारे पड़ौसी नए हो जाएं। पुराने के बोध के लिए किसी का नया हो जाना जरूरी है।
भारत को हजारों वर्ष तक यह पता नहीं था कि वह पुराना हो गया है। इधर इस सदी में आकर हमें यह प्रतीति होनी शुरू हुई है कि हम पुराने हो गए हैं। इस प्रतीति को झुठलाने की हम बहुत कोशिश करते हैं। क्योंकि यह बात मन को वैसे ही दुःख देती है। जैसे किसी बूढ़े आदमी को जब पता चलता है कि वह बूढ़ा हो गया है तो दुःख शुरू होता है।

सोमवार, 11 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-10



भारत का भविष्य—ओशो
प्रवचन-10
ए टाक गिवन इन बोम्बे इंडिया
डिस्कोर्स नं० १०

एक बहुत पुराने नगर में, उतना ही पुराना एक चर्च था। वह चर्च इतना पुराना था कि उस चर्च में भीतर जाने के लिए प्रार्थना करने वाले भयभीत होते थे। उसके किसी भी क्षण गिर पड़ने की संभावना थी। आकाश में बादल गरजते थे तो चर्च के अस्थि पंजर कंप जाते थे। हवाएं चलती थी तो लगता था चर्च अब गिरा, अब गिरा।
ऐसे चर्च में कौन प्रवेश करता, कौन प्रार्थना करता? धीरे-धीरे उपासक आने बंद हो गए। चर्च के संरक्षकों ने कभी दीवारों का पलस्तर बदला, कभी खिड़की बदली, कभी द्वार रंगे। लेकिन न द्वार रंगने से, न पलस्तर बदलने से, न कभी यहां ठीक कर देने से, न कभी वहां ठीक कर देने से। वह चर्च इस योग्य न हुआ कि उसे जीवित माना जा सके। वह मुर्दा ही बना रहा।

रविवार, 10 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-09



भारत का भविष्य—ओशो
ए टाक गिवन इन राजकोट इंडिया
(नोट-प्रवचन एक से सात तक उपलब्ध नहीं है)
डिस्कोर्स नं० ९
प्रवचन-09

मेरे प्रिय आत्मन् ,
जैसे, जैसे शाम के संबंध में बहुत से प्रश्न आए। कुछ मित्रों ने पूछा है कि भारत सैकड़ों वर्षों से दरिद्र है इस दरिद्रता में, इस दरिद्रता में तो गांधीवाद का हाथ नहीं हो सकता है। वह क्यों दरिद्र है इतने वर्षों से? गांधीवाद का हाथ तो नहीं है लेकिन गांधीवाद जैसी ही विचारधाराएं इस देश को हजारों साल से पीड़ित किए हुए हैं।
उन विचारधाराओं का हाथ है। न कोई हमसे शर्त करता है कि इन विचाराधाराओं को हम क्या नाम देते हैं? दो विचारधाराओं पर ध्यान दिलाना जरूरी है। एक तो भारत में कोई तीन-चार हजार वर्षों से संतोष की, कंटेंनटमेंट की जीवनधारणा को स्वीकार किया है। संतुष्ट रहना है जितना है उसमें संतोष कर लेना है। जो भी है उसमें भी तृप्ति मान लेनी है।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

भारत का भविष्य—प्रवचन-08



भारत का भविष्य—(ओशो)
ए रेडियो टाक बाए ओशो,
(नोट-प्रवचन एक से सात तक उपलब्ध नहीं है)
डिस्कोर्स नं० ८
प्रवचन-08
(उदगोश्किाओं में बतचीत का माहौल)

नोकरानी-- . . . तुम कुछ नहीं करती पर मैं तो बहुत कुछ करना भी चाह रही हूं बीबी जी, सच।
मालकिन---हां, लेकिन फिर वही बात की आपने आप करना चाह रही हैं। या कुछ कर रही हैं। मैं तो यह जानना चाहती हूं।
नोकरानी--बीबी जी, देखिए देश विवाह हमारा पहला कर्तव्य है, पहला धर्म है बस इसी के लिए हम कुछ योजनाएं बना रहे हैं।
मालकिन---हां, यानि की और भी उपयोग हैं आपके पास . . .
नोकरानी--मेरी भी पड़ौसने भी अपना सहयोग दे रही हैं।
मालकिन---. . . भई वाह. . .
नोकरानी--हम लोग सप्ताह में एक बार मिल बैठते हैं और बैठक में बहुत-सी बातें होती हैं।