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सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--214

संसार ही मोक्ष बन जाए(प्रवचनसोलहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            यदहंकारमाश्रित्य न योत्‍स्‍य इति मन्यसे।
मिथ्‍यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्थ्यां नियोक्ष्यति।। 59।।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छीस यन्महात् कीरष्यवशेउपि तत्।। 60।।
र्इश्वर: सर्वभूतानां हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। 61।।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्‍प्रसादात् परां शान्ति स्थानं प्राप्‍स्‍यसि शाश्वतम।। 62।।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्माशह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्‍छसि तथा कुरु।। 63।।

और जो तू अहंकार को अवलंबन करके ऐसे मानता है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा, तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है, क्योंकि क्षत्रियपन का स्वभाव तेरे को जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा। और हे अर्जुन, जिस कर्म को तू मोह से नहीं करना चाहता है उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--213

गीता—पाठ और कृष्‍ण–पूजा—(प्रवचन—प्रंदहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

ब्रह्मभूत: प्रसन्‍नत्‍मा न शोचिई न काङ्क्षति।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते यराम्।। 54।।
भक्त्‍या मामीभजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वत:।
ततो मां तत्‍वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।। 55।।
सर्क्कर्माण्यीप सदा कुर्वाणो मद्व्ययाश्रय:।
मत्प्रसादादवानोति शाश्वतं पदमध्ययम्।। 56।।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्‍पर:।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्‍चित्त: सततं भव।। 57।।
मच्चित: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तश्ष्यिसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्‍न श्रोष्यीस विनङ्क्ष्‍यसि।। 58।।

फिर वह सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित हुआ प्रसन्नचित्त वाला पुरुष न तो किसी वस्तु के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है एवं सब भूतों में समभाव हुआ मेरी परा— भक्‍ति को प्राप्त होता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--212

पात्रता और प्रसाद—(प्रवचन—चौदहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

अमक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यतिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगव्छीत।। 49।।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाम्नोति निबोध मे।
समामेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या पर।।। 50।।
बुद्धया विशुद्धया युक्‍तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्त्रिषयांस्‍त्‍यक्‍त्‍वा राग्द्धेशै व्युदस्य च।। 51।।
विविक्तसेवी लथ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगयरो नित्यं वैराग्य समुपाश्रित:।। 52।।
अहंकार बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुव्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।। 53।।

तथा है अर्जुन, सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्‍पृहारहित और जीते हुए अंतकरण वाला पुरुष संन्यास के द्वारा भी परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त होता है अर्थात क्रियारहित हुआ शुद्ध सच्चिदानंदघन परमात्मा की प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
इसलिए हे कुंतीपुत्र, अंतःकरण की शुद्धिरूप सिद्धि को प्राप्त हुआ पुरुष जैसे सच्चिदानंदधन ब्रह्म को प्राप्त होता है तथा जो तत्वज्ञान की परा— निष्ठा है, उसको भी तू मेरे से संक्षेय में जान।
हे अर्जुन, विशुद्ध बुद्धि से युक्त, एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला तथा मिताहारी जीते हुए मन, वाणी व शरीर वाला और दृढ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष निरंतर ध्यान— योग के परायण हुआ सात्‍विक धारणा से अंतःकरण को वश में करके तथा शब्दादिक विषयों को त्यागकर और राग—द्वेष की नष्ट करके तथा अहंकार, बल घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह, को त्यागकर मम्‍तारहित और शांत हुआ सच्चिदानंदघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिए योग्य होता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--211

स्‍वधर्म, स्‍वकर्म और वर्ण—(प्रवचन—तेरहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            स्‍वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
स्वकर्मनिरत: सिद्धिं यथा विन्दति तव्छृणु।। 45।।
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमथ्यर्ब्य सिद्धिं विन्दति मानव:।। 46।।
श्रेयाक्यधर्मा विगुणः परधर्माफ्लनुष्ठितात्।
स्वभावनिक्तं कर्म कुर्वब्रानोति किल्‍बिषम्।। 47।।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोश्मीय न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।। 48।।

