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शनिवार, 16 जून 2018

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--13

ओम शांति शांति शांति—तेरहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :


            ओम पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
              पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
                  ओम शांति: शांति: शांति:।

      ओम वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही
      उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है।
                  ओम शांति, शांति, शांति।

जीवन का शाश्वत नियम है, जहां से होता है प्रारंभ, वहीं होती है परिणति। जो है आदि, वही है अंत। जीवन के इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत ईशावास्य जिस सूत्र से शुरू होता है, उसी सूत्र पर पूर्ण होता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। सभी यात्राएं वर्तुल में हैं। दि फर्स्ट स्टेप इज दि लास्ट आलसो। पहला कदम आखिरी कदम भी है।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--12

असतो मा सदग्मय --बारहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

            अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
            विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
            युयोध्यस्मच्चहुराणमेनो
            भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम।। 18।।


      हे अग्ने। हमें कर्म फल भोग के लिए सन्मार्ग से ले चल। हे देव! तू
       समस्त ज्ञान और कर्मों को जानने वाला है। हमारे पाखंडपूर्ण पापों
         को नष्ट कर। हम तेरे लिए अनेकों नमस्कार करते हैं।। 18।।

र्वतों से उतरते हुए झरनों को हमने देखा है। सागर की ओर बहती हुई नदियों से हम परिचित हैं। जल सदा ही नीचे की ओर बहता है — और नीची जगह, और नीची जगह खोज लेता है। गड्डों में ही उसकी यात्रा है। अधोगमन ही उसका मार्ग है। उसकी प्रकृति है नीचे, और नीचे, और नीचे। जहां नीची जगह मिल जाए वहीं उसकी यात्रा है।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--11

वह शून्‍य है—ग्यारहवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

           
            वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
            ओम क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर।। 17।।


      अब मेरा प्राण सर्वात्मक वायुरूप सूत्रात्मा को प्राप्त हो और यह
      शरीर भस्मशेष हो जाए। हे मेरे सकल्पात्मक मन! अब तू स्मरण
      कर, अपने किए हुए को स्मरण कर, अब तू स्मरण कर, अपने
                  किए हुए को स्मरण कर।। 17।।

जीवन मिल जाए उसी में, जहां से जन्मा है। आकार खो जाए उस निराकार में, जहां से आकार निर्मित हुआ है। ये प्राण वायु के साथ एक हो जाएं। शरीर धूल में, मिट्टी में समा जाए। ऐसे क्षण में — और ऐसे क्षण दो हैं, उनकी मैं आपसे बात करूंगा — ऐसे क्षण में ऋषि ने कहा है अपने संकल्पात्मक मन से कि हे मेरे संकल्प करने वाले मन, अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर, अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--10

वह ब्रह्म है—दसवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

            सम्भूतिं च विनाश च यस्तद्वेदोभयं सह।
            विनाशेन मृत्यु तीर्त्वा सम्भूत्याध्मृतमश्नुते।। 16।।


      जो असंभूति और कार्य—ब्रह्म — इन दोनों को साथ—साथ जानता
      है; वह कार्य—ब्रह्म की उपासना से मृत्यु को पार करके असंभूति के
            द्वारा अमरत्व प्राप्त कर लेता है।। 16।।


क वर्तुल खींचें हम, एक सर्किल बनाएं तो बिना केंद्र के नहीं बना सकेंगे। केंद्र के चारों ओर परिधि को खींचेंगे। केंद्र से परिधि जितनी दूर होती जाएगी उतनी बड़ी होती चली जाएगी। अगर परिधि पर हम दो बिंदुओं को लें तो उनमें फासला होगा। अगर दोनों बिंदुओं से दो रेखाएं खींचें, जो केंद्र को जोड़ती हों, तो जैसे—जैसे केंद्र की तरफ बढ़ेंगे, वैसे—वैसे फासला कम होता चला जाएगा।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--09

वह ज्‍योतिर्मय है—नौवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र:

            हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
            तत्व पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।। 14।।


      आदित्य मण्डलस्थ ब्रह्म का मुख ज्योतिर्मय पात्र से ढंका हुआ है।
            हे पूषन्! मुझ सत्यधर्मा को आत्मा की उपलब्धि
                 कराने के लिए तू उसे उघाड़ दे।। 14।।


