साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
प्रार्थना अंतिम पुरस्कार है—छठवां प्रवचन
१६ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
चमक-चमक कर हजार आफताब डूब गये
हम अपनी शामे-अलम को सहर बना न सके
कृपया, अब बताइये क्या करें?
अब्दुल कदीर!
चांदत्तारे तो ऊगेंगे, डूबेंगे; सूरज ऊगेगा, डूबेगा; इससे
तुम्हारे अंतरात्मा की अंधकार नहीं मिट सकता है। बाहर का कोई प्रकाश भीतर के
अंधकार को मिटाने में असमर्थ है। वह भरोसा ही छोड़ दो। वह भरोसा रखोगे तो भटकोगे।
और वही हम सबका भरोसा है। वहीं हम चूक रहे हैं। बाहर ही धन खोजते हैं कि भीतर की
निर्धनता मिट जाए। बाहर ही पद खोजते हज कि भीतर की दीनता मिट जाए। और बाहर की
रोशनी पर ही आंखें टिकाते हैं कि भीतर का अंधेरा कट जाए। यह नहीं हो सकता। जो बाहर
है बाहर है, जो भीतर है भीतर है। दोनों का कोई तालमेल नहीं।
दोनों एक-दूसरे का रास्ता नहीं काटते।






