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रविवार, 30 अप्रैल 2017

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-11



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-ग्याहरवां-(स्वानुभव का दीया)

श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक ३१ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, लगता है आचार्य श्री तुलसी आपके प्रवचनों और वक्तव्यों से काफी तिलमिला गए हैं, क्योंकि कई बार बहुत लोगों के बीच में आपने कहा कि आचार्य तुलसी आपसे एकांत में ध्यान सीखना चाहते थे। और उनके युवराज शिष्य मुनि नथमल को आपने मुनि थोथूमल कहा। इससे गुरु-शिष्य की प्रतिष्ठा को काफी धक्का पहुंचा है और बौखलाहट में उन्होंने संपूर्ण महाराष्ट्र में आपकी विकृत विचार-धारा का सामना और शुद्धिकरण करने के लिए अपनी साध्वियों के पांच समूह जगह-जगह भेजे हैं। ये समूह शास्त्र-शुद्ध प्रेक्षा-ध्यान शिविर आयोजित करेंगे। उनकी एक सैंतालीस वर्षीय साध्वी श्री चांदकुमारी दस हजार मील की यात्रा करके पूना पधारी हैं।
भगवान, यह प्रेक्षा-ध्यान क्या है? इस विधि से क्या आत्मशुद्धि व पर-शुद्धि हो सकती है? और कृपया यह भी बताएं कि क्या भगवान महावीर का ध्यान भी इसी प्रकार का था?

चैतन्य कीर्ति!

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-दसवां-(जीवंत अद्वैत)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक ३० जुलाई १९८०

पहला प्रश्न: भगवान! मार्टिन बूबर को पढ़ते हुए ऐसा लगा कि वे हसीदी साधना द्वारा बुद्धत्व के करीब पहुंचे हुए एक महापुरुष थे। उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक दोनों पहलुओं को स्वीकार करता हुआ यहूदी मानवतावाद पर खड़ा हुआ एक संघ बसाना चाहा, लेकिन यहूदियों ने ही उनका इनकार कर दिया। और खास कर आइसमन और अरब के सिलसिले में तो इजरायल ने उन्हें देशद्रोही सिद्ध करने की कोशिश की, जब कि वे सिर्फ बदला लेने के बजाय क्षमा और मैत्री साधने को कह रहे थे। अपने ही देश में निंदित रहे, जब कि दुनिया भर के लोग, खासकर ईसाई, उनसे प्रभावित थे।
भगवान, कच्छ में बसते हुए हमारे अपने कम्यून के संदर्भ में इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

अजित सरस्वती!

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-नौवां-(ध्यान-प्रेम-समर्पण)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २९ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान,
देर लगी आने में हमको,
शुक्र है फिर भी आए तो।
आस ने दिल का साथ न छोड़ा,
वैसे हम घबराए तो।
शफक, धनक, महताब, घपाएं,
तारे, नग्मे, बिजली, फूल।
दामन में तेरे क्या-क्या कुछ है,
दामन ये हाथ में आए तो।
चाहत के बदले में हम तो,
बेच दें अपनी मर्जी तक।
कोई मिले तो दिल का गाहक,
कोई हमें अपनाए तो।
प्रभु, आपकी कृपा से अब मेरा तमस शांत हो गया है। चेतना से रजस का बोझ भी कम होता जा रहा है। आपके पास रह कर सत्व में प्रवेश हो सकेगा। किसी दिन आपकी अनुकंपा से गुणातीत हो जाऊं, यह प्रार्थना है। एक छोटी-सी कहानी--
दिल्ली वाले निजामुद्दीन औलिया के एक शिष्य अपनी आजीविका चलाने के लिए साग-सब्जी उबाल कर बेचा करते थे। गांव वाले उन्हें जमीकंद आदि दे जाया करते थे। वे लकड़ी तोड़ लाते और उन्हें उबाल कर बेचा करते। इस तरह उनका जिक्र और फिक्र साथ-साथ चलता था। उम्र बढ़ जाने पर उनकी दीनाई कम होती गई, नेत्र-ज्योति कमजोर होने से उन्हें कम सूझने लगा। इसलिए लोग खा-पीकर खोटे सिक्के उन्हें दे जाते। वे उन खोटे सिक्कों को लेकर जमा करते जाते, मटकियां भर जातीं। यह जानते हुए कि लोग उन्हें खोटे सिक्के दिए जा रहे हैं, वे किसी को कुछ भी नहीं कहते थे। तबीयत से खिलाते-पिलाते रहे। यह सिलसिला चलता रहा। और एक दिन जब उनकी अंतिम घड़ी आ गई, उन्होंने शुक्राने की नमाज पढ़ी। नमाज अता करके उन्होंने बारगाहे-इलाही में यह दुआ की: या अल्लाह, मैं ताउम्र लोगों से खोटे सिक्के लेता रहा हूं। अब यह खोटा सिक्का भी तेरे पास आ रहा है। तू इसे स्वीकार कर, इनकार न करना। इतना कह कर वे गिर गए और मर गए।
भगवान, उनकी यह प्रार्थना आपके समक्ष दोहराने का अर्थ तो आप समझ ही गए हैं। मेरे प्राण स्वीकार करें और मुझे आशीष दें!