हज ही खयाल में न आ सके, सहज ही समझ में न आ सके, ऐसा यह सूत्र कई अर्थों में बहुत असाधारण अभिप्राय को लिए हुए है। पहली तो बात यह, साधारणत: सोचते हैं हम, मानते हैं ऐसा कि सत्य अगर ढंका होगा तो अंधकार से ढंका होगा। पर यह सूत्र कहता है कि ज्योति से, प्रकाश से ढंका है सत्य।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--08

यह चैतन्‍य है—आठवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :


अन्ध तम: प्रविशन्ति ये sसम्‍भूतिमुपासते।
     ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रता:।। 12।।


      जो असंभूति की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में प्रवेश करते
      हैं। और जो संभूति में रत हैं, वे मानो उनसे भी अधिक अंधकार में
                        प्रवेश करते हैं।। 12।।

स्तित्व का प्रगट रूप है प्रकृति — जो दिखाई पड़ता है आंखों से, हाथों से स्पर्श में आता है, इंद्रियां जिसे पहचान पाती हैं, इंद्रियों को जिसकी प्रत्यभिज्ञा होती है। कहें कि जो दृश्यमान परमात्मा है, वह प्रकृति है। लेकिन यह तो उनका अनुभव है, जिन्होंने परमात्मा को जाना। वे कहेंगे कि परमात्मा की देह प्रकृति है। लेकिन हम तो केवल देह को ही जानते हैं। वह परमात्मा की है देह, ऐसा हमारा जानना नहीं है।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--07

ह अव्‍याख्‍य है—सातवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

                  अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
                  इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।। 10।।


            विद्या से और ही फल बतलाया गया है तथा अविद्या से और ही
            फल बतलाया है। ऐसा हमने बुद्धिमान पुरुषों से सुना है, जिन्होंने
                  हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी।। १०।।


पनिषद अविद्या का अर्थ मात्र अज्ञान नहीं करते हैं। और विद्या का अर्थ मात्र ज्ञान नहीं करते हैं। अविद्या से उपनिषद का अभिप्रेत भौतिक ज्ञान है। अविद्या से अर्थ है वैसी विद्या, जिससे स्वयं नहीं जाना जाता, लेकिन और सब जान लिया जाता है। अविद्या, पदार्थ विद्या का नाम है।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--06

वह स्‍वयंभू है—छठवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :

                  स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्
                  अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
                  कविर्मनीषी पीरभू स्वयंभू—
         र्याथातथ्यतोर्ध्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:।। 8।।



      वह आत्मा सर्वगत, शुद्ध, अशरीरी, अक्षत, स्नायु से रहित, निर्मल,
            अपापहत, सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सर्वोत्कृष्ट, और स्वयंभू है।
      उसी ने नित्यसिद्ध संवत्सर नामक प्रजापतियों के लिए यथायोग्य रीति से
                  अर्थों का विभाग किया है।। 8।।

स आत्मतत्व के लिए, उस आत्मतत्व के स्वभाव के लिए कुछ सूचनाएं इस सूत्र में हैं। सबसे पहली — वह आत्मतत्व स्वयंभू है। इस जगत में अस्तित्व के अतिरिक्त और कुछ भी स्वयंभू नहीं है। स्वयंभू का अर्थ है, सेल्फ ओरिजिनेटेड। स्वयंभू का अर्थ है, जो किसी और के द्वारा पैदा नहीं किया गया। स्वयंभू का अर्थ है, जो किसी और के द्वारा सृजा नहीं गया। जो स्वयं ही हुआ है।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--05

वह समत्‍व है—पांचवां प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
मांउट आबू, राजस्‍थान।
सूत्र:
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते।। 6।।

जो संपूर्ण भूतों को आत्मा में ही देखता है और समस्त भूतों में भी
आत्मा को ही देखता है, वह इसके कारण ही किसी से घृणा नहीं
करता।। 6।।