एवं इस अपने—अपने स्वाभाविकि कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्‍तिरूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परंतु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म मैं लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन। हे अर्जुन, जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाक्कि कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता हे।
इसलिए अच्छी कार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
अतएव है कुंतीपुत्र, दोषयुक्त भी स्वाभाविक कर्म को नहीं त्यागना चाहिए क्योंकि धुएं से अग्नि के सदृश सब ही कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं।

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--210

गुणातीत है आनंद—(प्रवचन—बारहवां)

अध्‍याय—8
सुत्र—

ब्रह्यणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतय।
कर्माणि प्रीवभक्तानि स्वभाअभवैर्गुणै।। 41।।
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। 42।।
शौर्य तेजी धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्‍यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।। 43।।
कृषिगौरमवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्क्कं कर्म शूद्रस्‍यापि स्वभावजम्।। 44।।

इसलिए हे परंतप, ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के तथा शूद्रों के भी कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए गुणों के आधार पर विभक्त किए गए हैं।
शम अर्थात अंतःकरण का निग्रह, दम अर्थात इंद्रियों का दमन, शौच अर्थात बाहर— भीतर की शुद्धि, तय अधर्म धर्म के लिए कष्ट सहन करना, क्षांति अर्थात क्षमा— भाव एवं आर्जव अर्थात मन, इंद्रिय और शरीर की सरलता, आस्तिक बुद्धि, ज्ञान और विज्ञान, ये तो ब्रह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। और शौर्य, तेज, धृति अर्थात धैर्य, चतुरता और युद्ध में भी न भागने का स्वभाव एवं दान और स्वामी— भाव, ये सब क्षत्रिय के स्वाभाक्कि कर्म हैं।
तथा खेती, गौपालन और क्रय— विक्रय रूप सत्य व्‍यवहार, वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। और सब वर्णो की सेवा करना, यह शूद्र का स्वाभाक्कि कर्म है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--209

तामस, राजस और सात्‍विक सुख—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            सुखं त्विदानीं त्रिविधं मृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासद्रमते यत्र दुखान्तं च निगच्‍छति।। 36।।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतीयमम्।
तत्सुखं सात्‍विक प्रोक्तमात्मबुध्यिसादजम्।। 37।। 
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोयमम्।
परिणामे विषीमव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।। 38।।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन।
निद्रलस्थ्यमादोत्‍थं तत्‍तामसमुदाह्रतम्।। 39।।
न तदस्ति पृथ्‍विव्यां वा दिवि दैवेषु वा पुन:।
सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्‍तं यदैभि:स्यत्मिभिर्गुणै।। 40।।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--208

गुरु पहला स्‍वाद है--(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

धृत्या यया धारयते मनप्राणेन्द्रियक्रिया:।
योगेनाथ्यमिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्‍विकी।। 33।।
यया त धर्क्कामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृति: सा पार्थ राजसी।। 34।।
यया स्वप्‍नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुज्‍चति दुमेंधा धृति: आ पार्थ तामसी।। 35।।

और है पार्थ, ध्यान— योग के द्वारा जिस अव्‍यभिचारिणी धृति अर्थात धारणा से मनुष्य मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाऔं को धारण करता है, वह धृति तो सात्‍विकी है।
और है पृथापुत्र अर्जुन, फल की इच्‍छा वाला मनुष्य अति आसक्ति से जिस धृति के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धृति राजसी है।
तथा हे पार्थ, दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धृति अर्थात धारणा के द्वारा निंद्रा, भय और दुख को एवं उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता है अर्थात धारण किए रहता है, वह धृति तामसी है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--206

समाधान और समाधि—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—18
सूत्र——

मुक्ततङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्विक उच्यते।। 26।।
रागी कर्मफन्सेप्सुरर्लब्‍धो हिंसात्क्कोऽशुचि:
हर्षशक्रोन्वित: कर्ता राजस: परिर्कीर्तित:।। 27।।
अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस:।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्‍यते।। 28।।

