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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

चल हंंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-07



संन्यास और अंतस—क्रांति—सातवां प्रवचन

सातवां प्रवचन
घाटकोपर, बंबई,
दिनांक 9 अप्रैल 1966


अगर आप पुरुष हैं और आपको किसी स्त्री का आकर्षण है, तो यह आकर्षण बहुत गहरे में आपके भीतर ही जो आधी स्त्री बैठी है, उसके प्रति है। और जब तक यह स्त्री भीतर नष्ट न हो जाये, तब तक आप बाहर कितनी पत्नियां छोडते रहें, भागते रहें, कोई परिणाम नहीं होगा। आपके मन में स्त्री का आकर्षण बना ही रहेगा। वह घूम—फिर कर आता ही रहेगा। फिर आप नयी—नयी कल्पनाओं में उसका ही रस लेते रहेंगे।
संन्यास बच्चों जैसी बात नहीं है कि एक लड़के को साधु—संन्यासियों की बात सुनकर या किसी लड़की को भावावेश आ गया और उसने कपड़े बदल लिए और कुछ उलटा—सीधा कर लिया, तो वह कोई संन्यासी हो गया! भीतर उसकी साइक कैसी बनेगी! उसका पूरा का पूरा अंतःकरण और मन कैसे बनेगा? उस मन में तो, उसके अनकांशस में विपरीत लिंग बैठा हुआ है।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-06



ध्यान है : भगवत्ता—छठवां प्रवचन

छठवां प्रवचन
बंबई; दिनांक 15 अप्रैल, 1970

प्रश्न :

आजकल अनेक संत लोग चमत्कार बताते हैं, उसके संबंध में आपका क्या मंतव्य है?

आदमी बहुत कमजोर है और बहुत तरह की तकलीफों में है। उसकी तकलीफें बिलकुल सांसारिक हैं। अभी एक, और सामान्य आदमी ही नहीं—सुशिक्षित, जिनको हम विशेष कहें वे भी...। अभी एक चार—छह दिन पहले कलकत्ते से एक डाक्टर का पत्र मुझे आया। वह डाक्टर है। तबादला करवाना है, कलकत्ते से बनारस। पत्नी—बच्चे बनारस में हैं। तो मुझे लिखता है कि मैं सब तरह की पूजा—पाठ करवा चुका हूं। साधु—संतों के सब तरह के दर्शन कर चुका हूं सैकडों रुपए भी खर्च कर चुका इस पर, लेकिन अभी तक मेरा तबादला नहीं हो पाया। तब आखिरी आपकी शरण आता हूं। तबादला करवा दें, नहीं तो मेरा भगवान से भरोसा ही उठ जाएगा।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-05



ध्यान है अक्रिया—(पाँचवाँ-प्रवचन)

पांचवां प्रवचन
बंबई, दिनांक 10 मार्च, 1970


 मेरे प्रिय आत्मन,
कल मैंने कहा कि ध्यान अक्रिया है, तो एक मित्र ने पूछा है कि वे समझ नहीं सके कि ध्यान अक्रिया कैसे है? क्योंकि जो हम करेंगे, वह तो क्रिया ही होगी, अक्रिया कैसे होगी?
मनुष्य की भाषा के कारण बहुत भूल पैदा होती है। हम बहुत—सी अक्रियाओं को भी भाषा में क्रिया समझे हुए हैं। जैसे हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति ने जन्म लिया। ' सुनकर ऐसे लगता है, जैसे जन्म लेने में उसको भी कुछ करना पडा होगा। जन्मना एक क्रिया है। हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति मर गया', तो ऐसा लगता है कि मरने में उसे कुछ करना पडा होगा। हम कहते हैं कि 'कोई सो गया', तो ऐसा लगता है कि सोने में उसे कुछ करना पडा होगा। नींद क्रिया नहीं है, मृत्यु क्रिया नहीं है, जन्म क्रिया नहीं है, लेकिन भाषा में वे क्रियाएं बन  जाती हैं।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-04



ध्यान है : साक्षी—भाव—(चौथा-प्रवचन)

चौथा प्रवचन
बंबई; दिनांक 25 फरवरी,1970
प्रश्न :

ध्यान के समय मन एकाग्र नहीं होता, तो क्या करूं?

नहीं; पहली तो यह बात आपके खयाल में नहीं आयी कि एकाग्रता ध्यान नहीं है। मैंने कभी एकाग्रता करने को नहीं कहा। ध्यान बहुत अलग बात है। साधारणत: तो यही समझा जाता है कि एकाग्रता ध्यान है। एकाग्रता ध्यान नहीं है। क्योंकि एकाग्रता में तनाव है। एकाग्रता का मतलब यह है कि सब जगह से छोड्कर एक जगह मन को जबरदस्ती रोकना। एकाग्रता सदा जबरदस्ती है; इसमें कोएर्सन है। क्योंकि मन तो भागता है, और आप कहते हैं : 'नहीं भागने देंगे ' तो आप और मन के बीच एक लडाई शुरू हो जाती है। और जहां लडाई है, वहां ध्यान कभी नहीं होगा। क्योंकि लडाई ही तो उपद्रव है, हमारे पूरे व्यक्तित्व की। कि वह पूरे वक्त कॉनफ्लिक्ट है, द्वंद्व है, संघर्ष है। और मन को ऐसी अवस्था में छोडना है, जहां कोई कॉनफ्लिक्ट ही नहीं है, तब ध्यान में आप जा सकते हैं।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-03



ध्यान मंदिर है: मनुष्‍य का मंगल—तीसरा प्रवचन

तीसरा प्रवचन
साधना शिविर, तुलसीश्याम,
सौराष्ट्र; दिनांक 6 फरवरी, 1966


प्रश्न :