नुष्य की गहरी से गहरी उलझनों में घृणा आधारभूत है। कहें कि घृणा का जहर ही मनुष्य की और समस्त विषाक्त अभिव्यक्तियों में प्रगट होता है।
घृणा का अर्थ है. दूसरे के विनाश की आतुरता। प्रेम का अर्थ है : दूसरे के जीवन की आकांक्षा। घृणा का अर्थ है दूसरे की मृत्यु की आकांक्षा। प्रेम का अर्थ है,

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--04

वह अतिक्रमण है—चौथा प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :


          अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्।
         तद्धावतोsन्‍यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।। 4।।



       वह आत्मतत्व अपने स्वरूप से विचलित न होने वाला तथा मन
      से भी तीव्र गति वाला है। इसे इंद्रियां प्राप्त नहीं कर सकीं, क्योंकि
      यह उन सबसे आगे गया हुआ है। वह स्थिर होते हुए भी अन्य सभी
      गतिशीलों को अतिक्रमण कर जाता है। उसके रहते हुए ही वायु
      समस्त प्राणियों के प्रवृत्तिरूप कर्मों का विभाग करता है।। 4।।



त्मतत्व स्थिर होते हुए भी गतिमान से भी ज्यादा गतिमान है। आत्मतत्व इंद्रियों और मन की दौड़ के परे है, क्योंकि इंद्रियों और मन दोनों के पूर्व है, दोनों के पहले है, दोनों के पार है। इस सूत्र को साधक के लिए समझना बहुत जरूरी और उपयोगी है।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--03

वह निमित्‍त है—तीसरा प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू राजस्‍थान।

सूत्र :

               कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं शता:।
            एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। 2।।


            इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। इस
            प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवाय
            और कोई मार्ग नहीं है, जिससे तुझे कर्म का लेप न हो।। 2।।


संसार में कोई ऐसा दूसरा मार्ग नहीं है जिससे चलकर कर्म का लेप न हो। जिस मार्ग ईशावास्य ने चर्चा की है वह मार्ग है — सब प्रभु को अर्पित करके जीना। सब उसके ही चरणों में छोड़ देना। सब उसको ही समर्पित कर देना। स्वयं के कर्ता का समस्त? छोड्कर कर्मों से जो गुजरने को राजी है, उसे इस संसार में कर्म का कोई लेप नहीं होता एक ही मार्ग है, दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
दो—तीन बातें समझ लेनी उपयोगी हैं।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--02

वह परम भोग है—दूसरा प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र:

            हरि ओम,
            ईशावास्‍यमिदं सर्वं यत्किज्व जगत्या जगत्।
            तेन त्यक्तेन पुज्जीथा: मा गृध: कस्यस्विद्धनमू।। 1।।


      जगत में जो कुछ स्थावर—जंगम संसार है, वह सब ईश्वर के द्वारा
      आच्छादनीय है। उसके त्याग— भाव से तू अपना पालन कर; किसी
                  के धन की इच्छा न कर।। 1।।

शावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा : सब कुछ परमात्मा का है। इसीलिए ईशावास्य नाम है — ईश्वर का है सब कुछ।
मन करता है मानने का कि हमारा है। पूरे जीवन इसी भ्रांति में हम जीते हैं। कुछ हमारा है — मालकियत, स्वामित्व — मेरा है। ईश्वर का है सब कुछ, तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती।

ईशावास्‍य उपनिषाद--प्रवचन--01

           ईशावास्‍य उपनिषद -ओशो

वह पूर्ण है—पहला प्रवचन
ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :
           

            ओम पूर्णमद: पूर्णमिद पूर्णात्पूर्णमुदव्यते।
              पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
                  ओम शांति: शांति: शांति:।


      ओम वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही
      उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है।
                  ओम शांति, शांति, शांति।

 ह महावाक्य कई अर्थों में अनूठा है। एक तो इस अर्थ में कि ईशावास्य उपनिषद इस महावाक्य पर शुरू भी होता है और पूरा भी। जो भी कहा जाने वाला है, जो भी कहा जा सकता है, वह इस सूत्र में पूरा आ गया है। जो समझ सकते हैं, उनके लिए ईशावास्य आगे पढ़ने की कोई भी जरूरत नहीं है। जो नहीं समझ सकते हैं, शेष पुस्तक उनके लिए ही कही गई है।