तथा हे अर्जुन, जो कर्ता आसक्‍ति से रहित और अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त एवं कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष— शोकादि विकारों से रहित है, वह कर्ता तो सात्‍विक कहा गया है।
और जो आसक्‍ति से युक्‍त कर्मों के कल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी और हर्ष— शोक से लिपायमान है, वह कर्ता राजस कहा गया है।
तथा जो विक्षेपयुक्‍त चित्त वाला, शिक्षा से रहित, धमंडी, धूर्त और दूसरे की आजीतिका का नाशक एवं शौक करने के स्वभाव वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है, वह कर्ता तामस कहा जाता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--205

तीन प्रकार के कर्म—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            नियतं सङ्गरहितमराग्डेषत: कृतम्।
अफत्नप्रेप्‍सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्‍यते।। 23।।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन:।
क्रियते बहलायासं तद्राजममुदह्रतम्।। 24।।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरूषम्।
मोहादारभ्‍यते कर्म यत्तत्तामसमुव्यते।। 25।।

तथा हे अर्जुन, जो कर्म शास्त्र— विधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित, फल को न चाहने वाले पुरूष द्वारा बिना राग—द्वेष से किया हुआ ह्रै वह कर्म तो सात्विक कहा जाता है।
और जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा कल को चाहने वाले और अहंकारयुक्‍त पुरूष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।
तथा जो कर्म परिणाम, हानि हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह कर्म तामस कहा जाता है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--204

गुणातीत जागरण—(प्रवचन—छठवा

अध्‍याय—18
सूत्र—204

ज्ञानं ज्ञेयं पीरज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसंग ।। 18।।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदत:।
प्रोच्‍यते गुणसंख्याने यथावच्‍छृणु तान्ययि।। 19।।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्जानं विद्धि सात्‍विकम्।। 20।।
पृथक्त्‍वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृश्रश्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ।। 21।।
यत्तु कृत्‍स्‍नवक्केस्मिन्क्रायें स्थ्यमहैक्कुम्।
अतल्छार्श्रवदल्पं च तत्तामसमुदहतम्।। 22।।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--203

महासूत्र साक्षी—(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            यञ्जैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।। 13।।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथश्विधम्।
विविधाश्च यृथक्चैष्टा दैवं चैवात्र यञ्जयम्।। 14।।
शरीरवाक्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नर:।
न्याटयं वा विपरीतिं वा पज्जैते तस्य हेतवः ।। 15।।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु व: ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्‍न स पश्यति दुमॅल: ।। 16।।
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स हमाँल्लोकान्‍न हन्ति न निबध्यते ।। 17।।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--202

सदगुरू की खोज—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—18
सूत्र—

न द्वेञ्चकुशलं कर्म कुशले नानुषज्‍जते।
त्यागी सत्‍वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय:।। 10।।
न हि देहभृता शाक्‍यं त्यक्तुं कर्माण्यझेश्त:।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्‍यभिधीक्ते।। 11।।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्।
भवत्‍यत्‍यागिनां प्रेत्य न तु सन्यासिनां क्वचित्।। 12।।  

और हे अर्जुन, जो पुरुष अकल्‍याणकारक कर्म से तो द्वेष नहीं करता है और कल्याणकारक कर्म में आस्क्‍त नहीं होता है, वह शुद्ध सत्वगुण से युक्‍त हुआ पुरुष संशयरहित मेधावी अर्थात ज्ञानवान और त्यागी है।
क्योंकि देहधारी पुरुष के द्वारा संपूर्णता से सब कर्म त्यागे जाना शक्य नहीं है। इससे जो पुरूष कर्मो के फल का त्यागी है, क ही त्यागी है, ऐसा कहा जाता है।
तथा सकामी पुरूषों के कर्म का ही अच्‍छा बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार का कल मरने के पश्‍चात भी होता है और त्यागी पुरुषों के क्रमों का फल किसी काल में भी नहीं होता है।