मैं यह पूछना चाहता हूं कि हम लोग जो फंड्स इकट्ठा करने का सोच रहे हैं कि पंद्रह लाख रुपये के करीब इकट्ठा करें, तो इसके लिए आपका मकसद क्या है? ऐसा करने से जीवन जागृति केंद्र का सब जगह से क्या फायदा है, इस बारे में आप समझायें।

बहुत—सी बातें हैं। एक तो जैसी स्थिति में हम आज हैं, ऐसी स्थिति में शायद दुबारा इस मुल्क का समाज कभी भी नहीं होगा। इतने संक्रमण की, ट्रांजीशन की हालत में हजारों, सैकडों वर्षों में एकाध बार समाज आता है—जब सारी चीजें बदल जाती हैं, जब सब पुराना नया हो जाता है। ये क्षण सौभाग्य भी हो सकते हैं और दुर्भाग्य भी। जरूरी नहीं है कि नया हर हालत में ठीक ही होता है। पुराना तो हर हालत में गलत होता है, लेकिन नया हर हालत में ठीक नहीं होता। और जब पुराना टूटता है, तो हजार विकल्प, आल्टरनेटिब्स होते हैं। दुर्भाग्य बन सकता है, अगर गलत विकल्प चुन लिया। इस बात को ठीक से समझ लेना चाहिए।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-02




ध्यान का द्वार : सरलता—(दूसरा-प्रवचन)


साधना शिविर, तुलसीश्याम,
सौराष्ट्र; दिनांक 4 फरवरी, 1966

जिसे परमात्मा के दर्शन शुरू हो जायेंगे, वह एक पक्षी का गीत सुनेगा, तो उस गीत में भी उसे परमात्मा की वाणी सुनायी पड़ेगी। वह एक फूल को खिलते देखेगा, तो उस फूल के खिलने में भी परमात्मा की सुवास, परमात्मा की सुगंध उसे मिलेगी। उसे चारों तरफ एक अपूर्व शक्ति का बोध होना शुरू हो जाता है। लेकिन यह होगा तभी, जब मन हमारा इतना निर्मल और स्वच्छ हो कि उसमें प्रतिबिंब बन सके, उसमें रिफ्लेक्यान बन सके।
तुमने देखा होगा झील पर कभी जाकर। अगर झील पर बहुत लहरें उठती हों तो आकाश में चांद हो, तो फिर झील पर चांद का कोई प्रतिबिंब नहीं बनता। और अगर झील बिलकुल शांत हो, उसमें कोई लहर न उठती हो, दर्पण की तरह चुप और मौन हो, तो फिर चांद उसमें दिखायी पड़ता है। और जो चांद झील में दिखायी पड़ता है, वह उससे भी सुंदर होता है, जो ऊपर आकाश में होता है।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-01



ध्‍यान है: अंतस—क्रांति-(पहला-प्रवचन)

दिनांक 25 फरवरी, सन् 1970

श्री रजनीश, बंम्बई,
प्रश्न :
साक्षीभाव क्या है? उसे हम जगाना चाहते हैं। क्या वह भी चित्त का एक अंश नहीं    होगा? या कि चित्त से परे होगा?

  प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है, और ठीक से समझने योग्य है। साधारणत: हम जो भी जानते हैं, जो भी करते हैं, जो भी प्रयत्न होगा, वह सब चित्त से होगा, मन से होगा, माइंड से होगा। अगर आप राम—राम जपते हैं, तो जपने की क्रिया मन से होगी। अगर आप मंदिर में पूजा करते हैं, तो पूजा करने की क्रिया मन का भाव होगी। अगर आप कोई ग्रंथ पढ़ते हैं, तो पढ़ने की क्रिया मन की होगी। और आत्मा को जानना हो, तो मन के ऊपर जाना होगा। मन की कोई क्रिया मन के ऊपर नहीं ले जा सकती है। मन की कोई भी क्रिया मन के भीतर ही रखेगी।
स्वाभाविक है कि मन की किसी भी क्रिया से, जो मन के पीछे है, उससे परिचय नहीं हो सकता। यह पूछा है, यह जो साक्षीभाव है, क्या यह भी मन की क्रिया होगी? नहीं, अकेली एक ही क्रिया है, जो मन की नहीं है, और वह साक्षीभाव है।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-ओशो



चल हंसा उस देस

—ओशो
श्री रजनीश द्वारा 1966 एवं 1970 में
दिए गए सात अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन.

मन सतत परिवर्तनशील है, और साक्षी सतत अपरिवर्तनशील है। इसलिए साक्षीभाव मन का हिस्सा नहीं हो सकता। और फिर, मन की जो—जो क्रियाएं हैं, उनको भी आप देखते हैं। आपके भीतर विचार चल रहे हैं, आप शांत बैठ जायें, आपको विचारों का अनुभव होगा कि वे चल रहे हैं; आपको दिखायी पड़ेंगे, अगर शांत भाव से देखेंगे तो विचार वैसे ही दिखाई पड़ेंगे, जैसे रास्ते पर चलते हुए लोग दिखायी पड़ते हैं। फिर अगर विचार शून्य हो जायेंगे, विचार शांत हो जायेंगे, तो यह दिखायी पड़ेगा कि विचार शांत हो गये हैं, शून्य हो गये हैं; रास्ता खाली हो गया है। निश्चित ही जो विचारों को देखता है, वह विचार से अलग होगा। वह जो हमारे भीतर देखने वाला तत्व है, वह हमारी सारी क्रियाओं से, सबसे भिन्न और अलग है।