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-आठवां-(प्रेम है धर्म का शिखर)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २८ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत में आततायियों के खिलाफ सुदर्शन चक्र उठाया था। हजरत मोहम्मद साहब को भी धर्म के खातिर तलवार उठानी पड़ी थी। ईश्वर-पुत्र जीसस को भी अपने हाथों में कोड़ा उठाना पड़ा था। भगवान बुद्ध और महावीर की अहिंसा परमो धर्मः उनके मार्ग में आ गई होगी, और लोगों ने उन पर हिंसाएं कीं।
प्रभु, क्या समय की अब भी यही पुकार है? क्या विधान ऐसा ही है?
भगवान,
इश्क में कुरबान जब तक जिंदगी होती नहीं
मेरी नजरों इससे पहले बंदगी होती नहीं।
भगवान,
जान निकले तुम्हारे पहलू में, दिल है बेचैन उस घड़ी के लिए
इश्क होता नहीं सभी के लिए, है यह उलफत किसी किसी के लिए।
भगवान,
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर किता बाजू-ए-कातिल (कच्छ) में है।

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-सातवां-(धर्म और सदगुरु)

श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २७ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, गुरु पूर्णिमा के इस पुनीत अवसर पर हम सभी शिष्यों के अत्यंत प्रेम व अहोभावपूर्वक दंडवत प्रमाण स्वीकार करें। साथ ही गुरु-प्रार्थना के निम्नलिखित श्लोक में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का रूप बताया है, परंतु इसके आगे उसे साक्षात परब्रह्म भी कहा है! कृपा करके गुरु के इन विविध रूपों को हमें समझाने की अनुकंपा करें। श्लोक है:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

सत्य वेदांत!
यह सूत्र अपूर्व है। थोड़े से शब्दों में इतने राजों को एक साथ रख देने की कला सदियों-सदियों में निखरती है। यह सूत्र किसी एक व्यक्ति ने निर्माण किया हो, ऐसा नहीं। अनंत काल में न मालूम कितने लोगों की जीवन-चेतना से गुजर कर इस सूत्र ने यह रूप पाया होगा। इसलिए कौन इसका रचयिता है, कहा नहीं जा सकता।

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-छठवां-(धर्म का रहस्यवाद)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २६ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, निरुक्त में यह श्लोक आता है:
मनुष्या वा ऋषिसूत्क्रामत्सु
देवानब्रुवन्को न ऋषिर्भविष्यतीति।
तेभ्य एतं तर्कमूषिं प्रायच्छन।।
(इस लोक से जब ऋषिजन जाने लगे, जब उनकी परंपरा समाप्त होने लगी तब मनुष्यों ने देवताओं से कहा कि अब हमारे लिए कौन ऋषि होगा? उस अवस्था में देवताओं ने तर्क को ही ऋषि-रूप में उनको दिया। अर्थात देवताओं ने मनुष्यों से कहा कि आगे को तर्क को ही ऋषि-स्थानीय समझो।)
भगवान, हमें निरुक्त के इस वचन का अभिप्राय समझाने की कृपा करें।

सहजानंद!
पहली बात; ऋषि कभी गए नहीं; जा सकते नहीं। जैसे रात हो, तो आकाश में तारे होंगे; जैसे पृथ्वी हो, तो कहीं न कहीं फूल खिलेंगे; ऐसे ही मनुष्य-चेतना मौजूद हो, तो ऋषि विलुप्त नहीं हो सकते। कहीं न कहीं कोई झरना फूटेगा; कोई गीत उठेगा; कोई बांसुरी बजेगी।

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-पांचवां-(झूठा धर्म और राजनीति)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २५ जुलाई, १९८०


पहला प्रश्न: भगवान, अब तक धर्म और राजनीति को परस्पर-विरोधी आयाम माना जाता था। लेकिन आज यह साफ हो गया है कि धर्म और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज भुज में स्वामीनारायण संप्रदाय के महंत हरिस्वरूपदास जी ने आपके कच्छ-प्रवेश को कच्छ संस्कृति पर आक्रमण की संज्ञा दी है। तथा एक राजनीतिज्ञ श्री बाबू भाई शाह ने आपको साधु-वेश में शिकारी संबोधित किया है!
इस धर्म और राजनीति के ब्लैक बोर्ड पर आपकी धार्मिकता सफेद खड़िया से लिखी हुई सिद्ध हो रही है।

मुकेश भारती!
धर्म का सम्यक स्वरूप तो सदा राजनीति से उतने ही दूर है, जितने दूर पृथ्वी से आकाश। या शायद उससे भी ज्यादा दूर। पृथ्वी और आकाश के बीच तो शायद सेतु बनाया भी जा सके; धर्म और राजनीति के बीच कोई सेतु नहीं बन सकता है।

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जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-चौथा-(रसरूप भगवत्ता)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २४ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, आपने उस दिन कहा कि रसो वै सः--कि वह रस-रूप है। परमात्मा की यह परिभाषा मुझे सबसे बढ़कर भाती है। तैत्तिरीय उपनिषद का वह पूरा श्लोक इस प्रकार है:
रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानंदी भवति। को ह्येवान्यात कः प्राण्यात।
यदेष आकाश आनंदो न स्यात। एष ह्येवानंदयाति।
(भगवान रस-रूप है। उसी रस को पाकर प्राणी-मात्र आनंद का अनुभव करता है। यदि वह आकाश की भांति सर्व-व्यापक आनंदमय तत्व न होता, तो कौन जीवित रहता और कौन प्राणों की चेष्टा करता? वास्तव में वही तत्व सबके आनंद का मूलस्रोत है।)
भगवान, हमें इसका पूरा आशय समझाने की अनुकंपा करें!

सहजानंद!
यह परिभाषा अपूर्व है। मनुष्य जाति के समग्र इतिहास में इसके जोड़ की कोई परिभाषा नहीं है। ऐसे तो परमात्मा की परिभाषा हो नहीं सकती, लेकिन करनी ही हो, करनी ही पड़े, तो इस परिभाषा से श्रेष्ठतर परिभाषा की कोई संभावना नहीं है। लेकिन इसे समझना आसान नहीं है। एक-एक शब्द को बहुत गौर से समझना पड़े।

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-तीसरा-(धर्म है महाभोग)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २३ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान,
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत।।
सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब कल्याण को प्राप्त हों, कोई भी दुखभागी न हो।
आप्तपुरुषों का यह मंगल-वचन क्या कभी सच होगा?
पूर्णानंद!
यह तुम पर निर्भर है। यह तो आशीष है, लेकिन इसे पूरा करने के लिए भूमिका तो तुम्हें जुटानी होगी।
जिन्होंने जाना है, उन्होंने तो चाहा है कि सभी जान लें। जिन्होंने पाया है, उन्होंने प्रार्थना की है प्रभु को कि सब को मिले। स्वाभाविक है कि जिन्होंने आनंद को पीया है, वे जब तुम्हें दुख में डूबा हुआ देखते हैं, तो हैरान भी होते हैं, पीड़ित भी होते हैं। हैरान इसलिए होते हैं कि दुख का कोई भी कारण नहीं--और तुम दुखी हो!
दुख तुम्हारे झूठ आधारों पर निर्भर है। दुख के तुम स्रष्टा हो। कोई और उसे बनाता नहीं; तुम ही रोज सुबह से सांझ मेहनत करते हो। जिस चिता में तुम जल रहे हो, उसकी लकड़ियां तुमने जुटाई हैं। उसमें आग भी तुमने लगाई है।

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

प्रवचन-दूसरा-(जीवंत धर्म)
श्री रजनीश आश्रम, पूरा, प्रातः, दिनांक २२ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, मनुस्मृति में यह श्लोक है:
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत।।
(मारा हुआ धर्म मार डालता है; रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। इसलिए धर्म को न मारना चाहिए, जिससे मारा हुआ धर्म हमको न मार सके।)

सहजानंद!
यह श्लोक प्रीतिकर है। ऐसे तो मनुस्मृति बहुत कुछ कचरे से भरी है, लेकिन खोजो तो राख में भी कभी-कभी कोई अंगारा मिल जाता है। कचरे में भी कभी-कभी कोई हीरा हाथ लग जाता है।
मनुस्मृति निन्यानबे प्रतिशत तो कभी की व्यर्थ हो चुकी है। भारत की छाती से उसका बोझ उतर जाए, तो अच्छा। उसमें ही जड़ें हैं भारत के बहुत से रोगों की।

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01



जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-पहला (समाधिस्थ स्वर: हरिकथा)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक २१ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान! जो बोलैं तो हरिकथा--हरिकथा की यह घटना क्या है? क्या यह घटना मौन व ध्यान की प्रक्रिया से गुजरने के बाद घटती है अथवा प्रार्थना से? हरिकथा का पात्र और अधिकारी कौन है? क्या हम आपके प्रवचनों को भी हरिकथा कह सकते हैं?

योग मुक्ता! सहजो का प्रसिद्ध वचन है:
जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरिनाम।
जो बोलैं तो हरिकथा, भथकत करैं निहकाम।।
जीवन जब विचार-मुक्त होता है, तो व्यक्ति एक पोली बांस की पोंगरी जैसा हो जाता। जैसे बांसुरी। फिर उससे परमात्मा के स्वर प्रवाहित होने लगते हैं।
बांसुरी से गीत आता है, बांसुरी का नहीं होता। होता तो गायक का है। जिन ओठों पर बांसुरी रखी होती है, उन ओठों का होता है। बांसुरी तो सिर्फ बाधा नहीं देती।